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जाट आरक्षणः बीजेपी की आरक्षण फांस

जाटों के हिंसक आंदोलन से सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ा, मोदी सरकार के पास कई राज्यों से उठ रही आरक्षण की आवाज को थामने की कोई ठोस योजना नहीं.

संतोष कुमार/असित जॉली
  • नई दिल्ली,
  • 26 फरवरी 2016,
  • अपडेटेड 12:13 PM IST

आखिरी गिनती तक मारे गए लोगों की संख्या उन्नीस; निजी कारें, पुलिस की जीप, माल से भरे ट्रक, रेलवे के रैक समेत सैकड़ों वाहन जलकर खाक; कई निजी और सरकारी इमारतों में आगजनी के बाद अब भी उठता काला धुआं, जिनमें एक मंत्री का घर भी शामिल है; चौतरफा भय और समूचे सूबे में खतरनाक जातिगत बंटवारा. साथ ही, लूटपाट और बलात्कार जैसी वारदातें. पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स के अनुमान के मुताबिक, इस हिंसक आंदोलन में करीब 34 हजार करोड़ रु. का नुक्सान हुआ. बेशक, 'हैपनिंग हरियाणा' की ऐसी कल्पना तो अनुभवहीन मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के जेहन में चार महीने पहले नहीं रही होगी जब उन्होंने देश के अग्रणी निवेश स्थल के रूप में राज्य को पेश करने के लिए बड़े तामझाम से इस आकर्षक टैगलाइन को चुना था.

गुडग़ांव में 7-8 मार्च के लिए प्रस्तावित 'हैपनिंग हरियाणा' निवेशक सम्मेलन बमुश्किल हफ्ते भर पहले न सिर्फ खटाई में पड़ता दिख रहा है, बल्कि इस आंदोलन की वजह से निवेशकों ने सम्मेलन में आने से इनकार करना शुरू कर दिया है. लगता है, 16 महीने पुरानी खट्टर सरकार बेपटरी होती जा रही है जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नजदीकी होने भर की योग्यता से हरियाणा के मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई थी. हिंसक आंदोलन ने खट्टर सरकार और बीजेपी के राजनैतिक प्रबंधन पर सवालिया निशान लगा दिया है. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने दखल देकर जाट आरक्षण के लिए विधानसभा में बिल लाने का वादा किया है. केंद्रीय स्तर पर संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू की अगुवाई में पांच सदस्यीय हाइपावर कमेटी बना दी है जो लगातार बैठकें कर रही है. लेकिन सवाल है कि इस हिंसक आंदोलन का जिम्मेदार कौन है?

अनुभवहीनता ने किया बंटाढार
खट्टर आरएसएस के पूर्व प्रचारक हैं जिनका विधायी कामों या सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है. जाट आरक्षण का मसला पिछले साल 26 मार्च से ही जोर पकडऩे लगा था जब 70 सदस्यीय जाट प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी. यह मसला कोई नया नहीं था, अगस्त 1990 में जब चौधरी देवीलाल ने जाटों की रैली की थी तो दो दिन बाद ही वी.पी. सिंह ने भी ओबीसी आरक्षण के लिए रैली की थी. हरियाणा में 1991-93 तक जाटों को आरक्षण मिला था, लेकिन बाद में भजनलाल की सरकार ने उसे वापस ले लिया. लेकिन 1993 में मंडल आयोग लागू होने के बाद यह लड़ाई चलती रही. उसके बाद से यह अब तक का सबसे खूनी आंदोलन रहा है.

खट्टर के कई कैबिनेट सहयोगियों समेत बहुत से लोग इस अप्रत्याशित परिस्थिति के लिए उनकी अक्षमता, अनिर्णय और सहयोगी मंत्रियों से परामर्श करने में संकोच को दोषी ठहरा रहे हैं. हालांकि सूत्रों का दावा है कि जब आंदोलन शांतिपूर्ण चल रहा था तभी खट्टर ने इस बारे में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से फोन पर संपर्क साधा था, लेकिन उन्हें निर्देश मिला कि यूपी चुनाव तक जाटों के साथ कोई सख्ती नहीं होनी चाहिए.

आरक्षण को लेकर असंतोष वैसे तो 2012 के बाद से हर साल इस मौसम में होता रहा है जब जाट किसान बुवाई और कटाई के बीच मिली मोहलत का इस्तेमाल अपनी मांग को नए सिरे से उठाने के लिए करते हैं. मुख्यमंत्री खट्टर हालांकि अपने अफसरों और सियासी सलाहकारों के साथ इससे बेपरवाह पूरी तरह गुड़गांव में होने वाले निवेशक सम्मेलन पर ध्यान लगाए हुए थे. आखिर दो जाट संगठनों आदर्श जाट महासभा (एजेएम) और बिनाईं खाप ने जब नरवाना के मिनी सचिवालय के बाहर 8 फरवरी को धरना देकर 15 फरवरी को हरियाणा बंद का आह्वान किया और 27 फरवरी को चंडीगढ़ स्थित विधानसभा के घेराव की मंशा जाहिर की, तब कहीं जाकर राज्य सरकार में पहली हरकत हुई.

इसके बावजूद खट्टर और उनकी टीम—जिसमें आठ मंत्रियों की कैबिनेट के भीतर सिर्फ दो जाट सदस्य वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु सिंधु और कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ भी शामिल थे—इस आंदोलन के आकार का अंदाजा नहीं लगा पाई. नरवाना के धरने में 9 फरवरी को शामिल मुट्ठी भर जाट नुमाइंदों को बातचीत के लिए चंडीगढ़ बुलवा भेजा गया लेकिन इससे मुख्यधारा का जाट नेतृत्व नाराज हो गया जो फौरन आंदोलन की राह पर चल पड़ा. एजेएम और बिनाईं खाप के नेता 9 फरवरी को जिस समझौते पर राजी हुए थे, उसे खारिज करते हुए अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति (एबीजेएएसएस) के अलग-अलग धड़ों के तमाम नाराज सदस्य आंदोलन में शामिल हो गए.

इसके बाद 12 फरवरी को पूर्व सीआरपीएफ  कमांडेंट 69 वर्षीय हवा सिंह सांगवान की अगुवाई में सैकड़ों जाट आंदोलनकारियों ने हिसार जिले में मय्यर के पास रेलवे लाइन जाम कर दी. तीन दिन बाद रोहतक जिले की सर्वाधिक ताकतवर खापों के एक बड़े समूह ने सांपला के पास सड़क मार्ग और रेल आवागमन को बाधित कर दिया. 19 फरवरी को हिंसा इस कदर भड़की कि सेना सड़कों पर उतारनी पड़ी. दूसरी तरफ गैर जाटों की संपत्ति को निशाना बनाया जाने लगा.

जाट बनाम गैर-जाट की खाई बढ़ी
सवाल उठता है कि आम तौर से शांतिपूर्ण रहने वाले हरियाणा के जाट आंदोलनकारी इतने हिंसक क्यों हो गए? राज्य के जाट बहुल क्षेत्र रोहतक, भिवानी, झज्जर, सोनीपत, पानीपत, हिसार और जींद में हर छोटा-बड़ा कस्बा जलने लगा जिसमें राष्ट्रीय राजमार्ग एक से लगे इलाके भी शामिल थे. सांगवान का खट्टर पर आरोप है कि वे जाटों की चिंताओं की उपेक्षा कर रहे हैं. एबीजेएएसएस के नेता कहते हैं, ''बीजेपी के जाट नेता जिलों में अपने समर्थकों और मतदाताओं के पास जाने की बजाए चंडीगढ़ और दिल्ली निकल लिए.''

वे एक और तथ्य की ओर संकेत करते हैं: हर सरकार ने सिर्फ वादा किया है, लेकिन हकीकत में कुछ नहीं किया. वे कहते हैं, ''इस बार नौजवानों ने जाट नेताओं की सुनने से इनकार कर दिया, जिन पर वास्तव में दूसरी जातियों के आरक्षण का असर पड़ा है.'' सांगवान कहते हैं कि आखिरकार यह आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया और इस पर समाज विरोधी तत्वों ने कब्जा कर लिया ''जो वास्तव में किसी जाति विशेष से होने का दावा नहीं कर सकते.''

अधिकतर जाट नेता इस बात से सहमत हैं कि चाहे साजिशन या अपनी सुस्ती के चलते खट्टर कुरुक्षेत्र के सांसद राजकुमार सैनी पर लगाम कसने में नाकाम रहे. जबकि हरियाणा में बीजेपी का ओबीसी चेहरा तथा आर्मी मेडिकल कोर के अवकाश प्राप्त अफसर 65 वर्षीय कैप्टन मान सिंह दलाल, जो 84 गांवों की दलाल खाप के मुखिया हैं, का मानना है कि सैनी के जहरीले भाषणों ने जाट युवाओं को हिंसा के लिए उकसाया. इसमें खुलेआम जाटों को बदनाम किया गया, उनके खानदान पर सवाल उठाया गया और यहां तक कि स्थानीय टीवी चैनलों पर उन्हें सड़क पर लडऩे को उकसाया गया. 

साजिश या अंदरूनी खींचतान

एक तरफ कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी की सरकारें आंदोलनों को संभालने में अक्षम है और इसके लिए गुजरात के पाटीदार आंदोलन, राजस्थान के गुर्जर आंदोलन और अब हरियाणा में जाट आंदोलन का उदाहरण देती है. दूसरी तरफ बीजेपी जाति उन्माद बढ़ाने के लिए कांग्रेस पर षड्यंत्र रचने का आरोप लगाती है. हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के राजनैतिक सलाहकार रहे प्रो. वीरेंद्र के कथित टेप को प्रमाण के तौर पर उल्लेख कर रही है.

खट्टर की कार्यशैली और पार्टी में अंदरूनी खींचतान ने भी समस्या पैदा की. इस आंदोलन को थामने में कड़ी मशक्कत करने वाले हरियाणा बीजेपी के प्रभारी महासचिव डॉ. अनिल जैन का मुख्यमंत्री खट्टर से रिश्ता सौहार्द्रपूर्ण नहीं माना जाता है. खट्टर जब आरएसएस प्रचारक हुआ करते थे तभी से उनके मोदी से संबंध मधुर हैं इसलिए वे अक्सर सीधे मोदी से बातचीत कर लेते हैं जो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को कई बार खटकता है. ऐसे में आंदोलन के पीछे बीजेपी की अंदरूनी खींचतान भी वजह बताई जा रही है.

आंदोलन की आड़ में महिलाओं के साथ बलात्कार, लूट की घटनाएं सामने आ रही हैं, उससे जाट बनाम गैर-जाट की खाई बढ़ती जा रही है. आंदोलन के दौरान शीर्ष स्तर पर हुई बैठकों में मुख्यमंत्री खट्टर की अनुभवहीनता और उन्हें बदलने की बात भी आई. हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, बैठकों में दलील दी गई कि अभी नेतृत्व परिवर्तन किया गया तो आंदोलन के आगे झुककर आरक्षण देने के फैसले के बाद इसे भी जाटों की जीत के तौर पर देखा जाएगा. लेकिन पार्टी में जिस तरह अंतर्विरोध गहरा रहा है, आने वाले समय में खट्टर को हटाने की मांग जोर पकड़ सकती है.

हालांकि मोदी की कार्यशैली को करीब से देखने वाले एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, ''मोदी कभी भी नेतृत्व में बदलाव या टीम को ज्यादा फेंटने में भरोसा नहीं रखते. इसलिए गुजरात में पाटीदार आंदोलन के बाद बिगड़े हालात से मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को हटाने की चर्चा हो या फिर खट्टर को लेकर लग रही अटकलों में ज्यादा दम नहीं दिखता.'' वे यह भी दलील देते हैं कि खट्टर हो या आनंदीबेन, दोनों मोदी की पसंद से मुख्यमंत्री बने हैं, दोनों को बनाते वक्त सामाजिक-राजनैतिक समीकरणों को तरजीह नहीं दी गई. ऐसे में उन्हें हटाया जाता है तो सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर ही सवाल उठेंगे.

लेकिन इन दलीलों से इतर बीजेपी के एक अन्य नेता कहते हैं, ''क्या गुजरात में मोदी ने कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना किया था? अब उन्हें दिल्ली की राजनीति जरूर समझ आ रही होगी, इसलिए अनुभव के साथ बहुत से सिद्धांत भी बदलते रहते हैं. ऐसे में मामला शांत होने के कुछ महीनों बाद नेतृत्व परिवर्तन हो जाए तो कोई अचरज की बात नहीं होगी.''

कमेटी पर भी उठने लगे सवाल
इन दलीलों में दम इसलिए भी नजर आता है क्योंकि इस हिंसक आंदोलन के मुद्दे पर बीजेपी में दो-फाड़ साफ नजर आ रहा है. जाटों को केंद्रीय स्तर पर भी आरक्षण देने के लिए संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू के नेतृत्व में बनी बीजेपी की पांच सदस्यीय कमेटी ने जब 24 फरवरी को तीसरी बैठक की तो हरियाणा के सभी सांसदों को बुलाया गया. सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में हरियाणा बीजेपी के अध्यक्ष सुभाष बराला ने एक क्लिपिंग दिखाई जिसमें जाट आरक्षण का विरोध करते हुए सांसद राजकुमार सैनी बोल रहे थे.

इस क्लिपिंग के बाद गैर-जाट सांसद लामबंद हो गए और बैठक में ही दो गुटों के बीच जबरदस्त तू-तू, मैं-मैं होने लगी. कांग्रेस से बीजेपी में आए और अभी मोदी सरकार में मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने तो कमेटी पर ही सवाल उठा दिए. सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने कहा कि इस कमेटी में एक भी ओबीसी का प्रतिनिधि नहीं है, ऐसे में जाटों को ओबीसी कोटे से आरक्षण देने पर कैसे विचार हो सकता है.

बैठक में 34 हजार करोड़ रुपए के नुक्सान, आगजनी, बलात्कार, छात्राओं के हॉस्टल में घुसने जैसे मुद्दे भी उठे. सूत्रों के मुताबिक, एक सांसद ने तो यहां तक कह दिया कि हरियाणा में बीजेपी की सरकार गैर-जाटों ने बनाई है, लेकिन इस तरह से जाटों को तरजीह दी गई तो गैर-जाटों को राजनीति छोडऩी पड़ेगी. सांसद सैनी ने तो अपने तल्ख तेवर में कह दिया कि उन्होंने अपनी ओबीसी बिरादरी की बात की है और वे आगे भी कहते रहेंगे. गैर-जाटों की मांग है कि जाटों को ओबीसी के 27 फीसदी में छेड़छाड़ किए बिना आरक्षण दिया जाए.

गैर-जाट नेताओं का गुट इस बात पर अड़ा है कि पुलिस की गोली से मारे गए लोगों को मुआवजा नहीं देना चाहिए. दूसरी तरफ चंडीगढ़ में सियासी पारा भी उफान पर है. हिंसा में हुई क्षति की भरपाई और मृतकों को मुआवजा देने के लिए हुई कैबिनेट बैठक में खट्टर सरकार के मंत्री अनिल विज ने तो सीधा मोर्चा खोल दिया था. सूत्रों के मुताबिक, गैर-जाट विधायक विज की बेबाकी से खुश हैं और एक खेमा जल्द ही विधायक दल की बैठक बुलाने की मांग कर रहा है. इस बैठक के जरिए नाराज विधायक नेतृत्व परिवर्तन की आवाज बुलंद करना चाहते हैं. बीजेपी के लिए यह स्थिति बेहद मुश्किल पैदा कर सकती है क्योंकि बीजेपी के 47 विधायकों में 41 गैर-जाट हैं और सिर्फ 6 विधायक ही जाट समुदाय से हैं, जिनमें दो मंत्री हैं.

जातिगत बंटवारे की हकीकत को उन दंगाइयों के प्रति हरियाणा पुलिस की सुस्त प्रतिक्रिया में भी देखा जा सकता था, जो रास्ते में पडऩे वाली हर चीज को लूट रहे थे और आग लगा दे रहे थे. ऐसी कई रिपोर्टें हैं कि जाट आंदोलनकारियों को पहले से पता था कि पुलिस उनके खिलाफ  कोई कार्रवाई नहीं करेगी, इसलिए उन्होंने बड़े इत्मिनान से रास्ता रोका और यहां तक कि राजमार्गों के संपर्क मार्गों पर एक्सकेवेटर से गहरे गड्ढे खोद डाले. रोहतक, झज्जर और भिवानी में देखते ही गोली मारने के आदेश लेकर उतरी फौज को अपने हाथों में वास्तव में प्लैकार्ड लेकर दंगाइयों को दिखाना पड़ा क्योंकि नरम पुलिसवालों की उन्हें पहले से आदत पड़ी हुई थी.

फिर संकटमोचन बने राजनाथ
संसद के बाहर मोदी सरकार को अब तक जिन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा उसमें जाट आरक्षण और जेएनयू का मसला अहम रहा. जब आंदोलन हिंसक हो उठा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह को फोन कर स्थिति संभालने को कहा. ललितगेट प्रकरण में वसुंधरा राजे, सुषमा स्वराज का बचाव और व्यापम में शिवराज सिंह चौहान और अवार्ड वापसी मसले पर कमान संभालने वाले राजनाथ को एक बार फिर संकटमोचन के तौर पर सरकार की ओर से आगे आना पड़ा.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व में जिस तरह का अभिजात्यवर्गीय वर्चस्व है, उसमें ग्रामीण पृष्ठभूमि के धोती पहनने वाले एकमात्र नेता राजनाथ सिंह ही हैं जो किसानों के मुद्दों के साथ-साथ कई अहम मसलों पर पार्टी का पक्ष प्रखरता से रखते रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते ही राजनाथ की छवि किसान समर्थक होने की वजह से उनका इस वर्ग में असर भी माना जाता है.

20 फरवरी की सुबह मोदी ने राजनाथ से पूरे मामले को संभालने को कहा. उसके बाद जाट नेता और केंद्रीय राज्यमंत्री संजीव बालियान को मध्यस्थ बनाया गया. उन्होंने सबसे पहले यूपी के खाप चौधरियों और आरक्षण संघर्ष समिति के साथ बैठक की. अगले दिन इन जाट नेताओं को मान-मनौव्वल के लिए हरियाणा भेजा गया. फिर हरियाणा के जाट नेता दिल्ली आकर राजनाथ से मिले. राजनाथ ने भरोसा दिलाया, ''बीजेपी आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन संवैधानिक-कानूनी रास्ता क्या हो, उस पर विचार हो रहा है.'' दूसरी तरफ खट्टर ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर बिल लाने का ऐलान किया और शाह ने कमेटी बना दी.

मोदी-शाह को सबक
आंदोलन का परिणाम चाहे कुछ भी हो, जातिगत आरक्षण आंदोलनों की शृंखला मोदी सरकार को एक सबक जरूर दे रही है कि राज्यों में कद्दावर नेतृत्व की गैर-मौजूदगी और राज्य से लेकर केंद्र तक सामाजिक समीकरणों का संतुलन और राजनैतिक कद को दरकिनार करके सत्ता के समीकरण का समाधान सहज नहीं होगा. बीजेपी के एक नेता बताते हैं, ''मोदी-शाह को यह आकलन करना होगा कि निजी स्वार्थ में लिप्त मंडली के कुछ लोगों ने सरकार और पार्टी में भले अपनी स्थिति मजबूत कर ली, लेकिन सरकार और पार्टी की स्थिति कहां पहुंचा दी है.''

जाट आरक्षण के मसले पर जिस तरह से हरियाणा की बीजेपी सरकार की विफलता सामने आई है, उससे यह उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी को अब दिल्ली की राजनीति समझ आ रही होगी. खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत बिहार चुनाव के दौरान आरक्षण पर नई बहस छेड़ चुके हैं और अब जब बीजेपी अध्यक्ष ने जाट आरक्षण मसले पर राजनैतिक कमेटी गठित की तो भागवत ने फिर अपना पुराना रुख दोहरा दिया. उन्होंने आरक्षण की समीक्षा के लिए गैर-राजनैतिक कमेटी गठित करने की सलाह दी. बीजेपी के एक नेता का कहना है, ''बिहार चुनाव के समय संघ प्रमुख के आरक्षण संबंधी बयान से राजनैतिक नफा-नुक्सान चाहे जो हुआ हो लेकिन जाटों के हिंसक आंदोलन के बाद बदले हुए परिदृश्य में भागवत का वह बयान कि आरक्षण के लिए दबाव समूह बनते हैं और राजनीति होती है, बिल्कुल सही प्रतीत हो रहा है.''

केंद्र के दखल और उसके बाद जाटों के लिए आरक्षण पर एक कानून बनाने की घोषणा के बाद गुस्साए जाट कुछ समय के लिए ठंडे पड़ गए हैं. बीजेपी और उसके मुख्यमंत्री ने हालांकि ऐसा करके भानुमती के पिटारे पर लगे ढक्कन को हटा दिया है. इसका क्या नतीजा होगा, यह बताना नामुमकिन है. लेकिन इस आंदोलन ने आरक्षण के मूल भाव को ही बदल दिया है.

आरक्षण का जो मूल भाव डॉ. भीमराव आंबेडकर ने दिया था उसमें समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व था जो वाकई दीन-हीन है. उस वर्ग को अतिरिक्त संरक्षण की दरकार बताई गई है. लेकिन आजादी के बाद के पहले 40 वर्षों में अघोषित जातिवाद और फिर मंडल के बाद घोषित जातिवाद के दौर में  जातियों के नाम की पार्टियां और नेता बन गए हैं. आज आरक्षण का आधार सामाजिक निर्बलता नहीं, बल्कि यह हो गया है कि मांग करने वाला समाज राजनैतिक दृष्टि और बाहुबल के प्रदर्शन में कितना सक्षम है. आरक्षण का उद्देश्य समाज में डरे-सहमे लोगों को सबल बनाना था, लेकिन आज के दौर में डरा-सहमाकर राजनैतिक वर्ग आरक्षण लेना चाहते हैं.

ऐसे में मोदी-शाह की जोड़ी को यह समझना होगा कि जिस बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में अपार बहुमत हासिल किया, आज वह खुद को कहां खड़ा पा रही है. अगर अब बीजेपी की नई जोड़ी अपनी शैली में सुधार कर सके तो निश्चित तौर पर वह इतिहास रच सकती है, लेकिन इस स्थिति को दीर्घकालिक रणनीति के तहत नहीं सुधारा गया तो आरक्षण की पेचीदगियों में उलझ इतिहास भी बन सकते हैं.

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