
मई के महीने में केदारनाथ, बद्रीनाथ समेत कई पहाड़ी इलाकों पर बर्फबारी हो रही है. दिल्ली में पिछले साल इस समय जो तापमान था उससे कई डिग्री नीचे चल रहा है. पिछले हफ्ते कई जगहों पर ओले गिरे. तूफान आया. तेज बारिश हुई. गर्मी क्या चली गई है? क्या अब गर्मी खत्म हो गई है? भारत का बड़ा इलाका क्या हिमयुग की तरफ जा रहा है? आखिरकार देश गर्मी के मौसम में कम तापमान क्यों बर्दाश्त कर रहा है?
पिछले साल 1 मई को देश का औसत अधिकतम तापमान 43.5 डिग्री सेल्सियस था. जो इस साल 28.7 ही रहा. 5 मई 2022 को 39.1 डिग्री सेल्सियस था, जो इस साल 32.1 डिग्री सेल्सियस रहा. तापमान में इतना अंतर आया कहां से. जहां तक बारिश की बात रही तो मई के महीने में कई इलाकों में बारिश होने का इतिहास रहा है. लेकिन इस बार बारिश जहां भी हुई तेज हुई. ताबड़तोड़. राजस्थान के कुछ इलाकों में ओले पड़े.
उत्तराखंड समेत कई पहाड़ी इलाकों में बारिश और बर्फबारी का दौरा जारी है. दिल्ली का तापमान भी कम चल रहा है. मौसम विभाग के अनुसार पिछले साल दिल्ली का न्यूनतम तापमान मई के पहले हफ्ते में 22 से 28 डिग्री सेल्सियस था. जो इस बार 15 डिग्री सेल्सियस रहा. अधिकतम तापमान 28 से 32 के बीच है, जबकि पिछले साल यह 40 के आसपास पहुंच गया था. चार-पांच दिन पहले तो दिल्ली कोहरे की चादर में लिपट गई थी.
इस महीने हीटवेव वाले दिन होंगे कमः मौसम विभाग
मौसम विभाग ने भी माना कि पिछले 15 दिनों में 4 मई ऐसी तारीख थी, जब दिल्ली ने 1901 के बाद तीसरी सबसे ठंडी सुबह देखी. पिछले 13 साल में 1 मई की तारीख दूसरी सबसे ठंडी तारीख थी. मौसम विभाग का अनुमान है कि इस महीने अभी बारिश के आसार हैं. हीटवेव वाले दिनों की संख्या में कमी आएगी. लेकिन मौसम में आए इस बदलाव के पीछे की वजह क्या है?
मौसम में आ रहे बदलाव की वजह पश्चिमी विक्षोभ
27 अप्रैल से 3 मई के बीच पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) ने हिमालय को कई बार हिट किया है. ये खास प्रकार के बारिश वाले सिस्टम है, जिनकी उत्पत्ति भूमध्यसागर में होती है. फिर ये पूर्व की ओर बढ़ती हैं. भारत में बारिश और बर्फबारी करवाती हैं. इन्हीं की वजह से हिमालय और मैदानी इलाकों में बर्फबारी और बारिश हो रही है. कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसकी वजह अल-नीनो है. यानी मध्य और पूर्वी ट्रॉपिकल प्रशांत महासागर के समुद्री सतह का गर्म होना.
लगातार आ रहे विक्षोभ से बदल रहा है मौसम
अल-नीनो की वजह से भारत में मॉनसून से पहले मौसम में कई बार बदलाव देखने को मिलता है. खासतौर से अप्रैल और मई के महीने में. पश्चिमी विक्षोभ लगातार गहराता जा रहा है. कई बार आने की वजह से मैदानी इलाकों में तापमान गिरा हुआ है. पश्चिमी विक्षोभ के कई हमले हो रहे हैं. हर हमला तीव्र है. जिसकी वजह से पहाड़ों पर बारिश और बर्फबारी हो रही है. उस वजह से निचले मैदानी इलाकों में भी मौसम ठंडा है.
फरवरी में आई थी गर्मी की लहर
मौसम विभाग ने फरवरी में अप्रत्याशित हीटवेव का अलर्ट जारी किया था. ये अलर्ट कोंकण और कच्छ इलाके के लिए था. इस साल फरवरी का महीना तुलनात्मक रूप से गर्म था. यह एक तरह से खतरनाक था क्योंकि भारत में हीटवेव की शुरुआत मार्च में होती है. आमतौर पर फरवरी में बढ़े तापमान की वजह कमजोर पश्चिमी विक्षोभ था. जिससे बारिश कम हुई. ये नवंबर से आना शुरू करता है.
दिसंबर, जनवरी और फरवरी तक रहता है. इसके बाद मार्च में यह उत्तर दिशा की ओर जाने लगता है. अब मामला थोड़ा बदल गया है. सर्दियों में यानी जनवरी से मार्च के बीच आने वाले पश्चिमी विक्षोभ अब अप्रैल और मई में भी सक्रिय रह रहे हैं. यह जलवायु परिवर्तन का नतीजा है. अभी तक इसके लंबे समय के प्रभाव की स्टडी नहीं की गई. 7 मई को जब तापमान ज्यादा होना चाहिए था, तब यह सामान्य के आसपास ही था.
क्या है अल नीनो?
ट्रॉपिकल पैसिफिक यानी ऊष्ण कटिबंधीय प्रशांत के भूमध्यीय क्षेत्र में समुद्र का तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में आने वाले बदलाव के लिए जिम्मेदार समुद्री घटना को अल नीनो कहते हैं. इस बदलाव की वजह होती है समुद्री सतह के तापमान का सामान्य से अधिक हो जाना. यानी सामान्य से 4 से 5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा होना. इसकी वजह ग्लोबल वॉर्मिंग भी हो सकती है.
भारत के मॉनसून वाले मौसम पर क्या असर होगा?
अल नीनो का दुनियाभर के मौसम पर बड़ा असर होता है. बारिश, ठंड, गर्मी सबमें अंतर दिखता है. राहत की बात ये है कि ये अल नीनो या ला नीना हर साल नहीं, बल्कि 3 से 7 साल में आते हैं. अल नीनो में प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी-भूमध्यरेखीय इलाके के सतह का तापमान तेजी से बढ़ता है.
पूर्व दिशा से पश्चिम की ओर बहने वाली हवाएं कमजोर हो जाती है. इसकी वजह से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र की सतह का गर्म पानी भूमध्य रेखा के साथ-साथ पूर्व की ओर बढ़ता है. इससे बारिश में बदलाव आता है. कम बारिश वाली जगहों पर ज्यादा बारिश होती है. यदि अल नीनो दक्षिण अमेरिका की तरफ सक्रिय है तो भारत में उस साल कम बारिश होती है. जो इस बार दिख रहा है.
सर्दियां ला नीना में बीतीं, गर्मियां न्यूट्रल यानी मॉनसून में कमी
कोलंबिया क्लाइमेट स्कूल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी के मुताबिक 2020 में शुरू हुआ ला नीना अब फरवरी से अप्रैल 2023 के बीच अल नीनो में बदल रहा है. यानी एन्सो-न्यूट्रल हो रहा है. इसका असर जून से अगस्त के बीच देखने को मिलेगा. क्योंकि प्रशांत महासागर का पश्चिमी हिस्सा गर्म हो रहा है.
अक्षय देवरास कहते हैं कि पश्चिमी प्रशांत महासागर की सतह के नीचे पानी लगातार गर्म हो रहा है. यह तेजी से मध्य प्रशांत की ओर बढ़ रहा है. इसलिए मार्च से मई 2023 के बीच न्यूट्रल फेज 78 फीसदी तक होने की उम्मीद है. यानी भारत के लिए बुरी खबर है. क्योंकि सर्दियों में ला नीना था. जो गर्मियों को एन्सो-न्यूट्रल में बदल रहा है. मॉनसून में सामान्य से 15 फीसदी कम तक बारिश होने की आशंका है. इसमें सुधार हो सकता है, अगर आर्कटिक से पैदा होने वाली हवाएं देर से बारिश करा दें. जैसा- साल 2021-22 में हुआ था.