
यूपी की बड़ी हार ने कांग्रेस और राहुल गांधी को बड़ा झटका दिया है. अब एक बार फिर राहुल गांधी संगठन में बदलाव की बात कर रहे हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर जोर देकर कहते रहे हैं कि राहुल जैसे चाहें वैसे बदलाव करें. जो टीम बनाना चाहें बनायें, लेकिन देर ना करें. वहीं सत्यव्रत चतुर्वेदी और संदीप दीक्षित सरीखे नेता सवाल कर रहे हैं कि 2014 से अब तक ये बदलाव हुआ क्यों नहीं. इस सबके बावजूद अब तक कांग्रेस में बदलाव की सुगबुगाहट नहीं नजर आ रही है. राहुल जिम्मेदारी उठा रहे हैं, लेकिन उनका अध्यक्ष बनना अभी भी अबूझ पहेली बना हुआ है.
कांग्रेस संगठन 2014 की हार के बाद से त्रिशंकु की भूमिका में है. ऐसा लगता है कि चुनाव दर चुनाव तात्कालिक तौर पर टीम बना दी जाती है, जो चुनाव के ऐन मौके पर किसी तरह पार्टी को चुनाव लड़ा देती है. बिहार में महागठजोड़ का फायदा मिल जाता है, तो पंजाब में अकाली-बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर और अमरिंदर सिंह का कद पार्टी की लाज बचा लेता है. कमजोर संगठन और पार्टी की छवि ऐसी नहीं है कि मणिपुर और गोवा में वो बड़ी पार्टी होकर भी सरकार नहीं बना पाई. बीजेपी पर सत्ता के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगाती रही, लेकिन वो ना ही सहानुभूति बटोर पायी, ना ही कोई बड़ा आंदोलन कर पायी. इस सबके बावजूद पार्टी उसी पुराने ढर्रे पर है. कांग्रेस दिशाहीन नजर आ रही है. जब संगठन सुस्त हो और अर्से से बदलाव की बाट जोह रहा हो, ऐसे में भी राहुल का नेतृत्व नहीं उभरना पार्टी के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है.
दरअसल, पार्टी में आलाकमान के सेनापति यानी महासचिवों को यही नहीं पता कि वो कब तक पद पर हैं, रहेंगे भी या नहीं. ऐसे माहौल में उनके लिए काम करना मुश्किल है. संगठन भगवान भरोसे चल रहा है. कोई कुछ भी बयान देता है, महासाचिव उसके खिलाफ एक्शन ले या नहीं , ये वो तय नहीं कर पाते. बड़े नेताओं ने तय किया है कि जो काम कहा जायेगा कर देंगे.
ऐसे में गांधी परिवार ना राहुल को अध्यक्ष बनाने का सही वक्त तय कर पा रहा है, ना ही संगठन में बदलाव कर पा रहा है. दरअसल, हालिया चुनावी नतीजे और बदलाव के बाद बढ़ सकने वाली नाराजगी उसके कदम थामे हुए हैं. गांधी परिवार को लगता है, इस वक्त जिस नेता को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, वो नाराज होगा या पार्टी छोड़ देगा. डर इस बात का भी है कि नयी टीम में राहुल की पसंद चलेगी, तो वो नेता जो सोनिया की गुड बुक में रहे, लेकिन राहुल को पसंद नहीं, उनका क्या होगा और वो क्या करेंगे.
आखिर किसी नेता को राहुल की कार्यशैली से परेशानी होती है, तो बतौर अध्यक्ष सोनिया संभाल लेती हैं. सोनिया के चलते तमाम वो नेता जो राहुल की कार्यशैली को पसंद नहीं करते खामोश रहकर पार्टी में बने हुए हैं. लेकिन जब राहुल अध्यक्ष हो जायेंगे, तब उन्हें कौन संभालेगा. चुनावी जीत मिले, राहुल का कद बढ़े तब तो बात बन जाए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा. यूपी की बड़ी हार ने तो मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.
पार्टी को मालूम है कि राहुल को ही अपनी टीम के साथ कमान संभालनी है. लेकिन मुफीद वक्त का इंतजार खत्म होने के बजाय और लंबा होता जा रहा है.