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वैज्ञानिकों की चेतावनी- आर्कटिक की बर्फ पिघली तो कोरोना से बड़ा खतरा होगा

aajtak.in
  • 24 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 10:48 AM IST
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धरती पर कितने प्रकार के माइक्रोब्स यानी रोगाणु हैं, ये वैज्ञानिकों को भी सही से नहीं पता है. लेकिन उन्हें ये पता है कि अगर उत्तरी ध्रुव पर जमी बर्फ ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की वजह से पिघल गई तो धरती पर कोरोना वायरस से बड़ा खतरा सामने आएगा. न जाने कितने प्रकार के माइक्रोब्स, बैक्टीरिया और वायरस उस बर्फ के नीचे दबे हैं. जो उसके पिघलने के बाद बाहर आएंगे तो जाहिर सी बात है इंसानों पर ही हमला करेंगे. 

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हाल ही में साइंटिफिक अमेरिकन मैगजीन में एक रिपोर्ट छपी थी, जिसमें कहा गया था कि धरती पर जिस तरह से बर्फ की चादरें पिघल रही हैं. उससे यह नहीं पता चल रहा है कि भविष्य में किस तरह के खतरों का सामना करना पड़ेगा. बर्फ की गहराइयों में न जाने कैसे बैक्टीरिया वायरस दबे हैं जो बाहर आएंगे. ये कोरोना वायरस से बड़ा खतरा हो सकता है. हमें बर्फ पिघलने से रोकने के लिए कदम उठाने होंगे. 

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ये रिपोर्ट 20 नवंबर को प्रकाशित हुई है. इसे लिखा है यूनिवर्सिटी ऑफ माएन क्लाइमेट चेंज इंस्टीट्यूट के असिस्टेंट प्रोफेसर किंबरले माइनर, एबर्स्टविथ यूनिवर्सिटी से पैराग्लेशियल माइक्रोबियाल एनवायरमेंट के एक्सपर्ट एरविन एडवर्ड और कार्बन साइकलिंग के एक्सपर्ट चार्ल्स मिलर ने मिलकर. 

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तीनों वैज्ञानिकों ने कहा कि धरती के 24 फीसदी हिस्से में पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) है. यानी हजारों साल से बर्फ जमी हुई है. ऐसा ही आर्कटिक भी है. आर्कटिक की बर्फ के नीचे कितने माइक्रोब्स हैं. वो किस तरह के हैं. उनका नेचर क्या है. वो खतरनाक है या सामान्य है... इसका कोई सही अंदाजा दुनिया के वैज्ञानिकों को नहीं है. बर्फ में दबे हजारों साल पुराने प्राचीन माइक्रोब्स भी हो सकते हैं. जैसे कि स्मॉलपॉक्स के माइक्रोब्स.

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वर्तमान विज्ञान की दुनिया को इनमें से कुछ के बारे में ही पता है. लेकिन सभी प्रकार के माइक्रोब्स के बारे में नहीं पता. अगर बर्फ पिघलती है तो किस तरह के बैक्टीरिया और वायरस बाहर आएंगे ये कह पाना मुश्किल है. साल 2018 में ऐसी ही एक घटना साइबेरिया में हुई थी. 

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साइबेरिया में 2018 में एंथ्रेक्स (Anthrax) फैला था. जिसकी वजह से 2 लाख रेंडियर और एक बच्चे की मौत हो गई थी. एंथ्रेक्स के माइक्रोब्स वहां पर बर्फ पिघलने की वजह से बाहर निकला था. बर्फ पिघली थी फ्रीज साइकिल के बिगड़ने की वजह से. फ्रीज साइकिल ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की वजह से खराब हुई थी. यानी अगर बर्फ पिघली तो वैज्ञानिक भी अंदाजा नहीं लगा सकते कि किस तरह के बैक्टीरिया या वायरस का हमला होगा. 

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पिछले पांच साल में अलास्का में ऑर्थोपॉक्सवायरस (Orthopoxvirus) की वजह से लोगों को अलास्कापॉक्स (Alaskapox) हो रहा था. इस बीमारी के चलते लोगों की त्वचा में दाने निकलते हैं और फट जाते हैं. पांच साल में इस वायरस ने अलास्का में दो बार हमला किया. ये माना जा रहा है कि ये वायरस भी जानवरों के जरिए इंसानों में आया होगा. अभी तक इस ऑर्थोपॉक्सवायरस (Orthopoxvirus) की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिक पता नहीं कर पाए हैं. 

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तीनों वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हमें जो पता है उनके साथ-साथ अनजान माइक्रोब्स पर भी ध्यान देना चाहिए. हो सकता है कि बर्फ पिघलने के बाद कोई ऐसा बैक्टीरिया निकले जिसपर एंटीबायोटिक का असर न होता हो. जो बेहद प्राचीन हो जिसका इलाज आज की दुनिया में न हो. या फिर ऐसा वायरस जिसके बारे में हमें कुछ नहीं पता. इसलिए बेहतर है कि हम कोशिश करके ग्लोबल वार्मिंग को कम करें. 

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