
भारत समेत एशिया के कई देशों के लोग बेहाल हैं. वजह गर्मी है जो इस बार पहले आ गई. इस बार एशियाई महाद्वीप में इतनी गर्मी पड़ क्यों रही है? भारत में पिछले हफ्ते 13 लोगों की हीट स्ट्रोक से मौत हो गई. बांग्लादेश में तापमान ने 60 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया. थाईलैंड में भी गर्मी से दो लोग मारे गए हैं.
दुनियाभर के वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग ही इस बुरे मौसम की वजह है. संयुक्त राष्ट्र के IPCC की नई रिपोर्ट के मुताबिक जितना ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ेगा. उतनी बार ही मौसम की मार दोगुनी तेजी से बढ़ेगी. चाहे गर्मी हो या बारिश. थाईलैंड के मौसम विभाग ने कहा कि बुधवार को वहां रिकॉर्ड तोड़ गर्मी थी. पारा 44.6 डिग्री सेल्सियस पर था.
थाईलैंड के मौसम विभाग के डिप्टी डायरेक्टर जनरल थानासिट इमानानचाई ने बताया कि अगले हफ्ते तक के लिए अधिक तापमान की चेतावनी जारी की गई है. क्लाइमेट पॉलिसी इंस्टीट्यूट क्लाइमेट एनालिसिस के साइंटिस्ट फहद सईद कहते हैं कि थाईलैंड, चीन और दक्षिण एसिया में इस बार रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ने वाली है. ये आपदा है आपदा.
भारत में हीटवेव से 31 साल में 24 हजार लोगों की मौत
यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के स्कॉलर रमित देबनाथ की स्टडी के मुताबिक भारत में गर्मी की वजह से 31 सालों में 24 हजार लोगों की मौत हो चुकी है. गर्मी से वायु प्रदूषण भी बढ़ा है. ग्लेशियर भी पिघले हैं. भारत इस समय कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहा है. देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह की प्राकृतिक घटनाएं और आपदाएं देखने को मिलती हैं. ऐसा हर साल जनवरी से अक्टूबर के महीने तक देखने को मिलता है.
भारत का 90% हिस्सा अत्यधिक गर्मी वाले इलाके में
रमित के मुताबिक भारत का 90 फीसदी इलाका अत्यधिक गर्मी वाले खतरनाक जोन (Extreme Heat Danger Zone) में आता है. भारत अधिक गर्मी को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है. हीटवेव को आपदा में शामिल करना होगा. ताकि लोगों के लिए बेहतर प्लान बनाए जा सकें.
भारत के सोशल डेवलपमेंट गोल्स में गरीबी, भूख, असमानता और बीमारी तो है लेकिन हीटवेव को लेकर कुछ खास नहीं कहा गया है. अधिक गर्मी की वजह से भारत में आउटडोर वर्किंग कैपेसिटी में 15 फीसदी की गिरावट आएगी. 48 करोड़ लोगों का जीवन बुरी तरह से प्रभावित होगा. 2050 तक जीडीपी को 5.4 फीसदी का नुकसान होगा.
भारत में पिछले हफ्ते 13 लोगों की मौत
म्यांमार समुद्री सतह से ज्यादा ऊपर नहीं है. काफी इलाके निचले हैं. यहां पर जलवायु परिवर्तन का काफी ज्यादा असर दिख रहा है. यहां भयावह बाढ़ आ रही है. या फिर अचानक से बारिश शुरू हो जाती है. उधर भारत की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. महाराष्ट्र में पिछले हफ्ते 13 लोगों की मौत हीटस्ट्रोक की वजह से हुई है.
उत्तर और पूर्वी राज्यों में पारा 3-4 डिग्री ऊपर
भारत में इस समय उत्तरी और पूर्वी इलाके सामान्य से 3 से 4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा तापमान बर्दाश्त कर रहे हैं. उत्तर-पूर्व में गुवाहाटी के लोगों को गर्मी महसूस हो रही है. वो इलाका आमतौर पर ठंडा रहता है. हालत ऐसी है कि पूरे एशिया में गर्मी का नक्शा लाल हुआ पड़ा है. यहां तक कि रूस का बड़ा इलाका भी ज्यादा गर्मी बर्दाश्त कर रहा है.
जल्दी गर्मी का आना सभी के लिए खतरनाक
हम इंसान किसी भी मौसम के लिए उसके तयशुदा समय पर आने के आदी हैं. अगर मौसम का समय बदल जाए. तो लोग बीमार हो जाते हैं. फसलें खराब हो जाती हैं. व्यवहार में बदलाव आता है. जल्दी गर्मी आने से उन इलाकों में दिक्कत होगी, जहां पर इसे बर्दाश्त करने की व्यवस्थाएं नहीं हैं. हर किसी के पास एसी या कूलर नहीं होता.
अगर इलाका हरा-भरा हो तो भी आप गर्मी से बहुत हद तक राहत पा सकते हैं. लेकिन शहरी इलाके में यह संभव नहीं है. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के पर्यावरणविद मिशेल मेंडेज कहती हैं कि कुछ जगहों पर हीटवेव प्राकृतिक घटना है. लेकिन कई जगहों पर राजनीतिक विकल्प. अगर लोग या सरकार चाहे तो दशकों में गर्मी को बर्दाश्त करने का इंफ्रास्ट्रक्चर, नीतियां या सुविधाएं खड़ी कर सकते थे. पर आमतौर पर ऐसा होता नहीं है.
अल-नीनो ने कर दिया खेल, गर्मी की दौड़ेगी रेल
अगर गर्मियां देर से आती हैं, तब भी ज्यादा तापमान रहता है. ऐसे में हीटवेव की वजह से मरने वालों की संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है. दुनिया भर के एक्सपर्ट ये मानते हैं कि इस बार चिलचिलाती गर्मी पड़ेगी. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) के मुताबिक ये साल अल-नीनो (El-Nino) या एन्सो न्यूट्रल ईयर (ENSO-neutral year) हो सकता है. मतलब ये कि इसकी वजह से गर्मी ज्यादा रहेगी. मॉनसून में बारिश भी सामान्य से कम होगी.
नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फियरिक साइंस के रिसर्च साइंटिस्ट अक्षय देवरास ने CSE को बताया था कि अभी के हिसाब से 2023 की गर्मियां अल-नीनो यानी एन्सो-न्यूट्रल की तरफ इशारा कर रहा है. अल-नीनो, ला-नीना और न्यूट्रल फेज अल-नीनो साउदर्न ऑसीलेशन के हिस्से हैं. जो वायुमंडलीय सर्कुलेशन को बदलते हैं.
अमेरिकन जियोसाइंस इंस्टिट्यूट के अनुसार अल नीनो और ला नीना शब्द का संदर्भ प्रशांत महासागर की समुद्री सतह के तापमान में समय-समय पर होने वाले बदलावों से है, जिसका दुनिया भर में मौसम पर प्रभाव पड़ता है. अल नीनो की वजह से तापमान गर्म होता है और ला नीना के कारण ठंडा.
अल नीनो का असर देखने को मिलेगा भारत के मौसम पर?
ट्रॉपिकल पैसिफिक यानी ऊष्ण कटिबंधीय प्रशांत के भूमध्यीय क्षेत्र में समुद्र का तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में आने वाले बदलाव के लिए जिम्मेदार समुद्री घटना को अल नीनो कहते हैं. इसकी वजह होती है समुद्री सतह के तापमान का सामान्य से 4-5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा होना. इसकी वजह ग्लोबल वॉर्मिंग भी हो सकती है.
भारत के मौसम पर ये हो रहा असर
अल नीनो का दुनियाभर के मौसम पर बड़ा असर होता है. बारिश, ठंड, गर्मी सबमें अंतर दिखता है. राहत की बात ये है कि ये अल नीनो या ला नीना हर साल नहीं, बल्कि 3 से 7 साल में आते हैं. अल नीनो में प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी-भूमध्यरेखीय इलाके के सतह का तापमान तेजी से बढ़ता है.
पूर्व दिशा से पश्चिम की ओर बहने वाली हवाएं कमजोर हो जाती है. इसकी वजह से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र की सतह का गर्म पानी भूमध्य रेखा के साथ-साथ पूर्व की ओर बढ़ता है. इससे गर्मी बढ़ जाती है. बारिश में बदलाव आता है. कम बारिश वाली जगहों पर ज्यादा बारिश होती है. यदि अल नीनो दक्षिण अमेरिका की तरफ सक्रिय है तो भारत में उस साल कम बारिश होती है. जो इस बार दिख रहा है.
गर्मियां न्यूट्रल यानी पारा ज्यादा, भारत के लिए बुरी खबर
कोलंबिया क्लाइमेट स्कूल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी के मुताबिक 2020 में शुरू हुआ ला नीना अब फरवरी से अप्रैल 2023 के बीच अल नीनो में बदल रहा है. यानी एन्सो-न्यूट्रल हो रहा है. इसका असर जून से अगस्त के बीच देखने को मिलेगा. क्योंकि प्रशांत महासागर का पश्चिमी हिस्सा गर्म हो रहा है.
पश्चिमी प्रशांत महासागर की सतह के नीचे पानी लगातार गर्म हो रहा है. यह तेजी से मध्य प्रशांत की ओर बढ़ रहा है. इसलिए मार्च से मई 2023 के बीच न्यूट्रल फेज 78% तक होने की उम्मीद है. यानी भारत के लिए बुरी खबर है. क्योंकि सर्दियों में ला नीना था. जो गर्मियों को एन्सो-न्यूट्रल में बदल रहा है.
बांग्लादेश में बारिश के लिए की गई पूजा
फहद ने बताया कि इस बार लोगों की सेहत पर काफी ज्यादा असर पड़ेगा. इसकी सबसे बुरी मार गरीब इंसान बर्दाश्त करेगा. म्यांमार के 42 वर्षीय ड्राइवर को थेट ऑन्ग कहते हैं कि वो यांगून में दिन में टैक्सी नहीं चला पा रहे हैं. इतनी ज्यादा गर्मी हो रही है. बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हजारों लोगों ने 40.6 डिग्री सेल्सियस में बारिश के लिए पूजा की.
शरीर का गर्मी में एक्लेमेटाइजेशन जरूरी है
अचानक से तापमान के बढ़ने से लोग हैरान हो जाते हैं. बिना तैयारी के बाहर निकलने पर हीटस्ट्रोक का चांस बढ़ जाता है. लोगों की मौत होने लगती है. बोस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफसर पैट्रिक किनी कहते हैं कि गर्मियों के साथ एक्लेमेटाइजेशन जरूरी है. यानी शरीर में पानी की सही मात्रा का होना. इलेक्ट्रोलाइट भी सही रखना चाहिए. ताकि खून के तेज बहाव की वजह से पसीने के जरिए निकलने वाला इलेक्ट्रोलाइट कम न हो. इससे नुकसान होता है.
अमेरिका में भी तापमान औसत से ज्यादा
जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्मियों का समय बढ़ता जा रहा है. यानी ज्यादा लंबे समय तक गर्मी रहती है. ठंडी जल्दी खत्म हो जाती है. ज्यादा गर्मी का असर बारिश के मौसम पर भी पड़ता है. पाकिस्तान और भारत में पिछले साल भी इसी तरह की हालत बनी हुई है. आधा अमेरिका औसत तापमान से माइनस 6.66 से माइन 1.11 डिग्री सेल्सियस ज्यादा थी.
जलवायु परिवर्तन है इसकी बड़ी वजह
जलवायु परिवर्तन की वजह से लगातार प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं. मौसम बदल रहे हैं. रात का तापमान भी तेजी से बढ़ रहा है. NOAA के मुताबिक 1895 से अब तक रात के तापमान में औसत दोगुना अंतर आया है. अगर ह्यूमिडिटी है तो उतनी दिक्कत नहीं होती. लेकिन एकदम सूखी गर्मी पड़ती है तो लोग बीमार होते हैं. हीटस्ट्रोक की वजह से मारे जाते हैं. जैसे रेगिस्तानी इलाके. सहारा, थार या कैलिफोर्निया.