
नोटबंदी की प्रक्रिया से आम आदमी में एक मजबूत धारणा है कि पूरी प्रक्रिया में केन्द्र सरकार का खजाना बाहर आ रहे कालेधन से भर जाएगा, बैंक मालामाल हो जाएंगे और अंत में फायदा आम आदमी को होगा. मकान, गाड़ी और अन्य निजी जरूरतों के लिए कर्ज लेना आसान होगा. बैंकों के पास पहुंचा अतिरिक्त पैसे से ब्याज दरों घटने का रास्ता साफ हो जाता.
सरकार के खजाने में आया पैसा गरीबों के लिए योजनाओं में खर्च किया जाएगा और अमीर और गरीब में अंतर को पाट दिया जाएगा. यह उम्मीद अब नहीं की जा सकती. केन्द्रीय रिजर्व बैंक ने देश के बैंकों के पास एकत्रित हो रहे 500 रुपये और 1000 रुपये (18 नवंबर तक 6 लाख करोड़ रुपये) की अमान्य करेंसी को इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रेशियो घोषित कर दिया है . मतलब यह कि बैंकों के पास मौजूद यह पैसा वापस बाजार में नहीं आ सकता. इस पैसे पर उसे रिजर्व बैंक से किसी तरह का कोई ब्याज नहीं मिलेगा. यह पैसा एक रद्दी कागज के टुकड़े तक तबतक बैंकों के पास पड़ा रहेगा जबतक केन्द्र सरकार इस पैसे के एवज में बैंकों को नई करेंसी नहीं मुहैया करा देती है.
वहीं, केन्द्र सरकार ने अब 500 रुपये और 1000 रुपये की अमान्य करेंसी को बदलने पर प्रतिबंध भी लगा दिया है. इन नोटों को अब 30 दिसंबर तक सिर्फ बैंक खातों में जमा किया जा सकता है. केन्द्र सरकार का अनुमान है कि जमा करने की अंतिम तारीख तक बैंकों के पास लगभग 10 लाख करोड़ रुपये की अमान्य करेंसी एकत्रित हो जाएगी.
बैंकों की उम्मीद पर फिरा पानी
आर्थिक मामलों के जानकार और इंडिया टुडे संपादक अंशुमान तिवारी का मानना है कि रिजर्व बैंक के सीआरआर बढ़ाने के फैसला ने बैंकों को मुसीबत में डाल दिया है. उनके मुताबिक जहां नोटबंदी की प्रक्रिया के बाद बैंकों को उम्मीद थी कि जमा हुए अतिरिक्त धन की मदद से वह ब्याज दरों में कटौती कर लेंगे और इस अतिरिक्त धन को नए कर्ज के रूप में बाजार में वापस डाल देंगे. अब यह संभव नहीं है.
बैंकों पर असर
1. बैंकों में जमा हुआ अधिकांश पैसा आम आदमी की जेब से निकला वह कैश है जो खपत (खर्च) के लिए रखा हुआ था. यह पैसा ऐसे समय में बैंक पहुंचकर खराब हो चुका है जब अर्थव्यवस्था को मांग बढ़ने का बेसब्री से इंतजार था.
2. कालाधन रखने वाले लोगों ने नियमों का फायदा उठाते हुए जनधन खातों और गरीब जनता के खातों में पैसा जमा कराकर अपने धन को संभवत: सुरक्षित करने में सफलता पा ली है. यही वजह है कि महज 16 दिनों में जनधन खातों में 21 हजार करोड़ रुपये जमा हो चुके हैं.
3. नोटबंदी प्रक्रिया शुरू होते ही बैंकों ने धडल्ले से प्रतिबंधित करेंसी को बदलने का काम किया. इससे उसके पास पुरानी नोटों का अंबार लग गया. अब रिजर्व बैंक से नई करेंसी बदलने के काम के लिए नहीं दी जा रही है और पुरानी करेंसी उसे फिलहाल अपने पास ही रखने का फरमान दे दिया गया है.
4. बैंक को जहां उम्मीद थी कि वह नए कर्ज देकर अपने कारोबार को कई गुना बढ़ा लेगा वहीं अब उसके पास पूराने खातों को चलाने की समस्या पैदा हो चुकी है. जबतक रिजर्व बैंक इस प्रतिबंधित करेंसी से उसे मुक्त नहीं करता वह अपने मौजूदा ग्राहकों और नए ग्राहकों को लिए कोई नई स्कीम नहीं ला सकता. जिस नोटबंदी को वह अपनी बिमारी का इलाज समझ रहा था आज वही उसके लिए सबसे बड़ी बिमारी बन चुकी है.
5. 7 दिसंबर को रिजर्व बैंक नई मौद्रिक नीति लेकर आ रही है. इस नीति में यदि वह रेपो रेट में कटौती भी कर दे तो बैंकों के लिए ब्याज दरों में कटौती को आगे बढ़ाना नामुमकिन है. उसके पास रखी यह प्रतिबंधित करेंसी अब सबसे बड़ा एनपीए बन चुका है.
आम आदमी पर असर
रिजर्व बैंक के इस फैसले का सबसे बड़ा असर आम आदमी पर पड़ना तय है. सबसे पहले रिजर्व बैंक के कालेधन पर आने वाले नए आंकड़े उसकी इस धारणा को खत्म करने देगा कि देश में कालेधन के खिलाफ नोटबंदी की प्रक्रिया में उसका कोई फायदा होने वाला है. इसके साथ ही उसकी कई और उम्मीदों पर पानी फिरना तय हैं -
1. कालेधन पर लगाम लगाने के लिए उठाए गए कदम से आम आदमी को उम्मीद थी कि बैंक अपने ब्याज दरों बड़ी कटौती का ऐलान करेगा. इससे उसे घर, गाड़ी, कारोबार जैसे अन्य प्रायोजनों के लिए कर्ज सस्ते दरों पर मिल जाएगा.
2. आम आदमी को उम्मीद थी कि बैंक की बढ़ी आमदनी के चलते उसे फिक्स्ड डिपॉजिट और अन्य बचत स्कीम पर अच्छा इंटरेस्ट मिलेगा. लेकिन मौजूदा फैसले ने बैंकों को फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे पॉपुलर स्कीमों को बंद करने का रास्ता साफ कर दिया है. बिना किसी कमाई के बैंक ऐसे ऑफर नहीं देने जा रही है.
3. देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने मौजूदा स्थिति को देखते हुए बचत बैंक खाते पर इंटरेस्ट रेट घटाकर 4 फीसदी से कम कर दिया है. रिजर्व बैंक के इस फैसले से अब आम आदमी के लिए बैंकों में पैसा जमा करना इतना लुभावना नहीं रह जाएगा.