
देश की गरीब जनता को एक अदद आशियाना देना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महत्वकांक्षी सपना है. इसी को लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना का ताना-बाना बुना गया था. लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य में ये योजना अफसरों के बुने मकड़जाल में फंस गयी है.
छत्तीसगढ़ में इस योजना के लाभार्थियों ने अफसरों के कहने पर अपना कच्चा घर तोड़ डाला. और मकान को पक्का करने का काम शुरू कर दिया, इस भरोसे के साथ कि पीएम आवास योजना की पहली किश्त तो उन्हें मिल ही जायेगी.
लेकिन लालफीताशाही के वादे कुछ इस कदर थे कि सैकड़ों लोगों के पास पक्का घर तो क्या पहले वाला कच्चा घर भी नहीं बचा. हालात इस कदर आमादा हो चले हैं कि अब ये लोग बारिश में जैसे-तैसे अपना गुजारा करने को मजबूर हो गए हैं.
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले की धारकोट ग्राम पंचायत में रहने वाले 70 वर्षीय बुजुर्ग जगन्नाथ पीठाकु को डेढ़ साल अफसरों ने प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए चयन किया. कुछ दिनों बाद अफसरों की टीम आयी. उन्होंने कच्चा घर तोड़कर पक्का घर बनाने की बात कही.
अफसरों के इस निर्देश के बाद जगन्नाथ का चेहरा खिल उठा. उसे लगा की जिंदगी के अंतिम मोड़ में पक्के घर में रहने का उसका सपना पूरा हो जाएगा. लेकिन डेढ़ साल से वो पीएम आवास की पहली किश्त का इंतजार कर रहा है. पैसा तो उसे मिला नहीं, उल्टा उसका कच्चा आशियाना भी उससे छीन गया.
यही हाल योजना के अन्य लाभार्थियों का है. पंचायत के सीईओ विनय अग्रवाल बताते हैं,ऐसे मामले तकनीकी दिक्कतों के चलते हुए. लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि डेढ़ साल से इस तरह की तकनीकी गड़बड़ियों दूर क्यों नहीं हो पायी.
ये हाल अधिकारियों का है तो वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण और पंचायत विकास विभाग धड़ल्ले से कोटा पूरा करने के लिए आवास योजना के आवेदन स्वीकार कर रहा है. इस योजना के क्रियान्वयन को लेकर उसके पास कोई पुख्ता बंदोबस्त है ही नहीं.
बाबुओं से लेकर अफसरों के चक्कर काटना लाभार्थियों का रोज़मर्रा का काम हो चला है.अब योजना के क्रियान्वन को लेकर कांग्रेस भी सरकार पर सवालिया निशान खड़ा कर रही है.