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धनतेरस 2017 : इस विध‍ि से करें पूजन, टलेगा अकाल मृत्यु का खतरा

अगर आप चाहते हैं कि आपकी या आपके परिवार में किसी की भी अकाल मृत्यु ना हो तो धनतेरस के दिन इस तरह पूजन करें. साल में सिर्फ एक दिन ही ऐसी पूजा होती है, जब आप भगवान को प्रसन्न कर अकाल से छुटकारा का वरदान मांग सकते हैं...

धनतेरस पूजन विध‍ि धनतेरस पूजन विध‍ि
वंदना भारती
  • नई दिल्ली,
  • 15 अक्टूबर 2017,
  • अपडेटेड 3:39 PM IST

इस दिन वैदिक देवता यमराज का पूजन किया जाता है. पूरे वर्ष में एक मात्र यही वह दिन है, जब मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है.

यह पूजा दिन में नहीं की जाती, बल्क‍ि रात में होती है. यमराज की पूजा सिर्फ एक चौमुखी दीप जलाकर की जाती है.

यह दीपक आटे का बना होता है. आटे का दीपक बनाकर घर के मुख्य द्वार कर दाईं ओर रख दिया जाता है. इस दीया को जमदीवा, जम का दीया या यमराज का दीपक भी कहा जाता है.

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रात को घर की स्त्रियां दीपक में तेल डालकर नई रूई की बत्ती बनाकर, चार बत्तियां जलाती हैं . दीपक की बत्ती दक्षिण दिशा की ओर रखनी चाहिए;

दीपक जलाने से पहले उसकी जल, रोली, फूल, चावल, गुड़, नैवेद्य आदि से पूजा करनी चाहिए. घर में पहले से दीपक जलाकर यम का दीया ना निकालें.

चूंकि यह दीपक मृत्यु के नियन्त्रक देव यमराज के निमित्त जलाया जाता है, इसलिए दीप जलाते समय पूर्ण श्रद्धा से उन्हें नमन तो करें ही, साथ ही यह भी प्रार्थना करें कि वे आपके परिवार पर दया दृष्टि बनाए रखें और किसी की अकाल मृत्यु न हो.

आज ही के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता धन्वन्तरि वैद्य समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे, इसलिए धनतेरस को धन्वन्तरि जयन्ती भी कहते हैं. इसीलिए वैद्य-हकीम और ब्राह्मण समाज आज धन्वन्तरि भगवान का पूजन कर धन्वन्तरि जयन्ती मनाता है.

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बहुत कम लोग जानते हैं कि धनतेरस आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि की स्मृति में मनाया जाता है. इस दिन लोग अपने घरों में नए बर्तन खरीदते हैं और उनमें पकवान रखकर भगवान धन्वंतरि को अर्पित करते हैं.

लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि असली धन तो स्वास्थ्य है. धन्वंतरि ईसा से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व हुए थे.

वह काशी के राजा महाराज धन्व के पुत्र थे. उन्होंने शल्य शास्त्र पर महत्त्वपूर्ण गवेषणाएं की थीं. उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश दिए इस तरह सुश्रुत संहिता किसी एक का नहीं, बल्कि धन्वंतरि, दिवोदास और सुश्रुत तीनों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त रूप है.

धन्वंतरि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग अमृत का है. उनके जीवन के साथ अमृत का कलश जुड़ा है. वह भी सोने का कलश.

अमृत निर्माण करने का प्रयोग धन्वंतरि ने स्वर्ण पात्र में ही बताया था. उन्होंने कहा कि जरा मृत्यु के विनाश के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था. सुश्रुत उनके रासायनिक प्रयोग के उल्लेख हैं.

धन्वंतरि के संप्रदाय में सौ प्रकार की मृत्यु है. उनमें एक ही काल मृत्यु है, शेष अकाल मृत्यु रोकने के प्रयास ही निदान और चिकित्सा हैं. आयु के न्यूनाधिक्य की एक-एक माप धन्वंतरि ने बताई है.

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