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दर्जनभर हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों के साथ फांसी कोठी से शुरू होता है कैदी का आखिरी सफर

फार्म नंबर 42 यानी ब्लैक वारंट जारी हो जाने के साथ ही मुजरिम को फांसी दिए जाने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. किसी भी दोषी को फांसी पर लटकाए जाने से पहले के दिनों में फांसी कोठी में रखा जाता है. फिर वहीं से सजायाफ्ता मुजरिम अपना आखिरी सफर पूरा करता है.

सजा से पहले कैदी को फांसी कोठी में रखा जाता है (फोटो- Getty) सजा से पहले कैदी को फांसी कोठी में रखा जाता है (फोटो- Getty)
परवेज़ सागर
  • नई दिल्ली,
  • 13 दिसंबर 2019,
  • अपडेटेड 8:54 PM IST

निर्भया कांड के दोषियों को सजा-ए-मौत कब मिलेगी, इस बात का फैसला अदालत को करना है. लेकिन उन्हें फांसी पर लटकाने के लिए तिहाड़ जेल प्रशासन ने कमर कस ली है. अब जैसे ही अदालत चारों दोषियों के खिलाफ फार्म नंबर 42 यानी ब्लैक वारंट जारी करेगी, वैसे ही उन्हें फांसी दिए जाने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. किसी भी दोषी को फांसी पर लटकाए जाने से पहले के दिनों में फांसी कोठी में रखा जाता है. फिर वहीं से सजायाफ्ता मुजरिम अपना आखिरी सफर पूरा करता है.

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मुजरिम का आखरी सफर

जब अदालत किसी मुजरिम के खिलाफ मौत का फरमान यानी ब्लैक वारंट जारी करती है, तो उस पर कैदी को सजा-ए-मौत देने का वक्त भी लिखा होता है. जिस दिन कैदी को फांसी दी जानी होती है, उस दिन उसे पहनने के लिए नए कपड़े दिए जाते हैं. नहाने के लिए पूछा जाता है. चाय भी पूछी जाती है. फिर ब्लैक वारंट पर लिखे वक्त के हिसाब से ही उस कैदी को फांसी कोठी से बाहर निकाला जाता है.

सुरक्षाकर्मियों के घेरे में होता है कैदी

बाहर निकालने के बाद उसके चेहरे को काले कपड़े से ढ़क दिया जाता है. ताकि वहां आस-पास क्या हो रहा है वो देख ना सके. उसे लेने के लिए 12 हथियारबंद सुरक्षाकर्मी आते हैं. वो उसे चारों और से घेर कर चलते हैं. कई बार तो मौत के डर से कैदी के पैर तक कांपने लगते हैं. तब सुरक्षाकर्मी या जेलकर्मी सजा पाने वाले कैदी को बाकायदा कंधे पर उठा कर फांसी के तख्ते तक ले जाते हैं. और वहां फांसी की कार्रवाई पूरी की जाती है.

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जेल में नहीं होता कोई मूवमेंट

जब किसी भी सजा पाए दोषी कैदी को फांसी दी जाती है तो कानूनी कार्रवाई तब तक पूरी नहीं होती, जब तक लाश फंदे से नीचे नहीं उतार लिया जाए. फांसी की प्रकिया के दौरान पूरी जेल के अंदर हर काम रोक दिया जाता है. हर कैदी अपने सेल और अपने बैरक में होता है. यहां तक कि जेल में कोई मूवमेंट नहीं होता. आसान शब्दों में मानें तो जैसे जेल में वक्त थम सा जाता है. हर तरफ सन्नाटा और खामोशी पसर जाती है.

बैरक से काफी दूर है फांसी कोठी

1945 में तिहाड़ जेल बनना शुरू हुआ था. 13 साल बाद 1958 में तिहाड़ बन कर तैयार हुआ. और कैदी वहां आना शुरू हो गए. अंग्रेजों के ज़माने में ही तिहाड़ के नक्शे में फांसी घर का भी नक्शा बनाया गया था. उसी नक्शे के हिसाब से फांसी घर बनाया गया. जिसे अब फांसी कोठी कहते हैं. ये फांसी कोठी तिहाड़ के जेल नंबर तीन में कैदियों के बैरक से बहुत दूर बिल्कुल अलग-थलग सुनसान जगह पर है.

जानें क्या होती है डेथ सेल और फांसी कोठी

तिहाड़ की जेल नंबर तीन में फांसी कोठी है, उसी बिल्डिंग में कुल 16 डेथ सेल हैं. डेथ सेल यानी वो जगह जहां सिर्फ उन्हीं कैदियों को रखा जाता है, जिन्हें मौत की सज़ा मिली है. डेथ सेल में कैदी को अकेला रखा जाता है. 24 घंटे में सिर्फ आधे घंटे के लिए उसे बाहर निकाला जाता है, वो भी टहलने के लिए.

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TSP के पास है सुरक्षा का जिम्मा

डेथ सेल की पहरेदारी तमिलनाडु स्पेशल पुलिस (TSP) करती है. दो-दो घंटे की शिफ्ट में इनका काम सिर्फ और सिर्फ मौत की सजा पाए कैदियों पर नजरें रखने का होता है. ताकि वो खुदकुशी करने की कोशिश ना करे. इसीलिए डेथ सेल के कैदियों को बाकी और चीज तो छोड़िए पायजामे का नाड़ा तक पहनने नहीं दिया जाता.

देश के गुनाहगार

अब पूरे देश को निर्भया कांड के चारों गुनाहगारों को फांसी पर लटकाए जाने का इंतजार है. जिसकी उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. अदालत जैसे ही ब्लैक वारंट जारी करेंगी, निर्भया कांड को अंजाम देने वाले दरिंदों मुकेश, विनय, पवन और अक्षय को फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा.

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