
दिल्ली में रतन लाल मर्डर केस की चार्जशीट में सफूरा जरगर का नाम कई बार आया है. आरोपपत्र में पहला आरोप है कि वह 23 फरवरी को चांद बाग से राजघाट तक अवैध मार्च के मुख्य आयोजकों में से एक थी, जिसे रोक दिया गया. बाद में 24 फरवरी को दंगों की योजना बनाते हुए गुप्त बैठकें भी आयोजित की गईं.
स्पेशल सेल की ओर से मामले की जांच के दौरान यह पाया गया है कि दिसंबर में हुए नॉर्थ ईस्ट के दंगों के साथ एक संबंध है जो बाद में दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में फैल गया. इसमें चांद बाग में दंगा भी शामिल था. जेसीसी नामक संगठन ने अपने उद्देश्य को पाने के लिए सभी विरोध स्थलों का इंतजाम किया था और हर स्थल की निगरानी जेसीसी के सदस्यों द्वारा की जा रही थी. जांच के दौरान यह पाया गया है कि जेसीसी प्रतिनिधि के तौर पर सफूरा जरगर चांद बाग मजार स्थल गई थी और उसने प्रदर्शनकारियों को भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. यही वजह है कि सफूरा को स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया था जोकि अब जमानत पर है. वर्तमान मामले में सफूरा की भूमिका की जांच की जा रही है और पूरक चार्जशीट के माध्यम से उसी के बारे में रिपोर्ट दायर की जाएगी.
दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक डीएस बिंद्रा ने सीएए प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाने के लिए लंगरों की स्थापना की थी. चार्जशीट में कहा गया है कि यह काम एक सक्रिय किरदार ही नहीं बल्कि लोगों के साथ भागीदारी करने और भड़काने वाला भी था. चार्जशीट में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि डीएस बिंद्रा दंगों के उन भड़काने वालों में से एक थे, जिन्होंने रतन लाल की हत्या की थी. आरोप पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि षड्यंत्रकारी "पूरी तरह से जानते थे कि हिंसा भड़क सकती है और तब भी प्रदर्शनकारियों को हथियार उठाने लिए उकसा रहे थे''.
चार्जशीट में डीएस बिंद्रा, सफूरा जरगर और स्थानीय मुस्लिम प्रदर्शनकारियों जैसे कई साजिशकर्ताओं के बीच एक गहरी साजिश का दाव किया गया है. आरोपपत्र में लिखा गया है कि 23 और 24 तारीख की रात षड्यंत्रकारियों और दंगाइयों के बीच एक गुप्त बैठक हुई थी और इस बैठक के बाद दंगे भड़क गए थे, जिसके परिणामस्वरूप पुलिसकर्मी रतन लाल की हत्या भीड़ ने की थी. आरोप पत्र में लिखा कि भीम आर्मी ने रोक के बावजूद पूर्व नियोजित और अवैध रूप से चांद बाग से राजघाट तक मार्च शुरू किया था. यह लोगों की भावनाओं को भड़काने के लिए किया गया था, जबकि पुलिस की तरफ से भीड़ को मार्च करने की अनुमति नहीं थी.