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अकसर वे दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के ढाबों पर कविता सुनाते नजर आ जाते थे. अगर वे जेएनयू में नजर न आते तो समझ लीजिए कि छात्रों के साथ किसी विरोध मार्च में शिरकत कर रहे होंगे, जहां अपनी ओज भरी कविताओं से वे उत्साह बढ़ाते थे. बागी कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की दिनचर्या यही थी.
पिछले दिनों छात्रों के आंदोलन ऑक्यूपाई यूजीसी में भी वे शरीक हो रहे थे, वहीं पर मंगलवार को 58 वर्षीय विद्रोही का निधन हो गया. इस आंदोलन के तहत जंतर-मंतर तक आयोजित एक विरोध मार्च से वापस लौटकर वे सोए और सोए ही रह गए.
करीब तीन दशकों से विद्रोही अघोषित तौर पर जेएनयू के स्थायी नागरिक बने हुए थे. उनकी झुर्रियां जनपक्षधरता, संघर्ष और जिजीविषा का लंबा इतिहास समेटे हुए थी. यूपी के सुल्तानपुर जिले के अइरी फिरोजपुर गांव में 3 दिसंबर, 1957 को जन्मे विद्रोही शुरू से इसी तेवर के थे. सुल्तानपुर में छात्र-जीवन के दौरान भी वे आंदोलनों में सशक्त मौजूदगी दर्ज कराते थे.
ग्रेजुएशन के बाद विद्रोही ने सुल्तानपुर के कमला नेहरू इंस्टीट्यूट में एलएलबी में दाखिला लिया, लेकिन पढ़ाई पूरी न कर सके. वे 1980 में जेएनयू में एमए करने आए. 1983 में छात्र-आंदोलन के बाद उन्हें जेएनयू से निकाल बाहर कर दिया गया था. लेकिन विद्रोही जैसे शख्स से जेएनयू कहां छूटता भला! वे यहीं आकर जम गए और उसी फक्कड़ अंदाज में जी रहे थे.
उनको आम छात्रों ने अपनी आवाज के तौर पर पहचाना था और वे छात्रों की जिंदगी का हिस्सा बन गए थे. इस बारे में विद्रोही ने कहा था, ‘जेएनयू में आंदोलनों की समृद्ध परंपरा है. और मैं एक्टिविस्ट कवि हूं. ऐसे में और क्या चाहिए?’ अपनी पत्नी शांति देवी और बच्चों से अलग जेएनयू को ही अपना घर बना बैठे थे, विद्रोही ने बताया था, ‘मैं अपना तेवर बरकरार रख पाया क्योंकि शांति ने पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुझे मुक्त रखा.’
वे आंदोलनों के बीच रह कर कविता रचते थे, इसलिए उनकी कविताएं सीधे जनता से जुड़ी हैं. विद्रोह ही उनका आधार था. असल में उनका स्वभाव कबीर और नागार्जुन जैसा फक्कड़ था, सो कविताएं सीधा वार करती हैं. किसान, मजदूर, स्त्रियां सब उनके केंद्र में हैं. उनकी एक कविता देखिए- 'इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया? मैं नहीं जानतालेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी, मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगीजिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा? मैं नहीं जानता लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी और यह मैं नहीं होने दूँगा.'
उनकी कविताओं का फलक बहुत व्यापक है-मोएंजोदड़ो, मेसोपोटामिया और स्पार्टा से होता हुआ क्लिंटन और बुश तक फैला हुआ. विद्रोही का सिर्फ एक कविता संग्रह नयी खेती प्रकाशित हुआ है क्योंकि वे मौखिक रूप से ही कविता सुनाते रहे और फक्कड़ जिंदगी जीते रहे. अपनी एक कविता 'मोहनजोदड़ो की आखिरी सीढ़ी से...' में विद्रोही कहते हैं- 'मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है तुम मुझे बचाओ मैं तुम्हारा कवि हूं.'
लेकिन शायद जनता के असल कवि को हम बचा नहीं पाए.