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दुनिया ने महसूस की इस बार सबसे गर्म जनवरी... अभी तो आग बरसना बाकी, वैज्ञानिकों की चेतावनी

पिछला महीना यानी जनवरी इतिहास का सबसे गर्म महीना था. यूरोपियन यूनियन के वैज्ञानिकों ने बताया है कि अभी और गर्मी पड़ने की आशंका है. औसत तापमान बढ़ा रहेगा. यह सब जलवायु परिवर्तन और इंसानों द्वारा किए जा रहे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की वजह से हो रहा है.

इस साल जनवरी का महीना सबसे गर्म रहा. (फोटोः रॉयटर्स) इस साल जनवरी का महीना सबसे गर्म रहा. (फोटोः रॉयटर्स)
आजतक साइंस डेस्क
  • ब्रसेल्स,
  • 08 फरवरी 2024,
  • अपडेटेड 5:41 PM IST

दुनिया ने अभी-अभी सबसे गर्म जनवरी का महीना महसूस किया है. जलवायु परिवर्तन की वजह से लगातार गर्मी बढ़ रही है. अभी और आग बरसने वाली है. यह खुलासा यूरोपियन यूनियन कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) के वैज्ञानिकों ने किया है. इसके पहले 2020 की जनवरी गर्म थी. C3S लगातार 1950 गर्म तापमान का रिकॉर्ड रख रही है. 

पिछला साल मानव इतिहास का सबसे गर्म साल था. उसके ठीक बाद जनवरी 2024 ने भी सबसे गर्म होने का रिकॉर्ड बना दिया. इस बढ़ी हुई गर्मी की मुख्य वजह इंसानों द्वारा किए जा रहा जलवायु परिवर्तन है. साथ ही इसमें मुख्य भूमिका अल-नीनो निभा रहा है. इससे पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ा हुआ है. वहीं से दुनिया का मौसम बदल रहा है. 

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C3S की डिप्टी डायरेक्टर समांथा बर्गीस ने कहा कि पिछले साल जून से जितने भी महीने आए वो सब के सब गर्मी का रिकॉर्ड तोड़ रहे थे. हर महीना 2022 के उसी महीने से गर्म था. सिर्फ इतना ही नहीं, प्री-इंडस्ट्रियल काल की तुलना में पिछले 12 महीने 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान था. 

ये साल होगा पांच सबसे गर्म साल में शामिल, 99% संभावना

समांथा ने कहा कि तत्काल ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना ही इसका एक इलाज है. नहीं तो दुनिया और गर्म होती चली जाएगी. अमेरिका के वैज्ञानिकों ने भी कहा था कि इस साल भी भयानक गर्मी पड़ेगी. 99 फीसदी संभावना है कि यह साल भी पांच सबसे गर्म साल में एक हो. पिछले महीने अल-नीनो कमजोर पड़ना शुरू हुआ है. 

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मौका है ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तुरंत रोकना होगा

इसका मतबल ये है कि इस साल के अंत तक ला-नीना यानी ठंड वाला मौसम आना शुरू होगा. प्रशांत महासागर ठंडा होने लगेगा. पिछले महीने समुद्री सतह का तापमान सबसे अधिक था. यह 2015 के पेरिस एग्रीमेंट की धज्जियां उड़ा रहा था. हालांकि अब भी मौका है कि इसे ठीक किया जा सके. पेरिस एग्रीमेंट के नियमों का पालन करके सुधार ला सकते हैं. 

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देश और सरकारें नहीं कर रही हैं CO2 में कटौती

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि पेरिस एग्रीमेंट के टारगेट को पूरा करना प्रैक्टिकल नहीं है. अगर सभी देश और उनकी सरकारें मिल कर तेजी से कार्बन डाईऑक्साइड में कटौती करती हैं तो थोड़ी राहत मिल सकती है. नहीं तो अगले कुछ वर्षों में गर्मी मौत बनकर बरसेगी. कई जगहों पर सूखा पड़ेगा. इससे इंसानों और पर्यावरण दोनों पर असर होगा. 

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