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यह कैसी सब्सिडी

सेंट्रल हज कमेटी की कार्यशैली की वजह से हाजियों को मिलने वाली सरकारी सब्सिडी का जमकर दुरुपयोग हो रहा. इसके अलावा, बुजुर्ग या महिला के साथ जाने वाला व्यक्ति, जो पहले भी हज कर चुका हो, उसे सब्सिडी नहीं मिलती.

महेश शर्मा
  • म.प्र.,
  • 25 मार्च 2014,
  • अपडेटेड 4:30 PM IST

उज्जैन के कोट मुहल्ला क्षेत्र में रहने वाली 52 वर्षीया नूरजहां के लिए 6 नवंबर, 2013 का दिन मनहूस साबित हुआ जब उनके ऊपर सीलिंग फैन आ गिरा. वे अपने शौहर बशीर खान के साथ हज पर गई थीं. हज की औपचारिकताएं पूरी हो गई थीं और 15 नवंबर को लौटने से पहले उन्हें मदीना जाना था.

लेकिन मक्का में ही सीलिंग फैन गिरने से उनका जबड़ा टूट गया. दो ऑपरेशन की तकलीफ झेलने वाली नूरजहां और उनके शौहर से करीब एक माह के लिए उस कमरे का किराया 5,000 रियाल (करीब 80,000 रु.) लिया गया था. कमरे में छह श्रद्धालु थे अर्थात जिस कमरे में वह जानलेवा पंखा गिरा उसका एक माह का किराया लगभग ढाई लाख रु. भुगतान किया गया.

भारत से हज कमेटी ऑफ इंडिया के माध्यम से हज पर जाने वाले करीब सवा लाख लोगों के ठहरने के लिए सऊदी अरब स्थित कॉन्सल जनरल द्वारा व्यवस्था की जाती है. हज कमेटी ऑफ इंडिया के सदस्य और मध्य प्रदेश हज कमेटी के चेयरमैन डॉ. सनवर पटेल आरोप लगाते हुए कहते हैं, ‘‘यह भ्रष्टाचार का बड़ा नमूना है जिसमें चंद लोग श्रद्धालुओं की जेबों पर डाका डाल रहे हैं.

रहने की व्यवस्था पर सालाना 900 करोड़ रु. से ज्यादा खर्च किए जाते हैं लेकिन कोई लिखित दस्तावेज, इकरारनामा अथवा रसीद-वाउचर पेश नहीं किया जाता.’’ न तो टेंडर के माध्यम से इतनी बड़ी राशि का ठेका दिया जाता है, न ही कोटेशन के माध्यम से दरें आमंत्रित कर कम दर वाले को ठहरने की व्यवस्था करने को कहा जाता है.

भ्रष्टाचार की जड़
भ्रष्टाचार की आशंका को तब बल मिला जब भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने 31 मार्च, 2005 से 31 मार्च, 2012 तक हज कमेटी के बही-खातों का ऑडिट किया तो उन्होंने कमेटी के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं पाया जिससे जद्दा में भारतीय महावाणिज्य दूतावास की ओर से चलाए जा रहे हज कमेटी के खातों में उपलब्ध शेष राशि का मिलान हो सके.

अगस्त, 2013 में हज कमेटी के सीईओ अताउर रहमान ने कॉन्सल जनरल को पत्र लिखकर सीएजी की टिप्पणी की जानकारी देते हुए उनके कार्यालय  द्वारा दिए गए व्यय और प्राप्ति खातों के साथ खर्च का विवरण मांगा. जवाब में 2012 में किए गए खर्च का विवरण तो भेजा गया लेकिन कोई वाउचर अथवा दस्तावेज नहीं दिए गए. सदस्यों की आपत्ति के बाद नवंबर, 2013 में हज कमेटी के सीईओ ने कॉन्सल जनरल से वाउचर अथवा खर्च से संबंधित दस्तावेज मांगे जो अब तक नहीं भेजे गए हैं.

कमेटी के डिप्टी सीईओ एम.ए. पठान कहते हैं, ‘‘पत्र लिखे हैं, वाउचर मंगाने संबंधी प्रक्रिया जारी है.’’ हज कमेटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन तनवीर अहमद भी गड़बड़ी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ‘‘कॉन्सल जनरल बिल्डिंग किराए के संबंध में हज कमेटी को गलत जानकारी देते हैं और वर्तमान किराए को देखकर तो ऐसा लगता है कि हज कमेटी के प्रभावी लोग उनसे मिले हुए हैं.’’ मिलीभगत के आरोपों को इस तथ्य से बल मिलता है कि 2012 में हज कमेटी सदस्यों के यात्रा-सत्कार भत्ते पर जद्दा स्थित कॉन्सल जनरल ने 6,50,000 रियाल खर्च किए जो भारतीय मुद्रा में करीब एक करोड़ रु. है.

वर्ष 1999 से 2006 तक हज कमेटी के चेयरमैन रहे अहमद के अनुसार उनके कार्यकाल में आठ साल तक एक बार भी मक्का-मदीना में भवनों का किराया नहीं बढ़ाया गया जबकि अब यह छह साल में तीन गुना बढ़ गया. वे बताते हैं, ‘‘कई बार कॉन्सल जनरल ने आवास का किराया प्रति श्रद्धालु 1,250 रियाल बताया तो मैंने खुद मौके पर तस्दीक कर उसे 1,050 रियाल पाया.’’
 
हज सब्सिडी की जरूरत नहीं
गड़बड़ी की आशंका विमान किराए में व्यक्त की जाती है. डॉ. पटेल कहते हैं, ‘‘ताज्जुब की बात है कि इतनी बड़ी तादाद में एक साथ हर साल यात्री मिलते हैं जिनके लिए कोई भी एयरलाइंस खुशी-खुशी सेवा देने को राजी हो जाएगी लेकिन ग्लोबल टेंडर नहीं मंगाए जाते.’’ फिलहाल कुछ यात्री एयर इंडिया की मार्फत और बाकी सऊदी एयरलाइंस से आते-जाते हैं. इसके लिए ये एयरलाइंस बड़ी राशि का भुगतान प्राप्त करती हैं.

देशभर में कुल 21 स्थानों से हज यात्री सीधे चार्टर उड़ानों से जद्दा रवाना होते हैं और हर स्थान का हवाई किराया अलग-अलग वसूला जाता है. किराए में इतना ज्यादा अंतर है कि इसका कोई तार्किक आधार नजर नहीं आता. जहां श्रीनगर के हज यात्री से आने-जाने के लिए 1,54,000 रु. बतौर किराया लिया जाता है, वहीं अहमदाबाद के यात्री के लिए यह 57,942 रु. है. बिहार के गया से जाने वाले यात्री के लिए किराया 95,500 रु. है तो समीप ही रांची के यात्री के लिए 78,500 रु. है.

हालांकि हवाई किराए का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 2012 के दिशा-निर्देशों के अनुसार अगले 10 वर्ष में हज सब्सिडी पूरी तरह खत्म करनी है. इसलिए जहां 2011 में हवाई किराए के लिए हज यात्री से 16,000 रु. लिए गए, वहीं 2013 में 28,000 रु. बतौर किराया लिया गया. जम्मू-कश्मीर के यात्रियों में लगभग डेढ़ लाख रु. के मूल किराए को लेकर बड़ा असंतोष रहा.

दरअसल बुजुर्ग या महिला के साथ जाने वाला व्यक्ति, जो पहले भी हज कर चुका हो, उसे सब्सिडी नहीं मिलती. किराए में इस अंतर के बारे में जानने के लिए हज कमेटी के सीईओ रहमान से बात करने का प्रयास किया गया लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए. डिप्टी सीईओ पठान कहते हैं, ‘‘यह शासन स्तर का मामला है, हम कुछ नहीं कर सकते.’’

हाल में मिनी हज कहे जाने वाले उमरा से लौटे म.प्र. काजी काउंसिल के चेयरमैन और इंदौर शहर काजी डॉ. मोहम्मद इशरत अली कहते हैं, ‘‘सामान्य दिनों में निजी टूर ऑपरेटर जैसे व्यावसायिक लोग 30 से 50,000 रु. में मक्का-मदीना की यात्रा करा देते हैं जिसमें ठहरना और खाना शामिल होता है. ऐसे में हज के लिए एयरलाइंस द्वारा लिया जा रहा किराया बहुत ज्यादा है.’’

आम तौर पर मुंबई या दिल्ली से जद्दा का हवाई किराया 13 से 18,000 रु. है और वापसी की बुकिंग साथ हो तो मात्र 24,000 रु. लगते हैं. इस मामले को उठाने वाले डॉ. पटेल कहते हैं, ‘‘हज सब्सिडी की जरूरत ही कहां बची है. श्रद्धालु से जो राशि बतौर किराया ली जा रही है वही काफी है. इस तरह केंद्र सरकार द्वारा हज यात्रियों को सब्सिडी के नाम पर दी जा रही अरबों रु. की राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है.’’

टेंडर नहीं मंजूर
सुप्रीम कोर्ट के सामने वर्ष 2011 में हज का मामला आया तो उसने इसे जनहित याचिका की तरह लिया और हज पॉलिसी, सऊदी अरब में ठहरने तथा हवाई किराया सहित छह बिंदुओं पर विचार किया. अप्रैल, 2013 में दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जहां सऊदी अरब में ठहरने की व्यवस्था के लिए सालाना की बजाए कम-से-कम 5 साल के लिए बिल्डिंग किराए पर लेने की बात कही, वहीं हवाई किराया युक्तिसंगत करने के लिए कम-से-कम तीन सऊदी एयरलाइंस और भारत की सभी एयरलाइंस से टेंडर लेने की बात कही.

केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि सऊदी अरब और भारत सरकार के बीच हुए समझौते के तहत ग्लोबल टेंडर संभव नहीं है. लेकिन मध्य प्रदेश हज कमेटी के चेयरमैन डॉ. सनवर पटेल पूछते हैं, ‘‘सऊदी पॉलिसी और एग्रीमेंट के कारण यदि एयर इंडिया और सऊदी एयरलाइंस के माध्यम से ही यात्रा संभव है तो यह एयरलाइंस सब कॉन्ट्रैक्ट कम दरों पर अन्य छोटी एयरलाइंस को क्यों देती हैं?’’

पटेल की बात तथ्यपूर्ण है क्योंकि हज कमेटी के एयर चार्टर प्रभारी हशमत पारकर ने अपनी रिपोर्ट में कमेटी के सामने यह बात स्वीकार की है कि एयर इंडिया को आवंटित 12 स्थानों में से 8 स्थानों पर सब कॉन्ट्रैक्ट दिए गए जिनमें से गया के यात्रियों के लिए फ्रांस की एवियन एयर, गुवाहाटी और औरंगाबाद के लिए अमेरिका की डायनेमिक एयरवेज और मंगलूर, गोवा, रांची, इंदौर तथा भोपाल के यात्रियों के लिए पुर्तगाल की व्हाइट एयर की सेवाएं ली गईं.

हज कमेटी द्वारा गठित एयर चार्टर सब कमेटी ने 31 जुलाई, 2013 की बैठक में इस बात पर आपत्ति भी की थी क्योंकि कम दर में सब कॉन्ट्रेक्ट लेने वाली छोटी एयरलाइंस लापरवाही बरतती हैं.

वैसे लापरवाही नागरिक उड्डयन मंत्रालय और एयर इंडिया के स्तर पर भी कम नहीं है. हज के लिए उड़ान 7 सितंबर से शुरू होनी थी लेकिन एयर इंडिया ने अंतिम समय पर डायनेमिक एयरवेज को कॉन्ट्रेक्ट दिया. इसलिए गुवाहाटी से 11 सितंबर को उड़ान संभव हो सकी जिसका शिड्यूल 9 सिंतबर को उपलब्ध कराया गया. इस कारण हज यात्रियों को सूचना देने में विलंब हुआ जो दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से आते हैं.

वैसे डायनेमिक एयरवेज के ऑपरेटर भरत जवेरी को सब कॉन्ट्रेक्ट देने की कवायद की खबर मिलते ही 2 सितंबर को हज कमेटी सीईओ ने आपत्ति जताते हुए नागरिक उड्डयन मंत्रालय को पत्र लिखा था जिसमें बताया गया कि 1996 में जवेरी ओकाडा एयरलाइंस ऑपरेट करते थे और 2012 में हेलेनिक इंपीरियल एयरवेज. दोनों मौकों पर हज यात्रा में उनकी सेवाएं निम्नस्तरीय रहीं इसलिए उन्हें हज ऑपरेशन से दूर रखा जाए. लेकिन फिर भी उन्हें यह काम दिया गया.

हज यात्रियों का सबसे ज्यादा पैसा ठहरने की व्यवस्था पर खर्च होता है. डॉ. अली कहते हैं, ‘‘सरकार सऊदी अरब में निवेश कर वहां अपने स्वयं के भवनों का निर्माण करे और हाजियों को मुफ्त ठहराए. हज के बाद के बाकी 10 महीने सरकार उन भवनों को किराए पर देकर अपना निवेश वापस पा सकती है.’’ इस तरह सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक चरणबद्ध ढंग से हज सब्सिडी वापस लेने में आसानी होगी. इससे उन लोगों की भी शिकायत दूर हो जाएगी जो सब्सिडी को जायज नहीं मानते और भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी कम हो जाएगी.  

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