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पंचायत उम्मीदवारों के लिए शिक्षा मानदंड तय करने से राजस्थान में छिड़ा क्लास वार

राजे सरकार ने पंचायत चुनाव लडऩे के लिए शिक्षा को मानदंड बना दिया, तो उसमें और कांग्रेस में जंग छिड़ गई कि ग्रामीण वोटरों पर किसका राज है.

रोहित परिहार
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  • 19 जनवरी 2015,
  • अपडेटेड 4:58 PM IST

एक माह पहले तक कमलेश बैरवा अपने एक साल के बेटे, जिम चलाने वाले अपने पति और खेतों की देखभाल में व्यस्त थीं. राजस्थान के दौसा जिले में जेवराता कलां गांव के एक स्थानीय रसूखदार सियासी परिवार में ब्याही गई यह 24 वर्षीया महिला खुद को राजनीति से दूर रखे हुई थी. उनका ध्यान स्थानीय कॉलेज से बीए की पढ़ाई पूरी करने पर था. लेकिन अब वे 4,500 वोटरों वाले इस गांव की सरपंच बन सकती हैं. उन्हें इस सामान्य सीट पर अपनी जेठानी बीना देवी की तरह आसानी से जीत मिलने की संभावना है. 29 वर्षीया बीना 2010 में सरपंच का चुनाव जीती थीं, पर इस बार वे चुनाव नहीं लड़ रही हैं. स्थानीय कानाफूसी की मानें तो बीना आठवीं तक भी नहीं पढ़ी हैं. वैसे उनका कहना है कि वे इसलिए चुनाव नहीं लड़ रही हैं क्योंकि उनके पति डी.आर. बैरवा दौसा से प्रधान की लड़ाई में हैं.

बीना के शैक्षणिक योग्यता न रखने की चर्चा पर कुछ हद तक विश्वास किया जा सकता है, लेकिन यह सब वसुंधरा राजे सरकार की ओर से 19 दिसंबर को जारी एक विवादास्पद अध्यादेश की वजह से हुआ है. राजस्थान पंचायती राज (दूसरा संशोधन)अध्यादेश, 2014 के जरिए जनवरी और फरवरी में होने वाले स्थानीय निकायों के चुनावों में पंच के पदों को छोड़कर अन्य सभी पदों के लिए सभी उम्मीदवारों की एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित कर दी गई है. इस अध्यादेश ने राज्य में सरपंच के 9,900 पदों पर चुनाव लडऩे के लिए बीना और कमलेश जैसे प्रत्याशियों के लिए 8वीं तक की शिक्षा अनिवार्य कर दी है. अधिसूचित क्षेत्रों में 1,200 सीटों पर चुनाव लडऩे वालों के लिए इसमें छूट देते हुए पांचवीं पास होना अनिवार्य किया गया है. पंचायत समिति सदस्यों, प्रधानों, जिला परिषद सदस्यों और जिला प्रमुखों का चुनाव लडऩे वालों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 10वीं पास रखी गई है.

सरकार के इस फैसले पर काफी विवाद हो रहा है. सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार इसे प्रगतिशील कदम बताते हुए दावा कर रही है कि इससे लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा. खासकर ग्रामीण इलाकों के लिए कि वहां के लोग स्कूली पढ़ाई पूरी करें.

दूसरी ओर कांग्रेस और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इसे मनमाना कदम बताया है. आलोचकों का कहना है कि विधानसभा और संसद के चुनावों तक में किसी तरह की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शर्त नहीं रखी गई है. राज्य कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है, ''नए कानून से मौजूदा पंचायत समिति के 70 फीसदी सदस्य और 55 फीसदी जिला परिषद सदस्य शर्तों को पूरा नहीं कर पाएंगे. '' सामाजिक संगठनों ने वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह के जरिए अध्यादेश के खिलाफ राजस्थान हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करवाई थी लेकिन अदालत ने चुनाव पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.

जयपुर के शोर-शराबे से महज एक घंटे की दूरी पर पायलट के गृह क्षेत्र दौसा में रहने वाले पूर्व प्रधान किशन लाल बैरवा इसे एक जबरदस्त फैसला बताते हैं. वे बीना और कमलेश के श्वसुर हैं. 10वीं तक पढ़े बैरवा कहते हैं, ''न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शर्त बिना सोचे-समझे खड़े हो जाने वाले प्रत्याशियों की छंटनी कर देगी और बवाल कम होगा. शिक्षित होने से व्यक्ति को जिम्मेदारी का एहसास होता है. '' वे कांग्रेस के टिकट पर दो बार विधानसभा चुनाव भी लड़े, लेकिन हार गए थे.

तो क्या यह कांग्रेस का आधार माने जाने वाले ग्रामीण राजस्थान में बीजेपी का आधार बढ़ाने के लिए राजे का गेम-चेंजर या चालाक प्रयास है? कुछ हद तक दोनों ही बातें सही हैं. राजे, गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया और बीजेपी के राज्य अध्यक्ष अशोक परनामी के बीच हुई एक बैठक के दौरान अचानक ही इस तरह का अध्यादेश लाने का फैसला लिया गया. सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस खुद इस तरह के विचार में दिलचस्पी दिखा रही थी. पर इस विवाद की वजह से यह विचार छोड़ दिया गया था कि सरपंच का चुनाव लडऩे वालों पर ऐसी शर्त थोपना और सांसदों, विधायकों को इससे मुक्त रखना भेदभावपरक होगा.
पायलट ने इंडिया टुडे  से कहा, ''मैं भी चाहता हूं कि पढ़े-लिखे लोग चुनकर पदों पर आएं, लेकिन मैं इसे चरणबद्ध तरीके से करता. जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, उनको न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हासिल करने के लिए पर्याप्त समय देता. '' उन्होंने कहा कि सरकार ने विधानसभा के सामने इस संशोधन को बहस के लिए पेश करने की हिम्मत नहीं दिखाई क्योंकि उसे गांवों में इसका विपरीत असर होने का डर था.

वहीं बीजेपी ने अनुमान लगाया कि थोड़ा विरोध होगा भी तो वह वोटरों के बहुत छोटे से वर्ग तक सीमित होगा और चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी, निकाय चुनाव के ज्यादातर दावेदार इसका समर्थन करेंगे. इस अध्यादेश के जरिए बीजेपी सरकार खुद को प्रगतिशील साबित करना चाहती है, जो नए और शिक्षित चेहरों को जगह दे रही है और चुनावी दौड़ में कांग्रेस को चकित भी करना चाहती थी. परनामी कहते हैं, ''मैंने बीजेपी में टिकट के एक भी दावेदार को इस अध्यादेश की शिकायत करते नहीं सुना. '' अध्यादेश कोई बड़ा मुद्दा इसलिए भी नहीं बन पाया क्योंकि गेंद काफी चतुराई से फेंकी गई थी. यह सुनिश्चित किया गया कि शैक्षणिक मानदंड को सबसे बड़े हिस्से यानी करीब 1,09,469 पंच पदों के लिए अनिवार्य न किया जाए.

वहीं इसके आसार भी हैं कि चुनाव के पहले और बाद में रातोरात सैकड़ों मार्कशीट तैयार हो जाएं. उन मार्कशीट्स की वैधानिकता पर भी शिकायतें दर्ज हो सकती हैं? ऐसा संकेत जयपुर से महज 40 किमी दूर ही मिल जाता है. मोहनपुरा गांव में किराने की दुकान चलाने वाले राजेश शर्मा भावशून्य होकर कहते हैं, ''जीतेगा तो अंगूठा छाप ही. '' यहां के ज्यादातर लोगों का कहना है कि उनके मौजूदा लोकप्रिय सरपंच कालू राम मीणा पढ़े-लिखे नहीं हैं. वैसे 60 वर्षीय मीणा इसका जोरदार खंडन करते हैं, ''मैं 8वीं तक पढ़ा हूं और इस बार फिर लड़ूंगा. मैं सरकार के इस फैसले का समर्थन करता हूं, पर इससे वैसे निरक्षर बुद्धिमान और समझदार लोग बाहर हो जाएंगे जिन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की है. ''

जबकि दूसरी बार विधायक बने बीजेपी के प्रेम सिंह बाजोर की राय इससे अलग है. निरक्षर प्रेम ने बचपन में मजदूरी से अपनी जिंदगी शुरू की थी और आज वे सबसे धनी विधायकों में हैं. उनकी कुल संपत्ति 100 करोड़ रु. है. उन्होंने कहा, ''अगर मैं शिक्षित होता तो राजनीति और कारोबार दोनों में और बढिय़ा करता. '' इसी वजह से उन्होंने अपनी तीन बेटियों और एक बेटे को पढ़ाया-लिखाया. वे विधानसभा और संसदीय चुनाव लडऩे वालों के लिए भी इसी तरह की शैक्षणिक योग्यता का मानदंड तय करने की मांग कर रहे हैं.
वैसे औपचारिक शिक्षा को इस तरह से तरजीह मिलना 77 वर्षीय सूर्य कांता व्यास जैसे लोगों को नुकसान पहुंचा सकता है. सिर्फ  प्राथमिक शिक्षा पाने वाली बीजेपी की व्यास पांचवीं बार विधायक बनी हैं. वे इलाके में अपनी आसान उपलब्धता और काम को लेकर काफी लोकप्रिय हैं. वे कहती हैं, ''एक ईमानदार निरक्षर किसी भ्रष्ट ग्रेजुएट से बेहतर है. मैंने कई उच्च शिक्षित मंत्रियों से बेहतर काम किया है. '' वे याद करती हैं कि किस तरह से 1995 के पंचायती राज चुनावों में सिर्फ  दो बच्चे होने की शर्त थोप दी गई थी, ''तब भी कई चुने गए प्रतिनिधियों के दो से ज्यादा बच्चे थे. ''

जयपुर के कलेक्टर कृष्ण कुणाल कहते हैं कि दोनों फैसले प्रोत्साहित करने के लिए थे. वे कहते हैं, ''दो बच्चे की शर्त से राज्य में जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगी. न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शर्त से स्कूल छोडऩे की दर में कमी आएगी. '' अब शिक्षा विभाग एक नया नारा उछाल रहा है-'सरपंच होना है तो स्कूल पूरा करना होगा. ' पंचायत चुनावों के नतीजों से ही इस फैसले का भविष्य साफ  हो पाएगा कि क्या इसे तेजी से विधानसभा की ओर ले जाया जाता है या इसके कदम सुस्त पड़ जाएंगे. यह इस पर निर्भर करेगा कि किसे कितना और कितनी तेजी से फायदा होता है.

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