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फ्रैंकलिन टेंपलटन द्वारा 6 डेट फंड बंद कर देने की वजह से म्यूचुअल फंड निवेशकों में घबराहट है. भारतीय रिजर्व बैंक ने हालात को समझते हुए तत्काल कदम उठाया और 50 हजार करोड़ रुपये की नकदी की व्यवस्था की है. ऐसे में निवेशकों को क्या करना चाहिए? एसआईपी के तरीके से निवेश करने वाले क्या करें? म्यूचुअल फंड के दिग्गज एक्सपर्ट से जानते हैं.
म्यूचुअल फंड शेयर बाजार में निवेश का सुरक्षित रास्ता है
इस बात में कोई दो राय नहीं कि म्यूचुअल फंड निवेश अब भी शेयर बाजार में निवेश का सबसे सुरक्षित रास्ता है. आम निवेशक के लिए यह संभव नहीं होता कि शेयर बाजार की कंपनियों के बारे में लगातार रिसर्च करे और न ही इतना उसके पास समय होता है. इसलिए वह म्यूचुअल फंडों में पैसा लगाता है. म्यूचुअल फंडों में एक्सपर्ट मैनेजर होते हैं, जो ऐसे तमाम निवेशकों का पैसा अच्छी कंपनियों, अच्छे निवेश विकल्पों में लगाकर उन्हें अच्छा फायदा दिलाने की कोशिश करते हैं.
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म्यूुअल फंड मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं- इक्विटी फंड, डेट फंड और हाइब्रिड फंड.
इक्विटी फंड
ये ऐसे फंड होते हैं जिसमें निवेशकों का पैसा शेयर बाजार में लगता है. इसमें फायदा ज्यादा होता है, लेकिन पैसा शेयरों में लगने की वजह से जोखिम भी ज्यादा होता है.
डेट फंड
डेट फंड को अभी तक निवेश का सुरक्षित साधन माना जाता रहा है. लेकिन फ्रैंकलिन टेंपलटन के केस ने चिंता बढ़ाई है. इन म्यूचुअल फंड में निवेश करने पर आपका पैसा डेट साधनों यानी बॉन्ड आदि में लगाया जाता है. डेट फंड में ऐसे लोग निवेश करते हैं जो सुरक्षित रिटर्न चाहते हैंं. इसमें कम जोखिम होता है और कम रिटर्न मिलता है.
हाइब्रिड फंड
हाइब्रिड फंड को बैलेंस्ड फंड भी कहते हैं. इसमें आप जो निवेश करते हैं उसे कंपनी कई तरह के मिश्रित साधनों जैसे शेयर, बॉन्ड आदि में लगाती है. इसमें ऐसे लोग पैसा लगाते हैं जो थोड़े जोखिम और थोड़ी सुरक्षा का संतुलन चाहते हैं.
क्या हुआ फ्रैंकलिन टेंपलटन में
कई जानकार मानते हैं कि इस फंड हाउस ने कुछ ऐसे कॉरपोरेट बॉन्ड में पैसा लगाया था जो बहुत सुरक्षित नहीं थे. जिनमें हाई क्रेडिट जोखिम था. इकोनॉमी की खराब हालत होने की वजह से हाल के वर्षों में कई कॉरपोरेट डिफाल्ट करने लगे हैं.
असल में म्यूचुअल फंड हाउस जनता का पैसा कुछ कंपनियों के बॉन्ड में लगाते हैं. इनमें पैसा लगाने का मतलब है कि कंपनियों को कर्ज दिया जाता है और उन्हें एक निश्चित समय में इन्हें ब्याज सहित लौटाना होता है. लेकिन कई कंपनियों की वित्तीय हालत जब ठीक नहीं रही और वे म्यूचुअल फंड हाउस का पैसा समय से लौटाने में नाकाम रहे तो अफवाह फैलने लगी, निवेशक अचानक अपना पैसा निकालने के लिए टूट पड़े.
इन सबकी वजह से म्यूचुअल फंड हाउस की सांस फूलने लगी.और नुकसान से बचने के लिए उसने ऐसे कई डेट फंड बंद कर दिए. इन फंडों में निवेशकों के करीब 30 हजार करोड़ रुपये फंसे हुए हैं, हालांकि अगर समूचे म्यूचुअल फंडों के एसेट अंडर मैनेजमेंट यानी एयूएम से तुलना करें तो रकम उनके 1.5 फीसदी से भी कम होगी.
म्यूचुअल फंड के जाने-माने एक्सपर्ट धीरेंद्र कुमार कहते हैं, 'असल में संकट की वजह यह है कि इकोनॉमी की खराब हालत के बीच घबराहट में बहुत से निवेशकों ने अपना पैसा इन योजनाओं से निकालना शुरू कर दिया. अचानक अगर एक साथ इतने निवेशक अपना पैसा निकालने लगेंगे तो किसी भी संस्था के साथ समस्या आ सकती है, चाहे वह बैंक हो या कोई अन्य वित्तीय संस्था.'
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अब क्या होगा इन फंडों के निवेशकों का
इन फंडों के निवेशकों को अब लंबा इंतजार करना पड़ेगा, लेकिन उनका पैसा उन्हें वापस मिल सकता है. रिजर्व बैंक ने भी इस दिशा में कोशिश शुरू की है. धीरेंद्र कुमार कहते हैं, 'निवेशका का पूरा पैसा मिल सकता है. लेकिन अब लंबी प्रक्रिया है, इसलिए उन्हें इंतजार करना होगा.'
तो क्या करें बाकी म्यूचुअल फंडों के निवेशक
धीरेंद्र कुमार कहते हैं कि बाकी फंडों के निवेशकों को घबराना नहीं चाहिए. एसआईपी से इक्विटी या अन्य किसी लॉन्ग टर्म फंड में निवेश करने वाले तो बिल्कुल न घबराएं. म्यूचुअल फंड तीन साल, पांच साल या उससे भी लॉन्ग टर्म में अच्छा फायदा देते हैं. इसलिए आप ऐसे फंडों की एसआईपी चलाते रहें. अब तीन साल बाद, या पांच साल बाद तो यही हालात नहीं रहने वाले हैं.
क्या एसआईपी चलाते रहना चाहिए
म्यूचुअल फंड में निवेश करने के लिए सिस्टमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान (SIP) एक अच्छा विकल्प है. ज्यादातर लोग एसआईपी के द्वारा हर महीने 500 या 1 हजार-2 हजार रुपये खासकर इक्विटी म्यूचुअल फंड में लगाते हैं. एसआईपी का फायदा यह है कि आपको कम पैसे में ही शेयर बाजार में निवेश का फायदा मिलता है. शेयर बाजार में गिरावट हो तो भी आपको एसआईपी में निवेश करते रहना चाहिए और चाहें तो किसी नए प्लान में भी एसआईपी से निवेश शुरू कर सकते हैं. इसकी वजह से यह है कि जब शेयर बाजार में गिरावट होती है तो किसी म्यूचुअल फंड की यूनिट भी सस्ती हो जाती है, यानी आपको उसी मंथली रकम में किसी म्यूचुअल फंड की ज्यादा यूनिट मिलेगी.