
देश में लॉकडाउन का तीसरा चरण लागू हो चुका है, जिसमें ज्यादातर कारोबार और इंडस्ट्री को कामकाज की इजाजत दी गई है. क्या अब आगे इकोनॉमी पटरी पर आएगी? सरकार को इसके लिए क्या करना होगा? कैसी होगी अगले छह महीने-साल भर में इंडस्ट्री के अलग-अलग सेक्टर की हालत? इसके बारे इंडस्ट्री जगत से जुड़े कई दिग्गजों ने इंडिया टुडे ई-कॉन्क्लेव में मंथन किया और उन्होंने अपने-अपने सेक्टर के हालात को बताते हुए महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए.
मीडिया पर किस तरह का है असर
ई-कॉन्क्लेव के जंप स्टार्ट सीरीज में सोमवार को आयोजित सत्र का संचालन इंडिया टुडे टीवी के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने किया. इंडस्ट्री के ज्यादातर दिग्गजों ने यह माना कि संकट बहुत बड़ा है और जिस तरह से यह अचानक आया है उसी तरह से हमें तात्कालिकता दिखाते हुए बड़े कदम भी उठाने होंगे. इकोनॉमी वेंटिलेटर पर है और उसे मौत के मुंह में जाने से बचाना होगा.
कोरोना वायरस की वजह से 42,000 से ज्यादा लोग भारत में संक्रमित हो चुके हैं और अब देश भर में लॉकडाउन का तीसरा चरण शुरू हो चुका है. इन सबका अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है. इस संकट का मीडिया पर किस तरह से असर पड़ रहा है, इस बारे में वाल्ट डिज्नी कंपनी के प्रेसिडेंट और स्टार ऐंड डिज्नी इंडिया के चेयरमैन उदय शंकर ने कहा कि फिल्म निर्माण, सीरियल निर्माण कुछ नहीं हो रहा. कारोबार संकट में आने पर इंडस्ट्री सबसे पहले विज्ञापन में कटौती करती है. विज्ञापनों में व्यापक तौर पर कटौती हो रही है. यह पहले मिलने वाले विज्ञापनों के करीब 30 फीसदी तक रह गया है.
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फाइनेंशियल सेक्टर पर किस तरह का असर
कोरोना के फाइनेंशियल सर्विसेज पर पड़ने वाले असर पर एडेलवाइज ग्रुप के चेयरमैन एवं सीईओ रशेष साह ने कहा, 'यह एक अभूतपूर्व संकट है. यह संकट वित्त वर्ष के अंत में आया है और हम सबको झटका लगा है. पिछले कुछ दिनों में हमने भारत और दुनिया में सरकारों के पहल देखे हैं.रिजर्व बैंक और सरकार आगे आ रही है. लेकिन उपभोक्ता आगे नहीं आ रहा, अप्रैल में बिक्री शून्य रही है.'
उन्होंने कहा कि भारत की बात करें तो तीन फायदे की बातें दिख रही हैं. तेल की कीमत काफी कम हुई जो लॉन्ग टर्म में हमारे लिए काफी फायदेमंद है. महंगाई कोई समस्या नहीं जिससे रिजर्व बैंक मनमाफिक नीतियां बना सकता है और तीसरा ग्लोबल सप्लाई चेन बदल रहा है जिससे भारत को फायदा मिल सकता है. चीन की मैन्युफैक्चरिंग भारत की तरफ आ सकती है.
हेल्थ सेक्टर की सेहत खराब
अपोलो हॉस्पिटल्स की जॉइंट एमडी एवं फिक्की की प्रेसिडेंट डॉ. संगीता रेड्डी ने कहा कि बहुत से अस्पतालों ने बैंक लोन लिया है और उनको अपने कर्मचारियों को सैलरी देनी ही है. उनकी इनकम शून्य है. जो अस्पताल कोविड-19 के उपचार में लगे हैं उन्हें इक्विपमेंट, ट्रेनिंग आदि पर काफी खर्च करना पड़ा है. इसलिए इस सेक्टर को काफी सरकारी सहयोग की जरूरत है.
पेपर इंडस्ट्री भी मुश्किल में
पेपर इंडस्ट्री आर्थिक गिरावट का मुकाबला कैसे कर रही है? इसके जवाब में जेके पेपर के एमडी हर्षपति सिंहानिया ने कहा कि इंडस्ट्री को लागत और अन्य कई तरह के खर्च करने ही हैं. अब अगर कमाई ही नहीं है तो वे इसकी व्यवस्था कैसे करेंगे? हमें यह देखना होगा कि कारोबार पटरी पर कैसे आता है. मांग बढ़ाना और ग्राहकों में भरोसा जगाना इस समय महत्वपूर्ण है.
MSME के साथ बड़े उद्योगों को भी चाहिए सपोर्ट
एचएसबीसी की पूर्व कंट्री हेड नैना लाल किदवई ने कहा कि हमारे देश में जिस तरह से आर्थिक गिरावट देखी जा रही है वह चिंताजनक है. अब बिजनेस को फिर से पटरी पर लाना बड़ी चुनौती है. हमारी जीडीपी घटकर 1.7 फीसदी तक आ सकती है. कई देश निगेटिव ग्रोथ में पहले से थे, लेकिन हम 6 फीसदी से इतना नीचे जा रहे हैं जो कि चिंता की बात है. लॉकडाउन काफी सफल रहा है, लेकिन अब सप्लाई साइड और डिमांड साइड पर काम करना होगा. एक सर्वे के अनुसार, 60 फीसदी इंडस्ट्री मानती है कि सामान्य हालत होने में 9 महीने लगेंगे, बाकी मानते हैं कि एक साल लगेगा. इसलिए एमएसएमई और बड़े इंडस्ट्रीज को जितनी जल्दी राहत मिले बेहतर होगा.
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ऑटो सेक्टर कैसे हो स्टार्ट
ऑटो सेक्टर की हालत भी बेहद खराब है, अप्रैल में बिक्री शून्य रही है. इसके बारे में काइनेटिक ग्रीन एनर्जी एंड पावर सॉल्युशंस की फाउंडर एवं सीईओ सुलज्जा फिरोदिया मोटवाणी ने कहा कि इंडस्ट्री में इस बात को लेकर काफी चिंता है कि उत्पादन फिर से किस हद तक शुरू हो सकता है और मांग को कैसे बहाल किया जाए. ज्यादा ऑटो प्लांट रेड जोन में हैं. जब तक सप्लाई चेन, डीलरशिप नहीं शुरू होती, उत्पादन शुरू करने को कोई मतलब नहीं है. मजदूरों को कारखानों तक वापस लाना होगा और ग्राहकों को शोरूम तक.
क्या गाड़ियों की बिक्री शुरू होने की कोई उम्मीद दिख रही है? इस सवाल पर मोटवाणी ने कहा कि अभी प्राथमिकता लोगों का जीवन बचाना है. सबसे पहले लोगों के मन से डर को दूर किया जाए और वे सुरक्षित महसूस करें. बड़े कारोबार अब वेंटिलेटर के सहारे हैं, उनकी मौत हो जाए इससे पहले हमें सक्रिय होना होगा. समस्या जटिल है, लेकिन समाधान तत्काल निकालना होगा.
क्या करना चाहिए सरकार को?
इकोनॉमी को पटरी पर लाने के लिए सरकार क्या कर सकती है? इस सवाल पर उदय शंकर ने कहा कि संकट जिस तरह का चौंकाने वाला है उसी तरह क्रांतिकारी कदम भी उठाना होगा. हमारी पूरी इकोनॉमी एक-दूसरे से जुड़ी है. सप्लाई और डिमांड को गति देनी होगी. सरकार को लोगों और खासकर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के हाथ में पैसा पहुंचाना होगा. इसी तरह शहरी गरीबों को भी राहत देनी होगी.
सिंहानिया ने कहा कि बड़े कारोबारियों को भी मदद की जरूरत है, क्योंकि उनकी लागत काफी बड़ी होती है. उनको लोन चुकाना होता है, कर्मचारियों को सैलरी देनी होती है. बड़े कारोबार पर काफी हद तक एमएसएमई भी निर्भर होते हैं. बड़ी कंपनियां संकट में आएंगी तो बैंकों पर बोझ बढ़ेगा, उनका एनपीए बढ़ेगा.
लेकिन सरकार के पास संसाधन सीमित हैं. इस सवाल पर नैना लाल किदवई ने कहा कि हमें सेक्टरवार रवैया अपनाना होगा. अगर बड़े मैन्युफैक्चरर्स को सपोर्ट मिलता है तो बाकी सप्लायर और एमएसएमई को भी पैसा मिलता है. पूरे चेन को सपोर्ट करना होगा.
डॉ. संगीता रेड्डी ने कहा, 'सबसे पहले कंज्यूमर के हाथ तक पैसा पहुंचाना होगा, इसके बाद एमएसएमई को और तीसरे हेल्थकेयर सेक्टर की मदद करनी होगी.'
फाइनेंशियल सेक्टर में भरोसा बहाली कैसे हो?
फाइनेंशियल सेक्टर में भरोसा बहाली के लिए क्या करना चाहिए, इस सवाल पर रशेष साह ने कहा कि फाइनेंशियल सिस्टम बॉडी में ब्लड की तरह है, इसमें लिक्विडिटी का प्रवाह बनाए रखना होगा. इकोनॉमी को धीरे-धीरे और सावधानी से खोलना होगा. नकदी के प्रवाह को फिर से शुरू विश्वास बहाली से ही की जा सकती है. रिजर्व बैंक ने ऐसा किया भी है. हमारा फाइनेंशियल सिस्टम काफी हद तक बैंक पर निर्भर करता है. एनबीएफसी को IL&F और टेंपलटन जैसी समस्याओं से जूझना पड़ा है. सबसे जरूरी है कि नकदी का प्रवाह हो, सरकार और रिजर्व बैंक क्रेडिट गारंटी दें, एमएसएमई के लिए कॉन्फिडेंस, लिक्विडीटी वापस होना चाहिए.