
इशरत जहां एनकाउंटर केस का जिन्न वक्त की बोतल से एक बार फिर बाहर आ निकला है. अभी मुंबई आतंकी हमले की साजिश में शामिल आतंकी रिचर्ड हेडली के खुलासे के बाद माहौल ठंडा भी नहीं हुआ था कि गृह मंत्रालय के पूर्व अंडर सेक्रेटरी आरवीएस मणि ने अपने बयान से सबकों चौंका दिया है. उनका कहना है कि इशरत और उसके साथियों को आतंकी ना बताने का उन पर दबाव डाला गया था.
मणि के बयान के बीच यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर इशरत जहां एनकाउंटर केस क्या है? 15 जून 2004 को अहमदाबाद में एक मुठभेड़ में इशरत जहां और उसके तीन साथी जावेद शेख, अमजद अली और जीशान जौहर मारे गए. गुजरात पुलिस ने इशरत को लश्कर का आतंकी बताया था और कहा था कि उसके निशाने पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी थे.
एसआईटी ने मुठभेड़ को बताया फर्जी
मुठभेड़ के बाद गुजरात हाईकोर्ट ने इसकी जांच के आदेश दिए तो एसआईटी ने मुठभेड़ को फर्जी बताया. इसके बाद अदालत के आदेश पर सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की. सीबीआई ने एक पुलिस अफसर को सरकारी गवाह बनाया, जिसने नौ साल के बाद 2013 में पहली चार्जशीट दाखिल की थी. सीबीआई ने भी इशरत मुठभेड़ को फर्जी बताया. चार्जशीट में एडीजीपी पीपी पांडे और डीआईजी वंजारा का नाम था.
सबूत गढ़ने के लिए सिगरेट से दागा
सीबीआई का दावा था कि आईबी ने मुठभेड़ से पहले इशरत से पूछताछ की थी. इसके बाद चार लोगों को भून डाला गया था. लेकिन सीबीआई की चार्जशीट अब पूर्व गृह सचिव के बयान से ही सवालिया घेरे में आ गई है. पूर्व अंडर सेक्रेटरी आरवीएस मणि का कहना है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे को बदलने के लिए कहा गया. उन्हें झूठे सबूत गढ़ने के लिए एसआईटी चीफ सतीश वर्मा ने सिगरेट से दागा था.
एनकाउंटर केस के 5 बड़े किरदार
1- पी चिंदबरम, पूर्व गृह मंत्री
2- जी के पिल्लई, पूर्व गृह सचिव
3- राजेंद्र कुमार, पूर्व आईबी प्रमुख
4- सतीश वर्मा, पूर्व एसआईटी प्रमुख
5- आरवीएस मणि, पूर्व अंडर सेक्रेटरी, गृह मंत्रालय
जानिए इस केस में कब-क्या हुआ
15 जून, 2004: गुजरात पुलिस ने एनकाउंटर में चार लोगों को मार गिराया. इनमें इशरत जहां, जावेद गुलाम शेख, अमजद अली राना और जीशान जौहर का नाम शामिल है. इस एनकाउंटर की अगुवाई डीआईजी डीजी वंजारा ने की थी.
7 सितंबर, 2009: एनकाउंटर पर विवाद के बाद मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग को जांच सौंपी गई. उन्होंने 243 पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट में सौंपी. इसमें इशरत जहां एनकाउंटर को फर्जी करार दिया गया. पुलिस को कोल्ड ब्लडेड मर्डर का दोषी ठहराया गया.
9 सितंबर, 2009: गुजरात हाईकोर्ट ने तमांग की रिपोर्ट पर स्टे लगाते हुए जांच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया. हाईकोर्ट ने ये कहा कि इस केस की जांच उसकी निगरानी में ही होगी.
सितंबर, 2010: एसआईटी प्रमुख आर.के. राघवन ने इस केस की जांच करने से इनकार कर दिया. इसके बाद गुजरात हाईकोर्ट ने नई एसआईटी गठित की.
नवंबर, 2010: सुप्रीम कोर्ट में गुजरात सरकार की अर्जी खारिज हो गई, जिसमें नई एसआईटी के गठन पर रोक की मांग की गई थी.
29 जुलाई, 2011: राजीव रंजन वर्मा को एसआईटी का नया चेयरमैन बनाया गया.
नवंबर, 2011: एसआईटी प्रमुख राजीव रंजन की जांच रिपोर्ट के आधार हाईकोर्ट ने एनकाउंटर में शामिल लोगों के खिलाफ नई एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया. इन पर धारा 302 के तहत केस दर्ज किया गया.
दिसंबर, 2011: गुजरात हाईकोर्ट ने इशरत जहां एनकाउंटर केस की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया.
14 फरवरी, 2013: सीबीआई ने आईपीएस ऑफिसर जीएल सिंघल को गिरफ्तार किया.
23 फरवरी, 2013: सीबीआई ने दो और पुलिस अफसर जेजी परमार और तरुण बारोत को भी गिरफ्तार किया.
4 जून, 2013: सीबीआई ने एनकाउंटर केस में आईपीएस डीजी वंजारा को गिरफ्तार किया. उनकी अगुवाई में ही एनकाउंटर को अंजाम दिया गया था.
13 जून, 2013: एनकाउंटर की जांच को लेकर आईबी से चल रही तनातनी के बीच सीबीआई ने आईपीएस सतीश वर्मा को जांच टीम से हटा दिया.
मई, 2014: सीबीआई ने बीजेपी नेता अमित शाह को एनकाउंटर केस में क्लीन चिट दे दी.
फरवरी, 2015: सीबीआई कोर्ट ने पांच फरवरी को डीजी वंजारा को जमानत दे दी.