
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 7 मार्च की शाम साढ़े चार बजे के बाद रात तक किसी भी समय मेघा-ट्रॉपिक्स-1 सैटेलाइट (Megha-Tropiques-1) को नियंत्रित तरीके से धरती पर गिराने जा रहा है. इस सैटेलाइट को 12 अक्टूबर 2011 को इसरो और फ्रांसीसी स्पेस एजेंसी CNES ने लॉन्च किया था. ताकि उष्णकटिबंधीय मौसम और जलवायु परिवर्तन की स्टडी की जा सके.
मेघा-ट्रॉपिक्स-1 सैटेलाइट को प्रशांत महासागर में पांच डिग्री साउथ से 14 डिग्री साउथ के लैटीट्यूड और 119 डिग्री वेस्ट से 100 डिग्री वेस्ट के बीच कहीं पर गिराया जा रहा है. इसे गिराने के लिए इसरो पिछले साल अगस्त से जुटा हुआ था. वह लगातार इसकी दूरी को कम करता जा रहा था. इसमें बचे ईंधन के जरिए इसका ऑर्बिट लगातार बदला जा रहा था. अब जाकर यह धरती के नजदीक पहुंच चुका है.
पृथ्वी पर पहुंचने से पहले दो बार बूस्टर को ऑन किया जाएगा. इस प्रक्रिया को डी-बूस्ट कहते हैं. इसके बाद शाम साढ़े चार से साढ़े सात बजे के बीच किसी समय ग्राउंड इम्पैक्ट देखने को मिलेगा. यानी सैटेलाइट वायुमंडल में आएगा. इसरो ने इसका सिमुलेशन कर लिया है कि इससे कोई नुकसान तो नहीं है. पता चला है कि इस काम से सैटेलाइट का कोई बड़ा हिस्सा वायुमंडल को पार करके धरती तक नहीं आ पाएगा.
एक दशक तक दी मौसम की जानकारी
वायुमंडल में आते ही सैटेलाइट तेजी से जलना शुरू होगा. समुद्र तक आते-आते यह पूरी तरह से खत्म हो जाएगा. अगर कुछ हिस्सा बच भी गया तो उससे कोई नुकसान नहीं होगा. क्योंकि यह प्रशांत महासागर के ऊपर गिराया जा रहा है. इस सैटेलाइट को जब भेजा गया था, तब माना जा रहा था कि यह अधिकतम तीन साल काम करेगा. लेकिन इसने 2011 तक वैश्विक स्तर के जलवायु परिवर्तन और भारत के मौसम की जानकारी दी.
इसरो क्यों गिरा रहा है सैटेलाइट को वापस
संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था है UNIADC. यह धरती के करीब घूम रहे उन सैटेलाइट्स पर नजर रखती है, जिनकी उम्र खत्म होने वाली होती है. या फिर वह काम खत्म कर चुका होता है. संस्था उस सैटेलाइट को छोड़ने वाले देश से कहती है कि ये सैटेलाइट अपना जीवन पूरा करके धरती पर गिरे उससे बेहतर है कि आप इसे गिरा दो. ताकि सैटेलाइट के गिरने से किसी तरह के जानमाल का नुकसान न हो.
नीचे नहीं लाते तो 100 साल घूमता ऑर्बिट में
खास तौर से उन सैटेलाइट्स को नीचे लाना जरूरी है जिनकी उम्र 25 साल से कम है. साथ ही इसरो को यह निर्देश दिया गया है कि सैटेलाइट को जमीन पर लाने के दौरान कोई पोस्ट मिशन एक्सीडेंटल ब्रेकअप न हो, इसलिए पैसीवेशन की प्रक्रिया को पूरा करने को कहा गया है. अगर यह सैटेलाइट अभी नीचे नहीं लाया जाता तो कम से कम यह अगले 100 सालों तक धरती की कक्षा में घूमता रहता.
प्रशांत महासागर में गिरेगा यह सैटेलाइट
यह धरती से करीब 874 किलोमीटर ऊंची कक्षा में 20 डिग्री एंगल पर झुक कर चक्कर लगा रहा था. इसके पास करीब 125 किलोग्राम ईंधन बचा है. जो इसे धरती पर वापस लाने के लिए पर्याप्त है. वैज्ञानिक इसे ऐसी जगह पर गिराएंगे जहां पर कोई भी इंसान या जीव न रहता हो. इसलिए उन्होंने प्रशांत महासागर की एक जगह चुनी.
सैटेलाइट को वापस लाने के हिसाब से नहीं बनाया गया था. लेकिन अब ये करना पड़ रहा है. इसलिए इसकी नियंत्रित एंट्री काफी जटिल प्रक्रिया होगी. इसरो वैज्ञानिकों को एड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा.