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राफेल सौदे में नेता-व्यापारी गठजोड़ !

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वाज ओलांद ने 59,000 करोड़ रु. के राफेल सौदे में नेता-व्यापारी गठजोड़ का दिया संकेत. इससे अनिल अंबानी को लाभ पहुंचाने के कयास के साथ ही नया राजनैतिक विवाद शुरू हो गया. क्या यह सौदा मोदी सरकार के लिए महंगा साबित होगा?

दिग्गजों की बैठकः फरवरी 2017 में एलिसी पैलेस में राष्ट्रपति फ्रांस्वाज ओलांद के साथ अनिल अंबानी दिग्गजों की बैठकः फरवरी 2017 में एलिसी पैलेस में राष्ट्रपति फ्रांस्वाज ओलांद के साथ अनिल अंबानी
संध्या द्विवेदी/मंजीत ठाकुर
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  • 01 अक्टूबर 2018,
  • अपडेटेड 7:33 PM IST

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वाज ओलांद ने 2016 में हुए 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर भारत में जारी विवाद को और बढ़ा दिया है. 21 सितंबर को ओलांद ने फ्रांस के समाचार पोर्टल मीडियापार्ट को बताया कि भारत सरकार ने औद्योगिक साझेदार के तौर पर अनिल अंबानी समूह का नाम ही प्रस्तावित किया था. उनका यह बयान मोदी सरकार के दावे के विपरीत है, जो वह अब तक कहती रही है.

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ओलांद का बयान मोदी सरकार के इस दावे के खिलाफ जाता है कि इस सौदे में अनिल अंबानी की मौजूदगी से उसका कुछ लेना-देना नहीं है. इसके महज तीन ही दिन पहले रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने मीडिया से कहा था, "मैंने उनका या किसी का भी नाम सरकारों के बीच हुए इस समझौते में नहीं रखा और न ही मैं एक कारोबारी कंपनी को समझौते में शामिल होने के लिए कह सकती हूं.''

उन्होंने सरकार का वही रुख दोहराया जो उसने नवंबर 2017 में कांग्रेस के राफेल को जोर-शोर से मुद्दा बनाने के बाद से ही अपना रखा है.

इस सौदे ने अब दोनों देशों की सरकार को शर्मिंदगी और परेशानी में डालने की गंभीर संभावनाएं पैदा कर दी हैं. संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर ओलांद के बयान के बारे में पूछे जाने पर फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने "सरकार से सरकार के बीच चर्चा'' में "साफ नियमों'' की बात की और यह भी कहा कि यह करार दोनों देशों के बीच ज्यादा व्यापक सैन्य और रक्षा गठबंधन का हिस्सा बन रहा है.

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इसके बावजूद उनके पूर्ववर्ती का बयान इस विवाद में अभी और गूंजता रहेगा, जो 2019 के लोकसभा चुनाव तक खत्म न होने वाली कडिय़ों में चलते रहने की संभावनाओं से भरपूर है.

विपक्षी कांग्रेस मोदी सरकार पर गोले दाग रही है, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, नेता-व्यापारी गठजोड़ या क्रोनी कैपिटलिज्म और कीमत बहुत बढ़ाकर राफेल विमान खरीदने का आरोप लगा रही है और संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से इसकी जांच करवाने की मांग कर रही है.

ऐसे में राफेल विवाद सरगर्म और विवादास्पद सियासी मुद्दा बन गया है जिससे निपटना आसान नहीं है. ज्यादातर सियासी बहसों की तरह इसमें भी कई धारणाएं हैं हालांकि कुछ तथ्य भी हैं.

किस कीमत पर खरीदे राफेल विमान?

दासो राफेल की उपयोगिता और मारकता अब तक सवालों से परे है. खुद भारतीय वायु सेना ने गैरमामूली ढंग से सार्वजनिक तौर पर इसकी तस्दीक करते हुए राफेल की क्षमताओं को शानदार बताया है.

सितंबर की 13 तारीख को एयर चीफ मार्शल बी.एस. धनोआ ने 2005 में वायु सेना के प्रस्तावित विमानों के सात बेड़ों के बजाए केवल दो बेड़े खरीदने के फैसले का बचाव किया और मिराज 2000 तथा मिग-23 विमानों की पहले की आपात खरीद की नजीर का हवाला दिया.

एक हफ्ते बाद वायु सेना के डिप्टी चीफ रघुनाथ नांबियार ने फ्रांस के एक एयर बेस से राफेल विमान उड़ाया और यह दिखाया कि जहां तक खरीद की बात है, तो वायु सेना इस सौदे के साथ है. जिस कॉस्ट नेगोशिएटिंग कमेटी (सीएनसी) ने वाकई इस सौदे की कीमत को लेकर मोलभाव किया था, उसकी अध्यक्षता 2016 में डिप्टी चीफ एयर मार्शल आर.के. सिंह भदौरिया ने की थी, न कि जॉइंट सेक्रेटरी (एयर) के पद पर नियुक्त आइएएस अफसर ने, जैसा कि कायदा रहा है. सीएनसी की अहम बैठकें वायु भवन में हुई थीं, न कि एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित साउथ ब्लॉक के रक्षा मंत्रालय मुख्यालय में.

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अलबत्ता मुद्दे की असल बात वह कीमत है जिस पर राफेल विमान खरीदे गए हैं. कांग्रेस और एनडीए के बीच छिड़ी "मेरा सौदा बनाम तुम्हारा सौदा'' लड़ाई का पूरा जोर इसी बात पर है.

हालांकि साफ तौर पर यह एनडीए ही है जिसने असल में यह मुश्किल फैसला लिया और विमान खरीदे. कांग्रेस का कहना है कि उसने 12 दिसंबर, 2012 को 526 करोड़ रुपए में एक विमान खरीदने के लिए मोलभाव किया था, जबकि दासो एविएशन कंपनी की 2016 की रिपोर्ट के आकंड़ों के मुताबिक एनडीए प्रति विमान 1,671 करोड़ रुपए में उन्हें खरीद रहा था. इस तरह कांग्रेस का कहना है कि करीब 300 फीसदी ज्यादा दाम पर यह सौदा किया गया है.

वहीं एनडीए का कहना है कि उसने प्रति राफेल 670 करोड़ रुपए चुकाए हैं, हालांकि इस कीमत में "इससे जुड़े उपकरणों, हथियारों, भारत के लिए खास तौर पर की गई बढ़ोतरियों, रखरखाव सहायता और सेवाओं'' की कीमत शामिल नहीं है, जैसा कि रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे ने 18 नवंबर, 2016 को लोकसभा को बताया था. कांग्रेस का आरोप है कि उसकी ओर से लगाई गई कीमत में (उस सौदे के लिए जो हुआ ही नहीं) भारत के लिए खास तौर पर की गई बढ़ोतरियां, रखरखाव सहायता और सेवाएं शामिल थीं.

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 सरकार पूरी तरह तैयार विमानों की कीमत का खुलासा करने को तैयार नहीं है और इसके लिए सुरक्षा सरोकारों का हवाला दे रही है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 23 सितंबर को न्यूज एजेंसी एएनआइ को दिए एक इंटरव्यू में फिर इस बात पर जोर दिया.

 उन्होंने कहा, "अगर आप 2007 के हथियारों से लैस विमान को लें, उसमें दोबारा वही दो चीजें जोड़ें और उसे 2016 के स्तर पर लाएं, तो यह 20 फीसदी सस्ता होगा.'' जेटली ने बताया कि सीएजी इस मुद्दे की पड़ताल कर रहे हैं और उन्होंने अपनी समझ से कहीं ज्यादा भविष्यसूचक ढंग से कहा, "सचाई सामने आ जाएंगी.''

क्या सौदे में मानक प्रक्रियाओं को ताक पर रख दिया गया?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अप्रैल, 2015 को पेरिस में जब इसकी घोषणा की तब राफेल की खरीद एक अप्रत्याशित घटना के तौर पर सामने आई. बहुत कम लोग जानते थे कि ऐसा होने वाला है और दासो कंपनी के शीर्ष अधिकारी दावा करते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री की सरकार से सरकार के बीच (जी2जी) सौदे की पेशकश से राष्ट्रपति ओलांद तक हैरान रह गए थे.

दासो के अफसर कहते हैं, "फ्रांस ने कभी जी2जी सौदे नहीं किए और अमेरिका की तरह यहां फॉरेन मिलिटरी सेल्स रूट तक नहीं था.'' फ्रांस को अपनी सेना के लिए हथियार खरीदने वाले डायरेक्टोरेट डायरेक्टर जनरल ऑफ आर्मामेंट्स (डीजीए) के एक एयर मार्शल की अगुआई में इस काम के लिए एक टीम स्थापित करने में तीन महीने लगे.

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इस बीच भारत में कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पर विमान की खरीद का ऐलान करने से पहले मंत्रिमंडल की रक्षा समिति (सीसीएस) की अनिवार्य पूर्व मंजूरी को दरकिनार करके रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) के उल्लंघन का आरोप लगाया. प्राइस नेगोशिएटिंग कमेटी और सीएनसी की अनिवार्यता से भी पल्ला झाड़ लिया गया.

सरकार इस दलील पर टिके रहकर अपना बचाव कर रही है कि पेरिस में 10 अप्रैल को दिया गया संयुक्त बयान महज रुचि की अभिव्यक्ति था और करार पर औपचारिक दस्तखत करना नहीं था. रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की मंजूरी संयुक्त बयान के एक महीने से भी ज्यादा वक्त बाद 13 मई, 2015 को ली गई. इस मामले में सरकार संदिग्ध है.

यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि सरकार 36 विमानों की खरीद के फैसले पर कैसे पहुंची और इस आंकड़े पर पहुंचने से पहले वायु सेना से सलाह ली गई थी या नहीं.

रक्षा का पहले कोई अनुभव नहीं रखने वाली कंपनी रिलायंस इस सौदे में कैसे आ गई?

उद्योगपति अनिल अंबानी की मौजूदगी की वजह से विपक्ष इस सौदे में सरकार पर नेता-व्यापारी गठजोड़ और भाई-भतीजावाद के आरोप लगा रहा है. कांग्रेस की दलील है कि रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (एडीएजी) के चेयरमैन रक्षा कारोबार में नए आए हैं और उन्हें "विमान बनाने का पहले कोई तजुर्बा नहीं'' है और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित उद्यम हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को दरकिनार करके उन्हें यह ठेका दिया गया है.

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कांग्रेस के लिए अनिल अंबानी की छवि राहुल गांधी के "सूट बूट की सरकार'' के तंज से बखूबी मेल खाती है. उन्होंने 2015 में कहा था कि मोदी सरकार अमीर कारोबारियों पर मेहरबान है.

राफेल के मामले में, सौदे के साथ जुड़े ऑफसेट के जरिए. कांग्रेस ने 24 सितंबर को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के.वी. चौधरी को एक ज्ञापन दिया, जिसमें इस आरोप को साफ तौर पर सामने रखा गया हैः किसी टेंडर के बगैर और "रक्षा खरीद प्रक्रिया की (किसी भी) अनिवार्य शर्त'' का पालन किए बगैर "30,000 करोड़ रुपए का ऑफसेट ठेका'' और साथ ही 1,00,000 करोड़ रुपए का "लाइफ साइकल कॉन्ट्रैक्ट'' देकर "एचएएल की कीमत पर एक निजी कंपनी रिलायंस डिफेंस को जान-बूझकर अमीर बनाया'' गया.

अनिल अंबानी की कंपनी पेरिस में प्रधानमंत्री के ऐलान से महज 12 दिन पहले रजिस्टर की गई थी, यह बात ओलांद के 21 सितंबर के बयान की आग में घी का काम करती है. उन्होंने ऑफसेट पार्टनर के तौर पर रिलायंस समूह के चयन के बारे में मीडियापार्ट से कहा, "इस मामले में हमारी बात का कोई वजन नहीं था. यह भारत सरकार ही थी जिसने इस समूह की पेशकश की और दासो ने अंबानी से बातचीत की.

हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, हमने उसी इंटरलॉक्यूटर को ले लिया जो हमें दिया गया.'' उसी दिन बाद में न्यूज एजेंसी एएफपी को दिए एक इंटरव्यू में पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति अपनी बात से थोड़ा पीछे हटते नजर आए, मगर एएफपी की रिपोर्ट के फ्रेंच अखबार ली मोंद में छपे एक और ब्यौरे में वे अपनी बात दोहरते दिखाई दिए. उन्होंने कहा, रिलायंस समूह राफेल की खरीद के उस "नए फॉर्मूले'' के हिस्से के तौर पर आया, जो "कमान संभालने के बाद मोदी सरकार ने तय किया था.''

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वहीं रिलायंस डिफेंस के एक अफसर कहते हैं कि मार्च 2015 में कंपनी के बनाए जाने और प्रधानमंत्री की यात्रा के बीच कोई संबंध नहीं है. उन्होंने कहा, "विमान के करार पर दस्तखत सितंबर 2016 में किए गए, तब रक्षा कारोबार में दाखिल होने के रिलायंस के फैसले को 21 महीने और रिलायंस डिफेंस को कंपनी बने 18 महीने हो चुके थे.''

इस सौदे के तकरीबन 30,000 करोड़ रुपए के ऑफसेट, 2005 में इस नीति की शुरुआत के बाद सबसे बड़ी ऑफसेट व्यवस्था है.

इसके तहत रक्षा ओईएम (ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर) को 2,000 करोड़ रुपए से ऊपर के तमाम ठेकों की कीमत का 30 से 50 फीसदी के बीच ग्राहक के घरेलू उद्योग से लेना होता है.

राफेल सौदे के तहत फ्रांसीसी विमान निर्माता दासो और उसके पार्टनर—इंजन निर्माता सफरान और रडार निर्माता थेल्स—को हिंदुस्तान के स्थानीय उद्योगों से 30,000 करोड़ रुपए मूल्य की खरीद करनी है.

ऑफसेट का मुख्य मकसद पूंजी अधिग्रहण का लाभ उठाकर भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास को विकसित करना और एयरोस्पेस तथा आंतरिक सुरक्षा क्षेत्रों को प्रोत्साहित करना है.

अपनी ओर से दासो ने सफाई दी कि रिलायंस को पार्टनर के तौर पर उन्होंने ही चुना था और ऐसा रक्षा मंत्रालय की ऑफसेट नीति के मुताबिक किया गया था, जो ओईएम को अपने भारतीय रक्षा पार्टनर को चुनने की इजाजत देती है.

दिलचस्प बात यह है कि मुकेश अंबानी की रिलायंस एयरोस्पेस टेक्नोलॉजीज लि. (आरएटीएल) 2012 में यूपीए के तहत 126 विमानों के सौदे में दासो की मुख्य ऑफसेट पार्टनर थी.

आरएटीएल सितंबर 2008 में कंपनी के तौर पर अस्तित्व में आई थी, जब वायु सेना ने विमान का चयन तक नहीं किया था. दासो एविएशन और आरएटीएल के बीच एमओयू का ऐलान जनवरी 2012 में किया गया था—राफेल के 126 विमानों की बोली जीतने के कुछ ही दिन बाद.

करार के मुताबिक, 18 विमान उड़ाए जाने की हालत में आने थे, जबकि बाकी 108 एक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर समझौते के तहत एचएएल को भारत में बनाने थे. इसके बाद एमएमआरसीए (मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए बातचीत तीन साल तक ठप पड़ गई.

इस बीच अंबानी भाइयों के बीच सुलह के बाद मुकेश अंबानी रक्षा कारोबार से बाहर निकल गए. (आरआइएल ने ई-मेल की गई उस प्रश्नावली का कोई उत्तर नहीं दिया, जिसमें उनसे रक्षा कारोबार में उनके कदम रखने के बारे में टिप्पणी मांगी गई थी.)

अनिल अंबानी ने मार्च 2015 में गुजरात की कर्जों से लदी कंपनी पीपावाव शिपयार्ड को खरीदने के साथ रक्षा कारोबार में अपने आने का ऐलान किया. उसी साल अप्रैल तक वे थल सेना के लिए जरूरी उपकरण और हथियार तथा युद्धपोत और विमान बनाने के लिए 14 अलग-अलग कंपनियां रजिस्टर करवा चुके थे.

पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने भी निजी बातचीत में अनिल अंबानी के बहुत तेज रफ्तार से अपना कारोबार फैलाने पर हैरानी जताई थी. पर्रीकर खुद कभी उद्यमी रह चुके थे और रक्षा मंत्रालय को कलपुर्जों की सप्लाई करते थे.

भारतीय सेना दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार आयात करती है, एक दशक के दौरान जिसके 15 लाख करोड़ रुपए के रक्षा हार्डवेयर खरीदने का अनुमान लगाया जाता है.

लिहाजा यह अंतहीन संभावनाओं की पेशकश करती है. अलबत्ता पावरपॉइंट प्रजेंटेशन में जो बात नहीं बताई जाती, वह है खरीद के एकाधिकार की अफसरशाही भूलभुलैया, जिसमें सरकार एकमात्र खरीदार है और इसके साथ उसे अपने विशालकाय रक्षा सरकारी उपक्रमों (पीएसयू) और ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों के एकाधिकार की हिफाजत भी करनी होती है.

वक्त और लागतों का बढ़ते जाना तो रोजमर्रा की बात है, वहीं लोकप्रिय धारणा के उलट करार गहरी प्रक्रियाओं से गुजरते हैं. उनकी इतनी कड़ी जांच-पड़ताल की जाती है कि उनमें से कई को आखिरी मौकों पर रद्द कर दिया जाता है और दोबारा से निविदा मंगाई जाती है, यहां तक कि यह सब राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर होता है. एक सीईओ के मुताबिक, यह ऐसा कारोबार है जिसमें "जबरदस्त दम-खम, बहुत बड़ी पूंजी और बहुत ज्यादा धैर्य'' की जरूरत होती है.

अनिल अंबानी के रक्षा कारोबार में आने पर त्यौरियां इसलिए भी चढ़ीं क्योंकि 2015 तक उनके समूह की कंपनियां 2010 के बाद प्रतिस्पर्धा और हजम न होने वाले विस्तार की वजह से घाटा दे रही थीं (देखें सिकुड़ता सितारा).

अंबानी ने रक्षा क्षेत्र को शायद नई जान देने वाले क्षेत्र के तौर पर देखा, खासकर तब जब प्रधानमंत्री मोदी ने 25 सितंबर, 2014 को "मेक इन इंडिया'' का ऐलान किया जिसका मकसद हिंदुस्तान को हथियारों सहित वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र बनाना था.

रिलायंस डिफेंस के एक अधिकारी कहते हैं कि कंपनी ने संयुक्त उद्यमों के लिए रूस और इज्राएल का चयन किया. उन्होंने रूसी हेलिकॉप्टर और युद्धपोत भारत में बनाने के लिए सहमति पत्रों पर दस्तखत किए.

वे कहते हैं, "यूरोप कभी हमारा फोकस नहीं था.'' उनके मुताबिक, यह उनके फोकस में तब आ गया जब प्रधानमंत्री मोदी अप्रैल 2015 में पेरिस गए और अनिल इंडो-फ्रेंच सीईओ फोरम के 24 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे.

माना जाता है कि दासो के साथ पहले ही उनकी बातचीत चल रही थी. अगस्त 2015 में रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर लिमिटेड को मिहान (नागपुर स्थित मल्टी मोडल इंटरनेशनल हब) एसईजेड में 289 एकड़ जमीन आवंटित कर दी गई, जहां धीरूभाई अंबानी एयरोस्पेस पार्क (डीएएपी) के नाम से समूह रक्षा और एयरोस्पेस परियोजना का काम हाथ में लेने के लिए राजी हो गया.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस ने जमीन के आवंटन का पत्र मिहान एसईजेड में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में अनिल को सौंपा.

वहीं समूह ने एक ग्रीनफील्ड एयरोस्पेस परियोजना लगाने के लिए 6,500 करोड़ रुपए के निवेश का ऐलान किया. उस आयोजन में अनिल अंबानी ने कहा था, "मिहान की यह परियोजना न केवल हिंदुस्तान में बल्कि पूरे दक्षिणपूर्व एशिया में सबसे बड़ी ग्रीनफील्ड परियोजना होगी.''

अनिल अंबानी की कंपनी ने 63 करोड़ रुपए में 104 एकड़ का पहला जमीन पार्सल हासिल करने का मंसूबा बनाया. उसने 25 करोड़ रुपए तो तभी दे दिए थे जब परियोजना आवंटित की गई थी, पर 2016 के मध्य में वे 17 करोड़ रुपए की अगली किस्त चुकाने से चूक गए थे.

परियोजना शुरू ही नहीं हो सकी क्योंकि महाराष्ट्र एयरपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी पर उनकी वित्तीय देनदारियां बढ़ते-बढ़ते 2017 के वित्तीय साल के आखिर तक 38 करोड़ रुपए पहुंच गईं.

दासो एविएशन के साथ यह सौदा अनिल अंबानी की कंपनी को नई जिंदगी देने वाले साधन के तौर पर आया जो जमीन की देनदारियों को चुकाने के लिए हाथ-पैर मार रही थी.

दासो रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (डीआरएएल) कंपनी 2017 की शुरुआत में बनाई गई और 14 फरवरी, 2017 को बेंगलूरू के एयरो इंडिया में इसका ऐलान किया गया, जहां अनिल अंबानी ने राफेल विमान में सैर करने से पहले प्रेस के लिए तस्वीरें खिंचवाईं.

दासो एविएशन फ्रांस के चेयरमैन इरिक ट्रैपियर को डीआरएएल का चेयरमैन और अनिल अंबानी को को-चेयरमैन बनाया गया. इस कंपनी में आएएल की 51 फीसदी और दासो की 49 फीसदी हिस्सेदारी है.

अक्तूबर 2017 में अनिल अंबानी और ट्रैपियर ने फाल्कन बिजनेस जेट के लिए कलपुर्जे बनाने के संयंत्र की आधारशिला रखी. दासो के एक बड़े अफसर बताते हैं कि उन्होंने संयुक्त उपक्रम के लिए अनिल अंबानी को ही क्यों चुना, बावजूद इसके कि उनकी कंपनी वित्तीय दुश्वारियों से घिरी थी. वे कहते हैं, "वह अकेला कारोबारी घराना था जिसके पास जमीन उपलब्ध थी और एक एसईजेड भी जो हवाई अड्डे के पास था जहां से भविष्य में परीक्षण के लिए विमान बनाए और उड़ाए जा सकते थे.''

अनिल अंबानी 21 फरवरी, 2017 को पेरिस के एलिसी पैलेस होटल में ओलांद से मिले. राष्ट्रपति के दफ्तर से जारी बैठक की आधिकारिक तस्वीरों में ओलांद दोनों हाथों से गर्मजोशी के साथ अनिल अंबानी से हाथ मिलाते हुए दिखाई दिए.

रिलायंस के एक अफसर इसे छोटी-सी मुलाकात बताते हैं, ऐसी मुलाकात जिसमें ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों में रिलायंस की उन तमाम योजनाओं के बारे में बात की गई जिन्हें उसने फ्रांसीसी कंपनियों के साथ अंजाम दिया है. वे कहते हैं, "इस बैठक में रिलायंस एंटरटेनमेंट समेत कोई भी दूसरी बातचीत नहीं हुई.''

2018 आते-आते कर्जदाता उनके कर्जों से लदे शिपयार्ड के दरवाजे खटखटा रहे थे और सरकार रूसी हेलिकॉप्टर बनाने के लिए संयुक्त उपक्रम के तौर पर एचएएल को और युद्धपोत बनाने के लिए सरकार की मिल्कियत वाली गोवा शिपयार्ड लिमिटेड को चुन रही थी. ऐसे में डीआरएएल अनिल अंबानी की कंपनियों के ताश के पत्तों में आखिरी इक्कों में से एक रह गई थी.

यह भविष्य में और ज्यादा राफेल के ऑर्डर के लिए अब भी आकर्षक बाजी थी, भारतीय नौसेना के वास्ते 57 लड़ाकू विमानों के एक और करार के लिए भी, जिसमें राफेल एक दावेदार है या यहां तक कि फाल्कन बिजनेस जेट को असेंबल करने के लिए भी.

 

ऑफसेट भागीदारी से रिलायंस कितना पैसा बना सकती है?

इसी साल मार्च में राष्ट्रपित मैक्रों की आधिकारिक यात्रा के दौरान फ्रांसीसी सरकार ने भारत सरकार को एक छह पन्नों का दस्तावेज सौंपा जिसमें राफेल सौदे के लिए 72 ऑफसेट पार्टनरों की फेहरिस्त थी और इसके जरिए उसने सरकार के महत्वाकांक्षी मेक इन इंडिया कार्यक्रम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की. उस फेहरिस्त में रिलांयस भी शामिल थी.

दासो अपने पार्टनर सफरान और थेल्स के साथ करारों पर अब भी बातचीत में मुब्तिला है. दासो, सफरान और थेल्स के बीच 30,000 करोड़ रुपए के ऑफसेट का बंटवारा होगा, जिसमें दासो को 40 फीसदी मिलेगा और सफरान तथा थेल्स के हाथ 30-30 फीसदी लगेगा (देखें 30,000 करोड़ रु. के ऑफसेट किस-किस के हिस्से जाएंगे). डीआरएएल संयुक्त उपक्रम को दासो के हिस्से में आए ऑफसेट का 15 से 17 फीसदी के बीच या मोटे तौर पर 1,260 से 1,428 करोड़ रुपए के बीच मिलेगा.

कंपनी ने इस साल अप्रैल में एयरोस्पेस से जुड़े अपने पहले कलपुर्जे—फाल्कन 2000 बिजनेस जेट के लिए नोज कोन्स—असेंबल करना शुरू कर दिया है. एक फ्रेंच टीम आकर उनकी गुणवत्ता की जांच और तस्दीक करेगी और तब उन्हें निर्यात किया जा सकेगा.

जब ये कलपुर्जे निर्यात कर दिए जाएंगे, तब दासो निर्यात के कागजों के साथ रक्षा मंत्रालय की डिफेंस ऑफसेट मैन्यूफैक्चरिंग विंग (डीओएमडब्ल्यू) में जाएगी जहां ऑफसेट क्रेडिट की गहराई से जांच-पड़ताल की जाएगी.

फैक्टरी के टर्नओवर को फिर दासो की ऑफसेट क्रेडिट में समायोजित किया जाएगा. यह प्रक्रिया सितंबर 2019 में शुरू होगी, तब करार पर दस्तखत हुए तीन साल हो चुके होंगे.

जहां तक मुनाफे की बात है, तो दासो का आकलन यह है कि डीआरएएल को न घाटा, न मुनाफा की स्थिति तक आने में कम से कम एक दशक का वक्त लगेगा. "एयरोस्पेस कारोबार धीमी गति से मथने वाली चक्की के समान है. रिलायंस को मुनाफे में 51 फीसदी हिस्सेदारी मिलेगी, पर तभी अगर कंपनी मुनाफा कमाती है.''

राफेल ऑफसेट का सबसे बड़ा लाभार्थी कौन है?

इस राफेल ऑफसेट से सबसे अधिक लाभ रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को हो सकता है. दासो के अधिकारियों का कहना है कि राफेल ऑफसेट का लगभग 30 प्रतिशत डीआरडीओ के लिए अलग रखा गया है.

यह बढ़कर 50 प्रतिशत तक भी जा सकता है. दो वर्षों से रक्षा मंत्रालय के अधिकारी और वैज्ञानिक इस बात के लिए चिंतित थे कि राफेल सौदे का जो अप्रत्याशित ऑफसेट होगा, उसे लेकर क्या किया जाए.

राफेल के एम-88 इंजन के ऑफसेट में, डीआरडीओ को भारत के अपने शिथिल पड़े कावेरी इंजन कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने का अवसर दिखा. एक विश्वसनीय उच्च प्रदर्शन वाले लड़ाकू जहाज का जेट इंजन तैयार करना एक जटिल प्रौद्योगिकी का हिस्सा है और दुनियाभर में ऐसे इंजन के गिने-चुने निर्माता हैं.

यहां तक कि चीन कई दशकों से इसके लिए प्रयासरत है, फिर भी वह अब तक इसमें महारत हासिल नहीं कर पाया है. इस साल की शुरुआत में, डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं जीटीआरई (गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट) और एयरक्राफ्ट डिजाइनर एडीए (एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी) ने सफरान और भारतीय वायु सेना के साथ अंतिम दौर की वार्ता शुरू की कि कैसे दासो और सफरान कावेरी इंजन को मजबूती प्रदान कर सकते हैं.

अगर वे वास्तव में कावेरी इंजन को अपग्रेड करके 90 केएन से अधिक के धमाके में सक्षम बना पाते हैं तो फिर हम स्वदेशी एलसीए मार्क-2 जहाजों और एडवांस्ड मिडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) जैसे भविष्य के उन्नत लड़ाकू जहाजों के लिए इंजन तैयार करने में सक्षम हो जाएंगे. डीआरडीओ के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, "हम चाहते हैं कि हमारे फ्रांसीसी साझेदार न केवल हमें तकनीकी जानकारियां प्रदान करें बल्कि यह भी बताएं कि हमारे डिजाइन में कहां समस्या रह जाती है और वे इसे सर्टिफाई (प्रमाणन) भी करें.''

क्या राफेल के साथ 36 जहाजों के सौदे में एचएएल को दरकिनार किया गया?

यह भी एक तथ्य है कि एचएएल इन 36 राफेल जहाजों को बनाने या असेंबल करने के काम में शामिल नहीं हो पाई. ये सारे जहाज पूरी तरह दासो की ओर से तैयार होंगे और उड़ान भरने की हालत में फ्रांस से सीधे भारत पहुंचेंगे.

विमानों की डिलिवरी 2019 के आखिर में शुरू होगी और 2022 तक सारे विमान मिल जाएंगे. रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि भारत में केवल 36 राफेल बनाना "महंगा सौदा'' साबित होता. उन्होंने इस बात की ओर इशारा भी किया कि 108 राफेल जहाजों के निर्माण के लिए एचएएल और दासो के बीच 2012 से 2015 तक बातचीत चलती रही लेकिन बात आगे बढ़ने के बजाए उलझकर रह गई.

असहमति, मुख्य रूप से काम और जिम्मेदारियों को साझा करने के साथ-साथ जहाज के कल-पुर्जों को तैयार करने में लगने वाले काम के घंटों को लेकर थी. इस तरह 1.63 लाख करोड़ रुपए का सौदा आखिरकार 2015 में खटाई में पड़ गया और भारत में जहाज निर्माण के क्षेत्र में एकाधिकार का आनंद लेने वाले इस सार्वजिनक उपक्रम ने व्यापार का बहुत बड़ा अवसर गंवा दिया. वे ऑफफसेट के नहीं, मैन्युफैक्चरिंग के एक मजबूत दावेदार थे.

फिर भी, यह कहना गलत होगा कि 36 राफेल जहाजों के सौदे के दरमियान एचएएल को पूरी तरह से बाहर रखा गया. राफेल के एम88 जेट इंजन के निर्माण के लिए एचएएल और फ्रांसीसी निर्माता सफरान के बीच एक संयुक्त उद्यम स्नेकमा एचएएल एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड (एसएचएई) बनाने के लिए बेंगलूरू में, फरवरी 2015 में हस्ताक्षर किए गए थे.

50:50 की साझेदारी वाले इस संयुक्त उद्यम को, एम88 इंजन के पाट्र्स और पुर्जों के उत्पादन के साथ-साथ उनको लगाने की जिम्मेदारी भी मिली है. इसलिए यह संयुक्त उद्यम राफेल सौदे में सफरान को मिले काम में ऑफसेट का पात्र होगा.

रिलांयस इंटरटेनमेंट ने जूली गाये की फिल्म के लिए पैसे क्यों दिए?

24 जनवरी 2016 को ओलांद के गणतंत्र दिवस परेड के लिए मुख्य अतिथि के रूप में नई दिल्ली पहुंचने के दो दिन पहले रिलायंस एंटरटेनमेंट ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके बताया कि "रिलायंस एंटरटेनमेंट, सर्ज हजानविशुअश, कीव एडम्स, जूली गाये और एलिजा सूजन ने एक अनोखे भारत-फ्रांसीसी फिल्म प्रोडक्शन "नॉम्बर वन'' के लिए हाथ मिलाया'' है. गाये जो कि एक ऐक्टर-निर्माता भी हैं, ओलांद की पार्टनर भी थीं और मसाला खबरें परोसने वाले पेरिस के अखबारों के लिए राष्ट्रपति के साथ गायेका रिश्ता 2014 में चर्चा का सबसे गर्मागर्म विषय हुआ करता था.

तथ्य यह है कि फिल्म को एक उद्योगपति फंड कर रहा था जिसे संयोग से राफेल सौदे का भी लाभ मिलने वाला था, भले ही वह लाभ उस उद्योगपति की कंपनी को एक ऑफसेट पार्टनर के रूप में मिल रहा था.

मीडियापार्ट ने 21 सितंबर की अपनी रिपोर्ट में इसी बात को उछाला. फ्रांस में यह फिल्म दिसंबर 2017 में तू लॉ के रूप में रिलीज हुई थी. मीडियापार्ट ने फिल्म की प्रोडक्शन टीम के एक सदस्य के हवाले से बताया कि अगर रिलायंस एंटरटेनमेंट ने फिल्म को 30 लाख यूरो, जिसे बाद में घटाकर 16 लाख यूरो कर दिया गया, की सहायता न की होती तो यह बायोपिक फिल्म कभी बन ही नहीं पाती.

 इसमें 2002 में माउंट एवरेस्ट पर मरने वाले एक युवा स्नोबोर्डर की कहानी दिखाई गई थी. मीडियापार्ट की रिपोर्ट में उद्धृत किए व्यक्ति ने कहा, "एक दिन, भारतीय मदद को आए और तब जाकर फिल्म पूरी की जा सकी.'' इसी को आधार बनाकर ओलांद पर नेता-व्यापारी गठजोड़ का आरोप लगाया गया था जिसको लेकर उन्हें अपनी प्रतिक्रिया देनी पड़ी थी.

"इस विषय पर हम क्या कह सकते थे. भारत सरकार ने इसी समूह का नाम सुझाया था और उसके बाद दासो ने अंबानी के साथ बातचीत की. हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. हमने उसी इंटरलॉक्यूटर को मौका दिया जिसके लिए सुझाव आया था. और वैसा ही हुआ भी. इस समूह के लिए मुझ पर किसी भी तरह की मेहरबानी दिखाने की कोई जरूरत ही नहीं थी. मैं तो यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि इस बात का जूली गाये की किसी फिल्म के साथ कोई लेना-देना भी है.''

गाये के प्रोडक्शन हाउस रूज इंटरनेशनल ने इंडिया टुडे ग्रुप के साथ बातचीत में कहा कि उनकी अनिल अंबानी या रिलायंस के प्रतिनिधियों के साथ न कोई जान-पहचान है और न ही उनकी कोई बातचीत हुई है. इसी तरह, रिलायंस के प्रवक्ता ने गाये या रूज इंटरनेशनल के साथ किसी समझौते पर हस्ताक्षर की बात से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, "रिलायंस एंटरटेनमेंट ने नोम्बर वन से जुड़ी किसी भी फिल्म के लिए कभी कोई भुगतान नहीं किया है.''

20 दिसंबर, 2017 को फिल्म रिलीज होने से करीब दो हफ्ते पहले 5 दिसंबर, 2017 को रिलायंस एंटरटेनमेंट ने विस्वायर्स कैपिटल को 14.8 लाख यूरो का भुगतान किया था.

प्रवक्ता ने कहा कि इस भुगतान से छह महीने पहले ही मई 2017 में ओलांद अपनी कुर्सी छोड़ चुके थे. विस्वयार्स कैपिटल के साथ संयुक्त उद्यम में दो अन्य फ्रेंच फिल्में भी बनीं. उनके मुताबिक, राफेल ऑफसेट के लिए किसी तरह के लेन-देन जैसी कोई बात नहीं थी. प्रवक्ता ने कहा, "यह फिल्म निर्माण रिलायंस एंटरटेनमेंट के लिए अपने सामान्य कारोबार का हिस्सा था.''

क्या राफेल सबसे गर्म चुनावी मुद्दा बनेगा?

राजस्थान के सरगरा में 20 सितंबर को एक राजनैतिक रैली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, "गली गली में शोर है, देश का चौकीदार चोर है.'' राहुल प्रधानमंत्री मोदी पर टिप्पणी कर रहे थे जिन्होंने 2014 में सत्ता संभालने के बाद खुद को देश का "चौकीदार'' कहा था.

यह 1998 में बोफोर्स घोटाले के बाद राहुल के पिता राजीव गांधी को निशाना बनाकर विपक्ष द्वारा इस्तेमाल किए गए एक पुराने नारे का संशोधित संस्करण था. कांग्रेस को उम्मीद है कि इस विवाद के जरिए वह मोदी को घेर सकती है, हालांकि यहां बोफोर्स के विपरीत, न तो कोई पुख्ता सबूत हैं, न बिचैलिए और न ही कोई स्विस बैंक खाता.

2019 के लोकसभा चुनावों के लिए जो बिसात बिछाई जा रही है उसमें तो साफ लगता है कि फ्रांसीसी लड़ाकू विमान राफेल का सौदा, भाजपा को निशाना बनाने के लिए कांग्रेस पार्टी का मुख्य चुनावी हथियार होगा.

दीगर बात है कि इंडिया टुडे की ओर से देश के चुनावी रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा क्षेत्रों के 30,000 से अधिक मतदाताओं के बीच हुए हालिया सर्वेक्षण में शामिल सिर्फ 21 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि उन्होंने राफेल सौदे के बारे में सुना है.

लेकिन 2019 चुनावों से पहले विभिन्न दलों के बीच आपसी राजनैतिक तू-तू, मैं-मैं जिस कदर बढ़ती जा रही है, कहा नहीं जा सकता कि यह विवाद क्या गुल खिला सकता है. खासतौर से जब किसी मुद्दे पर बेलगाम वाक्युद्ध सार्वजनिक रूप से मीडिया और सोशल मीडिया में छिड़ चुका हो, तो जनता उसे कैसे लेती है, यह तो वक्त बताएगा.

भाजपा के मीडिया तंत्र को लगता है कि राहुल ने मोदी को चोर कहकर एक बड़ी रणनीतिक चूक कर दी है क्योंकि उनके मुताबिक, मोदी के साथ यह आरोप चस्पां नहीं हो पाएगा और जब प्रधानमंत्री खुद चुनावी समर में उतरेंगे तब राहुल का यह आरोप उनके लिए एक अच्छा हथियार बन जाएगा. इस बीच, अनिल अंबानी को साफ कर दिया गया है कि वे अपना बचाव खुद करें.

 2006 में, जब उन पर उत्तर प्रदेश में लाभ का एक पद रखने के आरोप लगे थे, उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था ताकि भविष्य में "किसी भी तरह के विवाद चाहे वह कितना मामूली या अविश्वसनीय क्यों न हो्य्य की आंच से बचे रहें.

एक बार फिर अनिल अंबानी खुद को ऐसे आरोप के घेरे में उलझे हुए हैं जहां से सुरक्षित बाहर निकलने के लिए कोई राह उन्हें अब तक नहीं मिल सकी है.

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