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लखनऊ पिकप भवन अग्निकांडः केस दर्ज, गुजरात की फोरेंसिक टीम करेगी जांच

पिकप भवन अग्निकांड मामले में सीएम योगी के निर्देश पर एफआईआर लिखाई गयी है.यह एफआईआर आईपीसी 353 ,436, 427  और प्रिवेंशन ऑफ डैमेजेस टू पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट 1984 की धारा 4 में  एफआईआर दर्ज हुई है.

लखनऊ पिकप भवन अग्निकांड मामला (प्रतीकात्मक तस्वीर) लखनऊ पिकप भवन अग्निकांड मामला (प्रतीकात्मक तस्वीर)
कुमार अभिषेक
  • लखनऊ,
  • 07 जुलाई 2019,
  • अपडेटेड 2:23 PM IST

लखनऊ पिकप भवन अग्निकांड मामले में सीएम योगी के निर्देश पर एफआईआर लिखाई गयी है. यह एफआईआर उप सामान्य प्रबंधक मानव संसाधन विकास/विधि पिकप भवन ऋचा भार्गव ने अज्ञात के खिलाफ विभूतिखण्ड थाने में दर्ज कराई है. आईपीसी 353 ,436, 427  और प्रिवेंशन ऑफ डैमेजेस टू पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट 1984 की धारा 4 में  एफआईआर दर्ज हुई है. आग कांड के बाद और सीएम के आदेश के बाद बनी जांच कमेटी के अध्यक्ष एडीजी इंटेलिजेंस एसबी शिरोडकर ने अपनी रिपोर्ट में साजिश की आशंका जताई है.

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रिपोर्ट में कहा गया है कि साजिश के तहत सीनियर मैनेजर एनके सिंह के ऑफिस में फाइलें इकट्ठा कर आग लगाई गई है. गौरतलब है कि 3 जुलाई को  पिकप भवन में अचानक भयंकर आग लग गई थी. इसके बाद सीएम ने एडीजी इंटेलिजेंस एसबी शिरोडकर के नेतृत्व में कमेटी बनाकर 48 घंटे में रिपोर्ट मांगी थी. जिसमें रविवार को एफआईआर दर्ज की गई है.

गौरतलब है कि आज गुजरात की फोरेंसिक टीम लखनऊ आकर की आग कांड की फोरेंसिक जांच करेगी. कई मैटेरियल संदिग्ध होने पर फोरेंसिक टीम सभी की छानबीन करेगी. जानकारी के मुताबिक फोरेंसिक टीम दोपहर में पिकअप भवन पर पहुंच कर जांच शुरू करेगी.

सैकड़ों फाइलें हुई थीं राख

बता दें कि 3 जुलाई को शाम 7 बजे पिकप भवन स्थित प्रदेशीय इंडस्ट्रियल एवं इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन यूपी लिमिटेड के दफ्तर में आग लग गई थी. जिसमें लोन से संबंधित सैकड़ों फाइलें राख हो गईं थी. गौरतलब है कि यहां से उद्यमियों को  लोन दिये जाते हैं. ये आंशका जताई जा रही है कि पिकप भवन में आग लगी नहीं थी बल्कि साजिशन लगाई गई थी. आग में लोन से संबंधित फाइलें जली थीं जिनका ऑडिट नहीं हुआ था. इन सभी फाइलों का डिजिटलाइजेशन भी नहीं हुआ था. जांच के बाद शनिवार को समिति ने शासन को अपनी रिपोर्ट सौंप दी.

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साजिश का शक

जानकारी के अनुसार पिकप भवन भवन में लगी आग की जगह को गौर से देखा जाये तो ऐसा लगता है कि ये आग अपने आप नहीं लगी है. विभाग अधिकारियों व कर्मियों के विरोधाभासी बयान और सूचना देने में हुई देरी से साजिश का शक गहरा जाता है. आग के दस्तावेज ज्यादातर वो थे जिन्हें पूर्व में दिए गए लोन की जानकारी थी और जिनका अभी  डिजिटलाइजेशन ही नहीं हुआ था. इन फाइलों का ऑडिट किया जाना आभी बाकी था. अंदाजा लगाया जा रहा है कि अगर फाइलों का ऑडिट होता तो कई बड़े अधिकारी इसकी जद में आते और एक बहुत बड़े घोटाले पर से पर्दा उठ सकता था. 

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