
साइक्लोन बिपरजॉय ने गुजरात में जो तबाही मचाई. वो मचाई. अब उसकी वजह से रेत के धोरों वाले राज्य यानी रेगिस्तानी राजस्थान में भी आफत आ गई है. कई जिलों में बाढ़ आई हुई है. वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार में हीटवेव से लोगों की मौत हो रही है. अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं. जमीन और आसमान से निकलता पारा उन्हें पिघला रहा है.
राजस्थान के जालोर, सिरोही, अजमेर और बाड़मेर में भारी बारिश के बाद बाढ़ के हालात है. कई जिलों के अस्पतालों में पानी घुस गया है. वहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पूरा बिहार लगातार हीटवेव से जूझ रहा है. प्रचंड गर्मी है. दोनों राज्यों में गर्मी से मरने वाली की संख्या 100 पार हो चुकी है.
देहरादून स्थित मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक बिक्रम सिंह ने aajtak.in ने कहा कि मई-जून में गर्मी तो होती है. जहां गर्मी पड़ रही है. वह सामान्य मौसम है इन महीनों का. मॉनसून थोड़ा पहले आता तो ऐसी स्थिति नहीं रहती. साइक्लोन की वजह से मॉनसून पर थोड़ा असर पड़ा है. लेकिन ज्यादा नहीं.
डॉ. सिंह ने बताया कि गुजरात, राजस्थान या सटे इलाकों में जो बारिश हो रही है, वह साइक्लोन की वजह से है. अब जहां गर्मी पड़ रही है. वह तो सामान्य स्थिति है इस महीने की. न तो वहां मॉनसून है, न ही साइक्लोन का असर. इसलिए हीटवेव चल रहा है. ये सिर्फ दो-तीन और रहेगा. फिर गर्मी और हीटवेव वाले इलाकों में भी मॉनसूनी बारिश शुरू हो जाएगी. फिर इन राज्यों को गर्मी से राहत मिल जाएगी.
भारत में हीटवेव से 31 साल में 24 हजार लोगों की मौत
यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के स्कॉलर रमित देबनाथ की स्टडी के मुताबिक भारत में गर्मी की वजह से 31 सालों में 24 हजार लोगों की मौत हो चुकी है. गर्मी से वायु प्रदूषण भी बढ़ा है. ग्लेशियर भी पिघले हैं. भारत इस समय कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहा है. देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह की प्राकृतिक घटनाएं और आपदाएं देखने को मिलती हैं. ऐसा हर साल जनवरी से अक्टूबर के महीने तक देखने को मिलता है.
भारत का 90% हिस्सा अत्यधिक गर्मी वाले इलाके में
रमित के मुताबिक भारत का 90 फीसदी इलाका अत्यधिक गर्मी वाले खतरनाक जोन (Extreme Heat Danger Zone) में आता है. भारत अधिक गर्मी को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है. हीटवेव को आपदा में शामिल करना होगा. ताकि लोगों के लिए बेहतर प्लान बनाए जा सकें.
भारत के सोशल डेवलपमेंट गोल्स में गरीबी, भूख, असमानता और बीमारी तो है लेकिन हीटवेव को लेकर कुछ खास नहीं कहा गया है. अधिक गर्मी की वजह से भारत में आउटडोर वर्किंग कैपेसिटी में 15 फीसदी की गिरावट आएगी. 48 करोड़ लोगों का जीवन बुरी तरह से प्रभावित होगा. 2050 तक जीडीपी को 5.4 फीसदी का नुकसान होगा.
गर्मियां न्यूट्रल यानी पारा ज्यादा
कोलंबिया क्लाइमेट स्कूल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी के मुताबिक 2020 में शुरू हुआ ला नीना अब फरवरी से अप्रैल 2023 के बीच अल नीनो में बदल रहा है. यानी एन्सो-न्यूट्रल हो रहा है. इसका असर जून से अगस्त के बीच देखने को मिलेगा. क्योंकि प्रशांत महासागर का पश्चिमी हिस्सा गर्म हो रहा है.
पश्चिमी प्रशांत महासागर की सतह के नीचे पानी लगातार गर्म हो रहा है. यह तेजी से मध्य प्रशांत की ओर बढ़ रहा है. इसलिए मार्च से मई 2023 के बीच न्यूट्रल फेज 78% तक होने की उम्मीद है. यानी भारत के लिए बुरी खबर है. क्योंकि सर्दियों में ला नीना था. जो गर्मियों को एन्सो-न्यूट्रल में बदल रहा है.
शरीर का गर्मी में एक्लेमेटाइजेशन जरूरी है
अचानक से तापमान के बढ़ने से लोग हैरान हो जाते हैं. बिना तैयारी के बाहर निकलने पर हीटस्ट्रोक का चांस बढ़ जाता है. लोगों की मौत होने लगती है. बोस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफसर पैट्रिक किनी कहते हैं कि गर्मियों के साथ एक्लेमेटाइजेशन जरूरी है. यानी शरीर में पानी की सही मात्रा का होना. इलेक्ट्रोलाइट भी सही रखना चाहिए. ताकि खून के तेज बहाव की वजह से पसीने के जरिए निकलने वाला इलेक्ट्रोलाइट कम न हो. इससे नुकसान होता है.
जलवायु परिवर्तन है इसकी बड़ी वजह
जलवायु परिवर्तन की वजह से लगातार प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं. मौसम बदल रहे हैं. रात का तापमान भी तेजी से बढ़ रहा है. NOAA के मुताबिक 1895 से अब तक रात के तापमान में औसत दोगुना अंतर आया है. अगर ह्यूमिडिटी है तो उतनी दिक्कत नहीं होती. लेकिन एकदम सूखी गर्मी पड़ती है तो लोग बीमार होते हैं. हीटस्ट्रोक की वजह से मारे जाते हैं. जैसे रेगिस्तानी इलाके. सहारा, थार या कैलिफोर्निया.