शायद आपको सुनकर हैरानी हो लेकिन सच यही है कि हिमालय रेंज की गोद में 124 साल बाद दुर्लभ प्रजाति का फूल पाया गया है. वैज्ञानिकों ने इस फूल की पहचान लिपैरिस पिगमेइया (Liparis Pygmaea) के रूप में की है. सिक्किम और पश्चिम बंगाल में यह फूल 100 साल से ज्यादा पहले दिखाई दिया था. अब पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में उत्तराखंड के चमोली जिले में यह फूल दिखाई दिया है. दो महीने पहले भी दो वन्य अधिकारियों को यह फूल दिखाई दिया था. (रिपोर्ट: कमल नयन सिलोड़ी)
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण संस्थान के वनस्पति विज्ञान विशेषज्ञों ने इस फूल पर अध्ययन किया और इसकी रिपोर्ट 30 जुलाई को फ्रेंच साइंटिफिटिक जनरल ‘रिर्चडाइना’ में प्रकाशित हुई है. इसके अनुसार दुनिया में लिपैरिस पिगमेइया (Liparis Pygmaea) की करीब 320 प्रजातियां है, जिनमें से करीब 48 प्रजातियां भारत में है. इनमें से भी 10 प्रजातियां पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में अब तक मिल चुकी हैं.
चमोली जिले में करीब 3800 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद सप्तकुंड ट्रैक पर यह अद्भुत और दुर्लभ फूल दिखाई दिया है. इससे पहले कभी भी यह फूल इलाके में नहीं देखा गया. वन्य अधिकारी हरीश नेगी का कहना है कि उत्तराखंड वन विभाग के दो अधिकारियों ने जून महीने में भी इस दुर्लभ फूल के खिलने की पुष्टि की थी. जूनियर रिसर्च फेलो मनोज सिंह का कहना है कि दो महीने पहले फूल की खोज होने के बाद इसे पुणे स्थित बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया (बीएसआई) में जांच के लिए भेजा गया था. तभी इसकी पहचान हुई.
महाराष्ट्र के पुणे स्थित भारतीय वनस्पति सर्वक्षण पश्चिमी रीजनल सेंटर के डॉ. जीवन लाल जलाल कहते हैं कि दुर्लभ प्रजाति का यह फूल जून माह में 5 सेंटीमीटर तक खिलता है. उन्होंने ही सबसे पहले इस फूल की पहचान बताई थी. उनका कहना है कि देश में 124 सालों के बाद एक दुर्लभ प्रजाति का फूल लिपैरिस पिगमेइया (Liparis Pygmaea) खिला है.
उन्होंने यह भी बताया कि फूलों की करीब 1250 में से 250 प्रजातियां उत्तराखंड के पहाड़ों में मिलती हैं. यह सभी 3100 से 3900 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में दिखाई देती हैं. डॉ. जलाल ने लिपैरिस पिगमेइया (Liparis Pygmaea) की अब तक तीन प्रजातियों की पहचान की है.
डॉ. जलाल के अनुसार इससे पहले यह फूल सिक्किम में 1877 और 1892 में देखा गया था. फिर वर्ष 1896 के दौरान पश्चिम बंगाल में भी यह मिला था. उनका मानना है कि वर्षों बाद यह फूल दोबारा खिला है. यह घटना हमें हिमालय संरक्षण के लिए बेहतर कदम उठाने की सीख दे रही है.