
जब शरीर को ऑक्सीजन की सप्लाई बंद हो जाती है, उसके कुछ ही मिनटों के भीतर अंगों की सारी व्यवस्था ठप पड़ जाती है. इसे पॉइंट ऑफ नो रिटर्न कहते हैं, यानी जहां से वापसी मुमकिन नहीं. ये वो स्थिति है, जब शरीर का टेंपरेचर हर घंटे डेढ़ से 2 डिग्री तक गिरता जाता है. कोशिकाओं के मरने की वजह से शरीर से गंध आने लगती है. माने शरीर का सब कुछ रुक चुका होता है. कुछ ऑर्गन काम कर भी रहे होते हैं तो ज्यादा देर के लिए नहीं. वहीं वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क में एक ऐसे जीन का पता लगाया, जो मौत के बाद ही एक्टिव होता है, यहां तक कि तेजी से बढ़ने भी लगता है.
ऊतकों को कमरे के तापमान पर रखा गया
यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉयस के शोधकर्ताओं ने न्यूरोलॉजिकल कंडीशन से जूझ रहे एक मरीज की सर्जरी के दौरान उसके ब्रेन टिश्यू को अलग निकालकर स्टडी किया. इसमें उन्होंने देखा कि टिश्यू की बाकी कोशिकाएं तो मर गईं, लेकिन एक कोशिका न केवल जीवित रही, बल्कि बहुत तेजी से ग्रोथ भी करने लगी. इस बात को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने दोबारा स्टिम्युलेटेड ब्रेन एक्सपेरिमेंट किया, जिसमें मस्तिष्क के ऊतकों को रूम टेंपरेचर पर रखकर 24 घंटों तक देखा गया.
अलग दिखा इन जीन्स का व्यवहार
जैसा कि अनुमान था, इस दौरान सामने आया कि मस्तिष्क की फैसला लेने और याद रखने में मदद करने वाली कोशिकाएं तेजी से अपने गुण खो देती हैं, वहीं जॉम्बी जीन्स उन्हीं 24 घंटों के भीतर न केवल एक्टिव हुईं, बल्कि तेजी से बढ़कर कई गुना हो गईं. ये जीन्स ग्लिअन सेल्स की श्रेणी की पाई गईं, जो अक्सर सिर में चोट लगने पर एक्शन में आती हैं. इनका काम ब्रेन को किसी जख्म से बचाना होता है. माना जा रहा है कि जॉम्बी सेल्स का काम भी यही होगा. वे अनुमान के सहारे ब्रेन को काम करते रहने में मदद करती हैं.
अल्जाइमर्स जैसी बीमारियों के इलाज में मदद की उम्मीद
ये स्टडी साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुई. वैज्ञानिक फिलहाल इसपर काम ही कर रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि जॉम्बी सेल्स की मदद से कई न्यूरोसाइकेट्रिक बीमारियों, अल्जाइमर्स, डिमेंशिया, ऑटिज्म का इलाज खोजा जा सकेगा. बता दें कि इनपर शोध के लिए अब तक वैज्ञानिक बिरादरी केवल पोस्टमार्टम टिश्यू पर निर्भर है. इससे उतना सटीक शोध नहीं हो पा रहा. अब जबकि ये दिख चुका कि मौत के 24 घंटों बाद भी कोई कोशिका विकास कर रही है तो इसके साथ न्यूरोसाइकेट्रिक बीमारियों पर स्टडी ज्यादा आसान हो सकेगी.
मौत के बाद भी शरीर एकदम से नहीं मरता
ये तो हुई ब्रेन सेल्स की बात, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मौत के बाद भी शरीर के कई ऑर्गन काम करते रहते हैं, जैसे लिवर, किडनी और हार्ट. ऑर्गन डोनेट के दौरान ध्यान रखना होता है कि डोनर के जाने के आधे घंटे से लेकर 6 घंटों के भीतर अंग डोनेट होकर प्रत्यारोपित हो जाएं. मौत के बाद शरीर की कई एक्टिविटीज बी चलती रहती हैं, जैसे बाल और नाखूनों का बढ़ना. इसी तरह से पेट में पाए जाने वाले गुड बैक्टीरिया खाना पचाने के काम में लगे होते हैं.
कई चरण हैं मौत के
ये बात भी है कि मौत की प्रक्रिया शुरू होने के दौरान, यानी जब हार्ट खून पंप करना बंद करता है, उससे कुछ पहले ही डाइजेशन की प्रोसेस स्लो हो जाती है. डायजेस्टिव ट्रैक अपनी नमी खो देता है. यही कारण है कि उम्रदराज मरीज के साथ अक्सर दिखता है कि मौत से कई दिन पहले से वो खाना-पीना लगभग छोड़ चुका होता है. डॉक्टर मौत के इन अलग-अलग पड़ावों को अलग नामों से बुलाते हैं, जैसे सोशल, साइकोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल डेथ.