
16-17 जून 2013 को चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों भयानक बारिश. फ्लैश फ्लड और भूस्खलन हुए. अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी नदियां रौद्र रूप धारण कर चुकी थीं. इन जिलों के कुछ इलाके पूरी तरह से बर्बाद हो गए थे. कुछ तो नक्शे से ही गायब. ये थे- गोविंदघाट, भींडर, श्री केदारनाथ, रामबाड़ा और उत्तरकाशी धराली. इन जगहों पर 10 हजार से ज्यादा लोगों जान जाने का अनुमान था. क्योंकि कुछ लोग तो मिले ही नहीं.
केदारनाथ में भारी तबाही की वजह थी चोराबारी ग्लेशियर पर बनी प्राकृतिक झील की बर्फीली दीवार टूटना. यहां से 1429 m3/s की गति से पानी रिलीज हुआ था. सिर्फ पांच मिनट का फ्लैश फ्लड था. लेकिन असर 250 किलोमीटर दूर तक देखा गया. गौरीकुंड में बर्बादी तो हुई लेकिन रामबाड़ा कस्बा पूरी तरह से साफ हो गया.
वैज्ञानिकों ने केदारनाथ हादसे की वजह जानने के लिए सितंबर 2013, मार्च-मई 2014 और जनवरी 2015 में चार बार सर्वे किया. चोराबारी झील के फटने की वजह से सबसे ज्यादा पानी और मलबे का बहाव मंदाकिनी घाटी में था. जो कि समुद्र तल से 3800 मीटर ऊपर है. इसके बाद 3575 मीटर ऊंचाई पर मौजूद केदारनाथ में, 2740 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद रामबाड़ा, 1900 मीटर ऊपर मौजूद गौरीकुंड और 1700 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद सोनप्रयाग में.
कहां से आई थी केदारनाथ की आपदा... देखिए स्पेशल वीडियो
अब चोराबारी झील की इस तस्वीर से समझिए कि कब क्या हुआ?
इस फोटो कॉम्बो में चोराबारी झील की चार तस्वीरें हैं. ये तस्वीरें छह साल के अंतर पर ली गई हैं. पहली तस्वीर बाएं सबसे ऊपर अक्टूबर 2008 की है, जिसमें छोटी सी झील बनी हुई दिख रही है. नवंबर 2011 में यह झील सूख जाती है. लेकिन 6 जून 2013 को इस झील में बर्फ और पानी दिख रहा है. यानी हादसे से दस दिन पहले. सितंबर 2013 की आखिरी तस्वीर में आप देख सकते हैं कि कैसे झील की दीवार (लाल घेरे में) टूटी हुई है. इस जगह से हिमालय की सुनामी बहकर केदारनाथ, रामबाड़ा, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, फाटा होते हुए हरिद्वार तक पहुंची थी.
क्यों टूटी चोराबारी झील, क्या दीवार कमजोर थी या मौसम ताकतवर
जून 2013 में चोराबारी ग्लेशियर के ऊपर काफी ज्यादा बारिश हुई थी. पूरे जून महीने में इस ग्लेशियर पर 519 मिलिमीटर बारिश हुई थी. 16 और 17 जून को चोराबारी पर 325 मिलिमीटर बारिश हुई थी. जो कि बहुत ज्यादा थी. इसके अलावा ग्लेशियर पर कई जगहों पर हिमस्खलन भी हुए थे. हो भी रहे थे. समुद्र तल से 3870 मीटर ऊपर 32 सेंटीमीटर बर्फ जमा थी. 4165 मीटर ऊपर 65 सेंटीमीटर और 4270 मीटर की ऊंचाई पर 152 सेंटीमीटर बर्फ जमा थी. चोराबारी झीले के आसपास के इलाके में हिमस्खलन की वजह से 250 से 700 सेंटीमीटर ऊंची बर्फ जमा थी.
ज्यादा बारिश, तापमान में लगातार हो रहा बदलाव और हिमस्खलनकी वजह से चोराबारी झील के आसपास स्थितियां प्राकृतिक तौर पर ठीक नहीं थीं. 15 से 17 जून तक लगातार हो रही बारिश की वजह से कई जगहों पर भूस्खलन भी हुआ था. बस एक हिमस्खलन और ज्यादा बारिश के दबाव में चोराबारी झील की दीवार फट गई. आमतौर पर बादल फटने की घटना तब मानी जाती है, जब एक घंटे में 100 मिलिमीटर से ज्यादा बारिश हो जाए. लेकिन चोराबारी पर 324 मिलिमीटर बारिश हुई थी.
क्या हुआ असर... चोराबारी ने मचा दी मंदाकिनी घाटी में तबाही
15 से 17 जून के बीच हुई बारिश, हिमस्खलन, चोराबारी झील के टूटने की वजह से मंदाकिनी घाटी बुरी तरह से बर्बाद हो गई. ऊपर की तरफ 30 फीसदी ज्यादा बर्फ थी. बारिश के बाद 10 वर्ग किलोमीटर का इलाका यानी केदारनाथ से कुंड तक नक्शा ही बदल गया था. चोराबारी झील के फटने के बाद पानी के तेज बहाव के साथ जो मलबा गया था. उसकी मात्रा 235 मीटर प्रति किलोमीटर थी. इतने ज्यादा फ्लो की वजह से बर्बादी ज्यादा हुई थी.
चोराबारी झील के बहाव ने गायब कर दी थी 80 KM सड़क
रुद्रप्रयाग-केदारनाथ मोटर रोड यानी एनएच 112 का 80 किलोमीटर हिस्सा चोराबारी से निकले बहाव ने बर्बाद कर दिया था. इसके अलावा केदारनाथ घाटी में 14 किलोमीटर लंबा वो रास्ता जिससे लोग मंदिर तक जाते थे. वो सब गायब हो गया था. सोनप्रयाग से केदारनाथ घाटी के बीच 137 मलबा बहने और भूस्खलन की घटनाएं हुई थीं.
घाटी के दाहिनी और बाईं तरफ मौजूद कस्बे और गांव जैसे- केदारनाथ, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, अगस्त्यमुनि और तिलवाड़ा बर्बाद हो गए थे. रामबाड़ा कस्बा तो पूरी तरह से गायब हो गया था. नदी की तलहटी की ऊंचाई 5 से 20 मीटर बढ़ गई थी. चोराबारी झील से निकले बहाव के साथ 1 से लेकर 5 मीटर ऊंचे बोल्डर यानी बड़े पत्थर बहकर आए थे. मंदाकिनी नदी का सबसे ज्यादा बहाव 16 जून 2013 की सुबह 9 बजे दर्ज किया गया था. यह 1378 m3/s था.