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पंकज त्रिपाठी की लॉकडाउन डायरीः दुनिया का पता नहीं, मैं बदलूंगा

बेहद मसरूफ फिल्मी सितारों को अपने घर-परिवार में सब्र और सुकून के पल बिताने, कुदरत को करीब से निहारने और जिंदगी के असली मकसद पर गौर करने का मिला भरपूर मौका. अपनी लॉकडाउन डायरी में बता रहे हैं अभिनेता पंकज त्रिपाठी

पंकज त्रिपाठी पंकज त्रिपाठी
शिवकेश मिश्र
  • नई दिल्ली,
  • 15 जून 2020,
  • अपडेटेड 2:44 PM IST

सीख लिया सबक! दुनिया का पता नहीं, मैं बदलूंगा/ पंकज त्रिपाठी

उगता सूरज:

दो साल से इतना व्यस्त था कि अपने ही घर से सूर्योदय और सूर्यास्त नहीं देख पाता था. अब परिवार के साथ रहते हुए यह भी देख पा रहा हूं कि बेटी में कितना सेंस ऑफ ह्यूमर है. हमारी बेटी कम पानी पीती है, यह बात मुझे लॉकडाउन में ही पता चली. इसी दौरान यह बात भी समझ में आई कि हम प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं. उसकी कद्र नहीं कर रहे. कोरोना के बाद देखिए, बंगाल में और फिर मुंबई में तूफान. वह चेतावनी दे रही है. मनुष्य और प्रकृति के बीच एक स्वस्थ रिश्ता बनना चाहिए कि हमारा भी काम चले, तुम्हारा भी, बिना किसी का नुक्सान किए.

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जरूरतें कम, जमीर में दम:

हमें अपनी जरूरतें कम करनी चाहिए, मैं भी उसमें शामिल हूं. मुझे याद है, बाबूजी का दो धोती में दो साल निकल जाता था. हम इच्छाओं के चक्कर में तमाम चीजें लाकर भर लेते हैं. मैंने तय किया है कि कोरोना के बाद दुनिया बदले न बदले, मैं तो बदलूंगा. जीने के लिए बहुत जरूरी चीजें ही इस्तेमाल करूंगा. मैं अपनी जरूरतें सीमित करूंगा.

मेरे जीवन के करीब 22 साल यानी लगभग आधी जिंदगी गांव में तो आधी मेट्रो यानी दिल्ली और मुंबई में गुजरी है. फ्लैश बैक में जब गांव की तरफ देखता हूं तो याद आता है कि प्रकृति से कैसा सीधा रिश्ता था. बचपन में कितनी कम-से-कम चीजों में जिंदगी चलती थी. तब खुशी अब से ज्यादा थी. तब हम बगैर सोशल मीडिया के बहुत सोशल थे. गांव में एक रेडियो के पास बैठके दस लोग समाचार सुनते थे. संचार मीडिया ने हमें हर तरफ से जकड़ लिया है. हम उतने ही असामाजिक हो गए हैं. तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल होगा तो उसका असर मेरे काम, मेरे अभिनय और जीवन पर भी पड़ेगा.

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धर्म सिखाता कोरोना!

ऐसे दौर में अक्सर अध्यात्म का ख्याल आता है. लगता है जिंदगी कितनी क्षणभंगुर है. हर किसी को टॉप पर जाना है. लेकिन टॉप क्या है, कहां खत्म होता है, किसी को मालूम नहीं. टॉप के चक्कर में हम बॉटम भूलते जाते हैं. इस वक्त ब्रिटिश लेखक जॉन मिल्टन को पढ़ रहा हूं. उनके एक लेख में एक लाइन पढ़कर चकित रह गया: परमात्मा के बाद दूसरी चीज है पाखंड, जो अदृश्य रहते हुए भी मौजूद रहता है. हिंदू धर्म में बार-बार कहा गया है कि इंद्रियों को, इच्छाओं को बस में रखिए. कोरोना ने भी यही सिखाया है.

सालाना लॉकडाउन हो:

लॉकडाउन का ही असर है कि मुंबई का आसमान नीला हो गया है. प्रदूषण घट गया है. कोरोना पर भले ही हम काबू पा लें लेकिन सारी दुनिया की सरकारों को यह तय करना चाहिए कि साल में कम से कम एक महीना वे अपने-अपने देश में लॉकडाउन रखेंगी. उस दौरान कार्बन उत्सर्जन बंद रहे, प्रकृति अपने को पूर ले.

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