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जगन्नाथ मंदिर: सबके साथ पर मुश्किल में जगन्नाथ

पुरी के जगन्नाथ मंदिर में उस स्थल के ढहने का खतरा जहां से श्रद्धालु भगवान के दर्शन करते हैं, ऐसे में जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है मोक्ष प्राप्ति का यह चौथा धाम.

महेश शर्मा
  • भुवनेश्वर ,
  • 04 दिसंबर 2015,
  • अपडेटेड 10:42 AM IST

नवकलेवर में आए लाखों श्रद्धालुओं ने ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के मंदिर में दाखिल होते हुए शायद ही कभी सोचा हो कि मंदिर के जिस जगमोहन से खड़े होकर वे भगवान जगन्नाथ के दर्शन करते हैं, वहां की छत कभी भी ढह सकती है. नवकलेवर उत्सव के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को बदलकर उनकी जगह नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. यह जगमोहन मंदिर का वह स्थान है जहां खड़े होकर श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन करते हैं. वह तो लोहे के मोटे-मोटे 14 पाइप और ऊपर की तरफ चार पाइप तमाम क्लैंपों सहित छत की बीम को संभाले हुए हैं वरना यहां कभी भी कोई हादसा हो सकता है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की मानें तो मंदिर का जीर्णोद्धार बेहद जरूरी है.

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हिंदुओं में मान्यता है कि महाप्रभु जग के नाथ हैं. लेकिन मंदिर की सरकारी-गैर सरकारी संचालन समितियों तथा केंद्र और राज्य सरकार के बीच रस्साकशी के चलते मोक्ष प्राप्ति का यह चौथा धाम जीर्णोद्धार के लिए वर्षों से तरस रहा है. आलम यह है कि मंदिर की छत का प्लास्टर उखड़ रहा है और पत्थर अपनी जगह छोडऩे लगे हैं. आखिर 11वीं शताब्दी में हुए जीर्णोद्धार के बाद इस मंदिर के रखरखाव की घोर अनदेखी हुई है. ऐसे में रोजाना भारी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं का दर्शन के वक्त ध्यान बंट जाता है. वे जगमोहन की छत की बीम संभाले लोहे के मोटे पाइप देखते हैं, जो गर्भ गृह के द्वार को संकरा कर देती हैं, और सहम जाते हैं.

मंदिर के संचालन से जुड़े लोग दबी जबान से बताते हैं कि 2004 में पहली बार संज्ञान में आया कि छत का प्लास्टर तेजी से उखड़ रहा है. मौखिक शिकायत पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने निरीक्षण किया और इसके जीर्णोद्धार की योजना बनाई. लेकिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह कहीं और स्थापित करके जीर्णोद्धार तथा छोटी-मोटी मरम्मत का काम शुरू करने के एएसआइ के फैसले पर मंदिर के सेवायतों की स्थानीय समिति और राज्य सरकार की गठित समिति के बीच एक राय न बनने से यह काम टलता रहा.

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मंदिर व्यवस्था में दखल रखने वाले स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार जगन्नाथ बस्तिया कहते हैं, “बीते 11 वर्ष में 17 बैठकें की जा चुकी हैं पर स्थिति बनने की बजाए बिगड़ती ही जा रही है.” दरअसल, एएसआइ की रिपोर्ट पर एक राय नहीं बन पा रही. पीढिय़ों से जगन्नाथ मंदिर में पूजा से लेकर सारा काम करने वाले सेवायतों का कहना है कि विग्रहों को हटाकर जगमोहन का निर्माण करने से प्राचीन परंपरा खंडित हो जाएगी. मंदिर में 36 प्रकार की सेवा करने की वजह से ये सभी सेवायत 36 श्रेणियों में बंटे हैं. इस तरह नवकलेवर बीत गया पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम जगमोहन पर काम शुरू नहीं हो सका. इसकी गंभीरता 24 अगस्त, 2015 को मंदिर के मुख्य प्रशासक सुरेश महापात्र (आइएएस) की उस चिट्ठी से झलकती है जो उन्होंने एएसआइ के महानिदेशक राकेश तिवारी को लिखी थी.

महापात्र ने 19 जुलाई को भी भुवनेश्वर सर्कल के अधीक्षण पुरातत्वविद् और टेक्निकल कमेटी के चेयरमैन, अन्य सदस्यों तथा सेवायतों के साथ निरीक्षण करके एएसआइ महानिदेशक को तुरंत फोन से ही मंदिर की हालत की गंभीरता से अवगत करा दिया था. उन्होंने साफ कहा था कि जगह-जगह पत्थर उखड़ रहे हैं. खंभों और छत आदि में दरारें पड़ चुकी हैं. किसी तरह कामचलाऊ व्यवस्था के जरिए बीमों को थोड़ी मजबूती दी गई है. पर यह कब तक चल सकेगा? बीम को सपोर्ट देने वाले 14 पाइपों के चलते जगमोहन और गर्भ गृह के बीच के द्वार की चैड़ाई कम हो गई है और श्रद्धालुओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. जैसे-तैसे श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित किया जा रहा है. चिट्ठी में यह भी कहा गया कि मंदिर परिसर के कई स्थान जर्जर होते जा रहे हैं. मंदिर के उत्तर-पूर्व की ओर के खंभे भी पत्थर छोडऩे लगे हैं.

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सारी कार्रवाई कागजों तक ही
यह पूरा मामला जब राज्य सरकार के संज्ञान में आया तो ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के निर्देश पर 6 अक्तूबर, 2015 को कानून मंत्री डॉ. अरुण कुमार साहू ने भुवनेश्वर में मंदिर से संबंधित पक्षों की बैठक बुलाई. इसमें मंदिर के मुख्य प्रशासक सुरेश महापात्र, निर्माण सचिव नलिनी प्रधान, मुख्य अभियंता (भवन) एस.आर. सेठी, सुपरिंटेंडेंट एएसआइ ए.के. पटेल, टेक्निकल कमेटी के सदस्य प्रोफेसर जी.सी. मित्रा (जगन्नाथ मंदिर विकास कार्य), पी.के. होता (पूर्व निर्माण सचिव) और एन.के. रथ मौजूद थे. इसमें निर्माण संबंधी एएसआइ के खाके पर चर्चा की गई.

कानून मंत्री के मुताबिक, बैठक में तय हुआ कि एक उच्च स्तरीय टीम दिल्ली में एएसआई के महानिदेशक से जीर्णोद्धार की प्रोजेक्ट रिपोर्ट पर चर्चा करके दिशा निर्देश लेगी. उनके मुताबिक दिसंबर के पहले हक्रते से काम चालू किया जाना था. भगवान के विग्रह को कहीं और स्थापित कर काम कराने के सवाल पर उनका कहना है कि एएसआइ अपने हिसाब से बेहतर काम करेगा. सबसे ज्यादा विवाद एएसआइ की इसी बात पर है कि जगमोहन के जीर्णोद्धार के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह को अपने स्थान से हटाकर काम हो या बिना हटाए? यह फैसला फिलहाल एएसआइ के महानिदेशक राकेश तिवारी पर छोड़ दिया गया है.

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उधर मंदिर के वरिष्ठ दइतापति (सेवायत) जगन्नाथ सवाईमहापात्र का कहना है, “विग्रह कहीं और स्थापित करके जगमोहन का जीर्णोद्धार करने पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. हां, महाप्रभु के दैनिक कार्यक्रम की सदियों पुरानी परंपरा खंडित नहीं होनी चाहिए.” पुरी के लोगों के मुताबिक, इतिहास गवाह है कि अतीत में एक राजा के आक्रमण की वजह से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह चुपके से सोनपुर जिले में ले जाए गए थे. वहां तीनों विग्रह को पाताली (जमीन में विसर्जन) कर दिया गया था. बाद में आदि शंकराचार्य ने पुरी आकर गोवर्धन मठ की स्थापना के साथ विग्रहों को दोबारा स्थापित किया.

शंकराचार्य ने भगवान जगन्नाथ की दैनिक नीति भी तय की थी जिसका आज तक पालन किया जा रहा है. विडंबना कि अब मंदिर के किसी भी कामकाज में पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद की राय तक नहीं ली जाती. उनकी उपेक्षा यहां चर्चा का विषय है. नवकलेवर की जून 2014 की रथयात्रा में उन्हें रथ पर चढऩे नहीं दिया गया था और कहा गया कि वे रथ पर सेवक नहीं ले जा सकते. शंकराचार्य अभी मथुरा में हैं. उनके निजी सचिव मनोज रथ बताते हैं, “जीर्णोद्धार और रत्नासिंहासन से लेकर महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह शिफ्ट करने के मामले तक, न तो मंदिर की संचालन कमेटी और न ही एएसआइ अधिकारियों ने शंकराचार्य से कोई बातचीत की है.

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नवकलेवर में परंपरा भी हुई खंडित?
इस बार भगवान जगन्नाथ के नवकलेवर के ब्रह्म परिवर्तन की धार्मिक विधि भी पहली बार खंडित हुई. इस परंपरा में नियम है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के काष्ठ के विग्रह की पाताली करने से ठीक पहले ब्रह्म परिवर्तन की महाविधि पूरी की जाती है. इस काम में सिर्फ चार दइतापति (सेवायत) होते हैं. लेकिन इस बार ब्रह्मपरिवर्तन के दौरान एक-दो नहीं बल्कि 65 सेवायत घुस गए. इनमें किसी ने मोबाइल से फोटो खींच ली, जबकि यह विधि में बेहद गोपनीयता बरती जाती है. यही नहीं, ब्रह्म परितवर्तन भी निर्धारित समय से 14 घंटे विलंब से हुआ. वैसे मुख्य प्रशासक इसे अफवाह बताते हैं पर उनकी सिफारिश पर क्राइम ब्रांच इसकी जांच कर रही है.

ब्रह्मपरिवर्तन का फोटो लेने और विधि में विलंब के विरोध में कांग्रेस ने 26 जून को ओडिशा बंद का आह्वान किया था, जो लोगों की अटूट आस्था की वजह से सफल रहा. बीजेपी ने भी परंपरा खंडित होने के विरोध में पुरी से विरोध यात्रा निकाली. सेवायत कहते हैं कि 1960 से मंदिर का मुख्य प्रशासक आइएएस अधिकारी ही होता है पर 19 साल बाद आए नवकलेवर को विधि-विधान से संपादित नहीं किया जा सका. कई सवाल उठने के बावजूद सरकार ने नवकलेवर संपन्न करा दिया. यह 29 मार्च से शुरू हुआ जब 150 चयनित दइतापतियों ने 70 किमी की पद यात्रा पूरी करने के लिए मां मंगला की पूजा की. मान्यता है कि मां मंगला सपने में उस नीम के पेड़ की ओर इशारा करती हैं जिससे नव विग्रह बनाए जाते हैं. इसे ओडिशा में दारू कहते हैं. वृक्ष में शंख, चक्र, विष्णु का चक्रगदा, पद्म पुष्प के चिन्ह होते हैं.

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लेकिन मंदिर के जीर्णोद्धार का सवाल अब भी मुंह बाए खड़ा है. अगर इसे जल्दी न सुलझाया गया तो आस्था के इस भीड़ भरे केंद्र में कभी भी कोई हादसा हो सकता है.

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