
दो चरणों में लगभग 15 से 18 किलोमीटर की दूरी तय करनी थी. दूरी तय करने के लिए गाड़ी का इंतजाम होना था. गाड़ी पर सवार होने से पहले हथियारों की जांच होनी थी, फिर हथियार साथ लेने थे. उससे पहले इन सारी चीजों की थाने में रवानगी दर्ज करानी थी. और तब कहीं विकास दुबे पर दबिश डालने के लिए निकलना था. अब अगर हम आपको ये कहें कि उस रात विकास दुबे पर एफआईआर दर्ज होने से लेकर एनकांउटर तक सब कुछ सर्फ 38 मिनट में निपट गया तो क्या आप यकीन करेंगे?
ये देश का सबसे अनोखी एफआईआर है. शायद सबसे चमत्कारिक भी. एफआईआर नंबर 191. इसी एफआईआर ने दो और तीन जुलाई की रात की बिकरू गांव की पूरी कहानी की ज़मीन तैयार की है. और अब यही एफआईआर शायद आगे चलकर यूपी पुलिस के गले की सबसे बड़ी फांस बनने वाली है. क्योंकि यूपी पुलिस अनजाने में एक बहुत बड़ी गलती कर बैठी है.
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हमारा दावा है कि हिंदुस्तान की किसी भी राज्य की पुलिस ने किसी एफआईआर को दर्ज करने के बाद इतनी जल्दी और इतनी फुर्ती से इससे पहले कभी कार्रवाई नहीं की होगी. एफआईआर लिखे जाने के सिर्फ 38 मिनट के अंदर तीन-तीन पुलिस थानों की टीम तैयार भी हो जाती हैं. तीन-तीन पुलिस थानों की टीम हथियारबंद भी हो जाती हैं. तीन-तीन पुलिस थानों की टीमें एक जगह इकट्ठा भी हो जाती हैं और फिर 38 मिनट में ही बिकरू गांव भी पहुंच जाती हैं. 38 मिनट में ही एनकाउंटर भी शुरू हो जाता है. तीन थानों की दूरियां, तीन थानों से बिकरू गांव की दूरियां यहां कोई मतलब नहीं रखते.
ये वो एफआईआर है जो चौबेपुर थाने में दर्ज है. एफआईआर में शिकायतकर्ता के तौर पर राहुल तिवारी का नाम है. और आरोपियों के तौर पर विकास दुबे और उसके चार साथियों का. अब ज़रा एफआईआर की तारीख पर गौर करें 2 जुलाई 2020. अब इससे भी ज्यादा गौर से ज़रा एफआईआर लिखे जाने का समय देखा जाए, जो है रात के 23 बजकर 52 मिनट. यानी दो जुलाई की रात 11 बज कर 52 मिनट पर ये एफआईआर लिखी गई.
अब जरा याद कीजिए, बिकरू गांव में दो और तीन जुलाई की रात को एनकाउंटर कितने बजे हुआ था? खुद पुलिस के मुताबिक रात करीब 12 बजकर 30 मिनट पर. और खुद पुलिस ये कह रही है कि विकास दुबे के घर दबिश डालने के लिए कानपुर जनपद के तीन पुलिस थानों की टीम बिकरू गांव गई थी. ये तीन थाने हैं चौबेपुर, शिवराजपुर और बिठूर.
अब आइए ज़रा इन तीनों थानों की एक-दूसरे से दूरी नापते हैं-
चौबेपुर थाने से शिवराजपुर थाने की दूरी 8 किलोमीटर है.
चौबेपुर थाने से बिठूर थाने की दूरी 10 किलोमीटर है.
जबकि चौबेपुर थाने से बिकरू गांव में विकास दुबे के घर की दूरी 7 किलोमीटर है.
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तो दो जुलाई की रात 11 बज कर 52 मिनट पर विकास दुबे के खिलाफ हत्या की कोशिश समेत अनेक धाराओं के तहत मामला दर्ज होता है. एफआईआर दर्ज होने के बाद चौबेपुर और बिठूर थाने की पुलिस को सूचना दी जाती है. देर रात मिली इस सूचना के बावजूद तीनों थाने की पुलिस हथियार, गाड़ी समेत पूरी तरह तैयार हो जाती है. थाने से निकल भी पड़ती है और फिर चौबेपुर थाने में इकट्ठा होकर वहां से बिकरू गांव विकास दुबे के घर के बाहर भी पहुंच जाती है. इसके बाद गोलीबारी भी शुरू हो जाती है और ये सब कुछ होता है महज 38 मिनट में.
चलिए, एक बार को मान लिया जाए कि यूपी पुलिस इतनी फुर्तीली थी कि उसने सचमुच 38 मिनट में सब कुछ कर डाला. पर फिर यहां खुद पुलिस की उस थ्योरी पर सवाल उठ जाता है, जिसमें पुलिस ने कहा है कि उसके ऑपरेशन की जानकारी विकास दुबे को पहले ही मिल गई थी और इसीलिए उसे अपने गुर्गों और हथियार इकट्ठा करने का मौका मिल गया. सवाल ये है कि जब एफआईआर ही रात 11 बज कर 52 मिनट पर लिखी गई और पुलिस साढ़े बारह बजे तक विकास दुबे के घर भी पहुंच गई तो इन 38 मिनटों में ही विकास दुबे ने 80 से ज्यादा गुर्गे और इतने सारे हथियार कहां से इकट्ठा कर लिए?
तो सवाल ये है कि इस एफआईआर की हकीकत क्या है? क्या एफआईआर सचमुच रात 11 बज कर 52 मिनट पर ही लिखी गई. या फिर दो और तीन जुलाई की उस रात की असली स्क्रिप्ट कुछ और है?