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1962 युद्ध के बाद बहुत कुछ बदला, नहीं बदली तो ड्रैगन की नीति और नीयत

चीनी सैनिक भूटान के डोकलाम पर जबरन कब्जा करने उतरे, तो उनके सामने हमारे जवान चट्टान की तरह डट गए, बस तभी से चीन बौखलाया हुआ है. उसकी बौखलाहट के बीच भारत-चीन की सबसे नाजुक सरहद पर आजतक की टीम पहुंची है. चीनी सेना की चालबाजी से 1959 में तिब्बत पर जबरन कब्जा कर लिया था. तो क्या चीन का मकसद भूटान को अब नया तिब्बत बनाना है?

भारत-चीन सीमा पहुंची आजतक की टीम भारत-चीन सीमा पहुंची आजतक की टीम
साद बिन उमर
  • सिक्किम,
  • 23 जुलाई 2017,
  • अपडेटेड 4:44 AM IST

चीनी सैनिक भूटान के डोकलाम पर जबरन कब्जा करने उतरे, तो उनके सामने हमारे जवान चट्टान की तरह डट गए, बस तभी से चीन बौखलाया हुआ है. उसकी बौखलाहट के बीच भारत-चीन की सबसे नाजुक सरहद पर आजतक की टीम पहुंची है. चीनी सेना की चालबाजी से 1959 में तिब्बत पर जबरन कब्जा कर लिया था. तो क्या चीन का मकसद भूटान को अब नया तिब्बत बनाना है?

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सिक्किम में भारत-चीन-भूटान की सीमा पर आज जो कुछ हो रहा है, उसके गवाह सीमा पर रहने वाले वो तिब्बती भी हैं जो चीनी जुल्मों-सितम का शिकार होकर हिंदुस्तान भाग आए थे. सीमा पर बसे तिब्बतियों का कहना है, 'हम लोगों ने कभी तिब्बत नहीं देखा, हम इंडिया में पैदा हुआ, लेकिन देश तो अपना अपना है, 4-5 हजार के करीब तिब्बती हैं. चीन के साथ कभी अपनापन होगा नहीं. हमें विश्वास है कि भारत हमारे साथ है और इसके बाद कि चीन बदल जाएगा, हम भारत को अपना गुरुजी मानते हैं जो अपनी जगह में हमको रहने के लिए दिया.'

आजतक से बातचीत में तिब्बतियों ने कहा कि चीन ने कब्जा किया तो हमको यहां आकर भटकना पड़ा, यहां नौकरी करते हैं. 1959 में चीन ने तिब्बत के साथ जो कुछ किया, आज वैसा ही बर्ताव वो भूटान के साथ करना चाहता है. चीन शांति के बीच क्या करता है इसका गवाह भूटान है, चीन उलटे भारत की दादागीरी बता रहा है, हम आपको 1959 में ले चलते हैं जब तिब्बती यहां आए थे बड़ी संख्या में. 31 मार्च 1959 को तिब्बत के सबसे बड़े धर्मगुरु दलाई लामा भागकर हिंदुस्तान पहुंचे.

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दरअसल तिब्बत पर चीन ने जबरन कब्जा कर लिया था. भारत ने चीन की इस कायराना और धोखेबाज हरकत की कड़ी आलोचना की थी. लेकिन चीन का साम्राज्यवाद इस कदर बढ़ा हुआ था कि उसने भारत पर ही हमला बोल दिया, जिस भारत ने चीन को भाई मानकर हिंदी चीनी भाई भाई का नारा दिया था, लेकिन आज भारत सतर्क है. लेकिन भारत के इस साफगोई भरे जवाब से चीन तिलमिला उठा, वो भारत को खुली धमकी देने लगा कि डोकलाम में भारत खुद पीछे हट जाए या डोकलाम पर कब्जा कर ले, वरना चीन ने हमला किया तो भारत मारा जाएगा.

पिछले 55 साल में बहुत कुछ बदल गया है. नहीं बदला तो सिर्फ चीन की नीति और नीयत, इसलिए डोकलाम में वह भारत से भिड़ गया. लेकिन सिक्किम में रह रहे तिब्बत के लोगों का मानना है कि भारत भूटान की रक्षा करके बहुत अच्छा काम कर रहा है. सिक्किम के पास डोकलाम में चीन ने चोरी छुपे सड़कें बनाकर ना सिर्फ सीमा की मर्यादा तोड़ी है बल्कि अपनी चालबाजी भी सामने ला दी.

चीन की चाल साफ बता रही है कि 1962 में उसने तिब्बत के लिए भारत को धोखा दिया था, अब वो भूटान को निशाना बनाना चाहता है. जिस डोकलाम क्षेत्र पर सारा विवाद खढ़ा है, वो भूटान का इलाका है लेकिन चीन ने उस पर हमला बोल दिया तो भारत भूटान से अपनी दोस्ती का निर्वाह करते हुए उसके साथ खड़ा है. चीन इस डोकलाम क्षेत्र को अपने सैनिक कैंटोमेंट के रूप में विकसित करना चाहता है, साथ ही डोकलाम के बहाने चीन सिक्किम और उत्तर पूर्व भारत को भारत से अलग करना चाहता है.

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लेकिन भारतीय जवान डोकलाम में भी और डोकलाम से नीचे सिक्किम में भी सरहद पर जी जान से डटे हैं. चीनी सरकार का दावा है कि 1890 में अंग्रेजों के साथ हुए समझौते के तहत डोकलाम उसका इलाका है. इसी बहाने उसकी नजर सिक्किम पर भी है. चीनी दावे के मुताबिक भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी इस समझौते को मान्यता दी थी. लेकिन नेहरू के एक खत से खुलासा हुआ है कि चीन का दावा पूरी तरह झूठा है.

चीनी नक्शे में भूटान के बड़े हिस्से को चीन के हिस्से के तौर पर दिखाने पर आपत्ति जताते हुए उन्होंने चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई को चिट्ठी में लिखा था कि 1890 के चीन और अंग्रेजों के बीच हुए करार में साफ तौर पर सिक्किम पर भारत की संप्रभुता को मान्यता दी गई थी. नेहरू ने साफ लिखा था कि सिक्किम की सीमा को लेकर कोई विवाद नहीं है.

ये बात उस नेहरू को कहनी पड़ी, जिन्होंने चीन पर पूरा भरोसा किया, लेकिन आज तो चीन का सच आईने की तरह साफ है. वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस उम्मीद को भी झुठलाना चाहता है कि दोनों देश गोलियां नहीं चलाएंगे.

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