
दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में 18 जनवरी को, शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के बागी नेता मिले और उनमें गुट बनाकर सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व को चुनौती देने की रणनीतियों पर चर्चा हुई. गठबंधन की अगुआई के लिए उन्होंने अकाली दल के राज्यसभा सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा को पहले से ही चुन लिया था. तीन दशक तक पार्टी महासचिव रहे ढींढसा ने पिछले साल अक्तूबर में राज्यसभा में पार्टी के नेता पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके तुरंत बाद, उनके बेटे परमिंदर सिंह ढींढसा ने पंजाब विधानसभा में पार्टी के विधायक दल के नेता का पद छोड़ दिया था.
राजनैतिक रूप से अकाली दल अपने मूल जनाधार—पंथिक मतदाताओं को साथ जोड़े रखने के लिए संघर्ष कर रहा है. बादल के प्रतिद्वंद्वियों का आरोप है कि 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं के बाद हुए सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों को संभालने में सरकार ने बहुत गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाया था. तब पुलिस ने कोटकपूरा और फरीदकोट में बेहबल कलां में प्रदर्शनकारियों पर गोलियां भी चलाई थीं. तब पंजाब में एसएडी-भाजपा गठबंधन की सरकार थी.
हालांकि सुखबीर इंडिया टुडे से बातचीत में कहते हैं कि पार्टी के लिए राजनीति का खराब दौर गुजर चुका है लेकिन उनके कई सहयोगी इससे असहमत हैं. वे बताते हैं कि जनवरी के मध्य में, इसी तरह की समस्या तब पैदा हुई थी, जब बादल परिवार के स्वामित्व वाले एक टीवी चैनल पीटीसी पंजाबी ने स्वर्ण मंदिर से प्रतिदिन प्रसारित होने वाले हुकमनामा पर अपने बौद्धिक संपदा अधिकारों का दावा कर दिया. इसने सिख समुदाय को काफी नाराज किया. एसएडी के एक विधायक बताते हैं, ''एसएडी कोई और नए धार्मिक विवाद का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है.'' यह खासतौर पर इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि विधानसभा चुनाव अब सिर्फ दो साल दूर हैं. पार्टी को अपनी पुनरुद्धार रणनीति जल्द ही बनाने की जरूरत है, अन्यथा सहयोगी भाजपा की सौदेबाजी बढ़ जाएगी और सत्ताधारी कांग्रेस का हाथ भी मजबूत होने का जोखिम भी है.
सुखबीर जानते हैं कि हालिया घटनाओं ने पार्टी के लिए आगे का रास्ता और अधिक कठिन बना दिया है. अब स्थितियों को संभालने का सारा दारोमदार अकेले उनके कंधे पर ही है. उनके पिता और पंजाब के पांच बार के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल अब 92 वर्ष के हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहते हैं. रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, रतन सिंह अजनाला और सेवा सिंह सेखवां जैसे पार्टी के पूर्व दिग्गजों की तरफ से गठित एक पार्टी शिरोमणि अकाली दल (टकसाली) एसएडी के सामने दूसरी बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी हो गई है.
2018 के अंत में पार्टी से बरखास्त होने के बाद, इन नेताओं ने उसी साल दिसंबर में इस पार्टी का गठन किया था. इन नेताओं की माझा क्षेत्र, जिसमें गुरदासपुर, अमृतसर और तरनतारन शामिल हैं, के मतदाताओं में अच्छी पैठ है. दिल्ली और पंजाब में अकाली गुटों के अन्य कई नेता—परमजीत सिंह सरना, मंजीत सिंह जीके और रवि इंदर सिंह—ढींढसा के साथ खड़े दिखाई देते हैं. हालांकि सुखबीर का तर्क है कि इन नेताओं का व्यापक जनाधार नहीं है फिर भी पार्टी के सामने उसके नेताओं के अलग होने की चुनौती तो है.
2019 के लोकसभा चुनावों में अकाली दल सिर्फ दो सीटें जीत सका था. फिरोजपुर से सुखबीर बादल जीते जबकि बठिंडा से उनकी पत्नी हरसिमरत कौर बादल जीतीं. हालांकि पार्टी के अपने कुल वोट शेयर में मामूली रूप वृद्धि हुई जो 26 प्रतिशत से 27.5 प्रतिशत रहा. पार्टी के लिए विशेष चिंता की बात यह है कि इन सीटों के अलावा, उसे राज्य के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र मालवा में एक दमदार दावेदार के रूप में भी नहीं देखा गया. मुमकिन है कि सुखदेव ढींढसा का उनके गढ़ संगरूर (मालवा बेल्ट) के आसपास बड़ा मतदाता आधार नहीं हो लेकिन उनके पार्टी छोडऩे से स्थिति और जटिल हो गई है. धार्मिक मुद्दों को लेकर उनकी समझ ने उन्हें अकाली दल के लिए अपरिहार्य बना दिया था.
सुखबीर इससे सहमत नहीं हैं—लेकिन परमिंदर ढींढसा के अनुसार, ''वास्तव में पार्टी के लिए यह एक समस्या है.'' ढींढसा इसे विस्तार से समझाते हैं, ''मैंने एसएडी नेताओं से अनुरोध किया था कि वे अकाल तख्त से माफी मांग लें. हालांकि शुरू में वे इसके लिए सहमत हो गए लेकिन अंतत: नहीं गए. माफी मांगने का अर्थ अपराध स्वीकार करना नहीं होता. इससे लोगों का आक्रोश शांत हो जाता.''
17 जनवरी को प्रदेश भाजपा के नए प्रमुख अश्विनी शर्मा के कार्यभार संभालने के उपलक्ष्य में जालंधर में आयोजित एक कार्यक्रम में कई नेताओं ने भाजपा-एसएडी गठबंधन को खत्म करने की बात कही. राज्य में अपनी जमीनी पकड़ के बूते अकाली दल दो दशक से अधिक समय तक, भाजपा के साथ गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका कायम रखने में कामयाब रहा. हालांकि, भाजपा नेताओं का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के वोट शेयर में वृद्धि जैसी उपलब्धि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का परिणाम है. यह ढींढसा के नेतृत्व वाले अकाली दल (टकसाली) सरीखे नए दलों के साथ गठबंधन को प्रोत्साहित कर सकता है. इस संबंध में पहला संकेत केंद्र से आया है. जनवरी 2019 में, केंद्र सरकार ने बादल परिवार से विमर्श के बिना सुखदेव ढींढसा को पद्म भूषण से सम्मानित किया. और एक नए गठबंधन के रास्ते खुले रखने के लिए ढींढसा भी भाजपा पर हमले करने से बच रहे हैं और उनके निशाने पर केवल बादल हैं. जनवरी की 20 तारीख को भाजपा ने दिल्ली चुनाव के लिए अकाली दल से गठजोड़ खत्म कर दिया.
भाजपा के करीबी विपक्षी नेता के रूप में ढींढसा की नई हैसियत, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) चुनावों में भी बादल परिवार के लिए रास्तों को मुश्किल भरा बना सकती है. स्वर्ण मंदिर सहित पंजाब और हिमाचल प्रदेश में गुरुद्वारों का संचालन करने वाले इस निकाय में 2016 से ही चुनाव नहीं हुए हैं. अमित शाह की अगुआई वाला गृह मंत्रालय इन चुनावों की तारीख तय करने वाला है.
फिलहाल, भाजपा ढींढसा के नए अकाली दल को मजबूती से खड़ा करने और पंथक वोटों को आकर्षित करने में सक्षम दिखने तक इंतजार करना ही बेहतर समझेगी. भाजपा अपने आधार वोट में पंथक वोटों के जुड़ जाने से जालंधर, बठिंडा, पटियाला और लुधियाना जैसे प्रमुख शहरी क्षेत्रों को जीतती रही है. भाजपा के एक शीर्ष नेता कहते हैं, ''हम नए अकाली दल के साथ मिलकर भी अपने वोटरों और पंथक वोटों का संयोजन तैयार कर सकते हैं.''
सुखबीर ऐसी किसी भी भावी संभावना को सिरे से खारिज कर देते हैं. वे कहते हैं, ''हमारे गठबंधन की शर्तें एकदम स्पष्ट हैं. उन्हें अपनी 23 विधानसभा सीटें बखूबी पता हैं. हम अपनी 94 सीटों पर ध्यान केंद्रित करते हैं. इसी तरह, लोकसभा चुनावों के लिए हमारे बीच 10-3 सीटों की साझेदारी की व्यवस्था चली आ रही है और यह जारी रहेगी.''
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