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4 साल पहले दी मौत को मात! समंदर को धूल चटाने निकला एक पूर्व सैनिक, क्या इतिहास रचेंगे Abhilash Tomy?

Abhilash Tomy: अभिलाष टॉमी के जज्बे को जान उस पर यकीन कर पाना मुश्किल है. उन्होंने मौत को हराया है. और अब वो समंदर को हराने निकले हैं. वो भी अकेले. बिना किसी मदद के. बिना कहीं रुके. उनकी कहानी सांसे थाम देने वाली है.

कमांडर अभिलाष टॉमी नाम रहे दुनिया (तस्वीर- ट्विटर) कमांडर अभिलाष टॉमी नाम रहे दुनिया (तस्वीर- ट्विटर)
Shilpa
  • नई दिल्ली,
  • 27 अप्रैल 2023,
  • अपडेटेड 10:16 AM IST

भीषण तूफान, 40-50 फीट ऊपर तक उछलती लहरें और 150 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चलती तेज हवाएं... कल्पना कीजिए आप यही सब अपनी आंखों के सामने होता देख रहे हैं. इसके बाद दिखने वाला नजारा दिल की धड़कनों को और बढ़ा देता है. बीच समंदर में तहस-नहस होने के बाद थपेड़े खाती नाव. जिसका डीजल टैंक फूट चुका है और गैस लीक हो रही है. तभी एक तेज आवाज आती है, और एक शख्स अल्युमिनियम की सतह पर धड़ाम से आकर गिरता है.

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वो उठने की कोशिश करता है, लेकिन पैर जवाब दे चुके हैं. उसकी सब कोशिशें फेल हो रही थीं. उसे अहसास हुआ कि उसके साथ कुछ गलत हो गया है. दो दिन और दो रातों तक टूटी कमर के साथ पड़े रहना, समंदर के बीचों बीच फंसे इस शख्स को लगातार उलटियां हो रही थीं. बावजूद इसके उसने अपनी इच्छाशक्ति का हाथ पकड़े रखा. 

मगर ऐसा क्या हुआ कि ये शख्स अकेले ही समंदर में तूफानों के हमले झेल रहा था? उसे यहां आने की आखिर जरूरत क्यों पड़ी? चलिए आपको इस कहानी के हीरो से मिलवाते हैं. इनका नाम है कमांडर अभिलाष टॉमी. वो इंडियन नेवी के रिटायर्ड अफसर हैं. वो यहां तक कैसे पहुंचे, इसकी तह तक जाते हैं. कारण ऐसा है, जो आपने सोचा भी नहीं होगा.

21 सितंबर, 2018... मौत को दी मात

अभिलाष के लिए 21 सितंबर, 2018 की तारीख दिल तोड़ देने वाली थी. वो दक्षिणी हिंद महासागर में कहीं फंसे हुए थे. तभी एक जोरदार तूफान आया. मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, वो अकेले थे, बावजूद इसके तूफान से भिड़ गए. वो जहाज के पाल पर अपनी कलाई वाली घड़ी के सहारे लटके रहे. उन्होंने स्थिति को कंट्रोल करने की कोशिश की लेकिन तभी दूसरी बार तूफान ने हमला कर दिया. 

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तब अभिलाष अकेले ही तूफान से भिड़ रहे थे. जैसे तैसे नाव सीधी हुई, तब तक वो 9 मीटर ऊपर हवा में टंगे हुए थे. कुछ देर बार धड़ाम से नीचे गिर गए. आधा घंटा बीत चुका था. उन्होंने उठने की कोशिश की, मगर पैरों ने साथ छोड़ दिया. उन्होंने काफी कोशिश की ठीक होने की मगर कोई फायदा नहीं हो रहा था. तब उन्होंने अपने पास मौजूद एक डिवाइस से मैसेज कर मदद मांगी. मैसेजा था- ROLLED. DISMASTED. SEVERE BACK INJURY. CANNOT GET UP.

इसके बाद इंटरनेशनल रेस्क्यू मिशन शुरू हुआ. भारत, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के नौसैनिक जहाज अभिलाष की तलाश में जुट गए. दो दिन और दो रातों के बाद उन्हें ढूंढ निकाला गया. फिर वो विशाखापट्टनम लाए गए. इतनी गंभीर हालत के चलते कहा गया कि शायद वो नहीं बच पाएंगे. लेकिन अभिलाष ठहरे जिद्दी, वो कहां मानने वाले थे. उनकी जिद के आगे मौत को उलटे पांव कर वापस लौटना पड़ा. तब उन्हें ठीक करने के लिए शरीर में ऑपरेशन कर टाइटेनियम की हड्डियां लगाई गईं.

अब आप क्या सोच रहे हैं? इसके बाद अभिलाष बेड पर पड़े रहे? वो रिकवर होने के लिए आराम कर रहे थे? अगर ऐसा सोच रहे हैं, तो आप गलत हैं. वो 2 महीने बाद ही उठ खड़े हुए और दोबारा समंदर को धूल चटाने की तैयारी शुरू कर दी. अभिलाष भारतीय नौसेना में पायलट थे. वह प्लेन भी उड़ा चुके हैं. अपने इस मिशन को अधूरा नहीं छोड़ना चाहते थे.

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उन्होंने ठान लिया कि जो मिशन अधूरा रह गया है, उसे पूरा करना ही है. बस अब नौसेना की नौकरी छोड़ दी. अपना पूरा करियर सेलिंग के नाम कर दिया. 2022 में वो एक बार फिर समंदर को हराने के लिए निकल गए. इस वक्त उसके बीचों बीच हैं. एक बार फिर तूफानों को पार कर लगातार आगे बढ़ रहे हैं.  

अभिलाष बीच समंदर में किस मिशन को पूरा करने आए? 

अभिलाष टॉमी समंदर की थाह नाप रहे हैं. चार साल बाद वो एक बार फिर इसके रास्ते से पृथ्वी का चक्कर लगा रहे हैं. इस बार वो फिनिश लाइन के बेहद करीब हैं. ये लाइन, दुनिया की सबसे खतरनाक और सबसे रोमांचक बोट रेस की है. ऐसी रेस जो 1968 में पहली बार हुई थी और 50 साल बाद दोबारा शुरू की गई. इस रेस में समंदर के सहारे पूरी दुनिया का चक्कर लगाना होता है, वो भी बिना रुके, बिना किसी आधुनिक टेक्नोलॉजी है. टेक्नोलॉजी वही दी जाती है, जो सबसे पहली रेस यानी 1968 में उपलब्ध थी. 

ये एक ऐसा सफर है, जिसमें अकेलेपन का, समुद्री तूफानों और उसके खतरनाक जानवरों का, खराब मौसम के साथ आई नाउम्मीदी का सामना करना पड़ता है. ये रेस इंसान के सब्र का इम्तिहान लेती है. अभिलाष इस 'गोल्डन ग्लोब रेस' के अंतिम दौर में पहुंचने वाले पहले भारतीय बन गए हैं. वो 230 दिनों के बाद टॉप 4 दावेदारों में से एक हैं. ऐसी उम्मीद है कि रेस 28 या 29 अप्रैल तक पूरी हो जाएगी. इसके पल पल का अपडेट 'गोल्डन ग्लोब रेस' की वेबसाइट और ट्विटर अकाउंट पर दिया जा रहा है. रेस पूरी होते ही, एक नया विजेता मिल जाएगा.

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गोल्डन ग्लोब रेस आखिर क्या है?

गोल्डन ग्लोब रेस की कहानी जानने के लिए आपको वक्त में पीछे जाना होगा, बहुत पीछे, उतना पीछे जब हवाई जहाज तक नहीं थे. पहुंच गए? तो अब आप देख पाएंगे समंदर की इस रोमांचक दुनिया को. जिसके रास्ते दुनिया भर में न केवल व्यापार हुआ, बल्कि लोगों का आना-जाना भी हुआ. संस्कृति और सभ्यताएं फैलीं और विकसित भी हुईं. इसी के सहारे ताकतवर देशों ने कमजोर देशों को लूटा. इसी समंदर का इस्तेमाल एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक पहुंचने के लिए किया जाता रहा. 

'भय बिन होए न प्रीत...' समंदर का एक किस्सा हम रामायण में भी देखते हैं. जब भगवान श्रीराम माता सीता को बचाने के लिए लंका जाना चाहते थे. वो समंदर से रास्ता मांगते हैं, जो उन्हें नहीं मिलता. वो काफी इंतजार करते हैं. मगर समंदर के देवता नहीं सुनते. भगवान श्रीराम को माता सीता की चिंता सता रही थी.

काफी विनती के बाद भी जब रास्ता नहीं मिला को भगवान क्रोधित हो जाते हैं. वो ब्रह्मास्त्र चलाने का मन बना लेते हैं. इसके चलते ही समंदर सूख जाता. कि तभी समंदर देवता प्रकट हो गए. वो माफी मांगते हैं. जिसके बाद भगवान श्रीराम ने वानर सेना की मदद से वहां पुल बनाया और लंका के लिए चल दिए. समंदर की इस जीती जागती कहानी का सबसे बड़ा सबूत आज भी दुनिया में 'रामसेतू' के नाम से मौजूद है. यहां आज भी भगवान के नाम वाले पत्थर तैर रहे हैं. 

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समंदर से जुड़ी और भी कई कहानियां हैं. अब ज्यादा समय न लेते हुए, हम आपको 19वीं सदी में लेकर चलते हैं. जब कुछ लोगों ने जहाज के सहारे पूरी दुनिया का चक्कर लगाने की ठान ली. ऐसा करने वाले सबसे पहले शख्स जोशुआ स्लोखम थे. वह एक कैनेडियन-अमेरिकन थे. उन्होंने 1898 में अकेले ही समंदर के रास्ते पूरी दुनिया का चक्कर लगा लिया. लेकिन इस सफर के दौरान वो कई जहाजों पर भी रुके. अगली चुनौती थी बिना रुके इस पूरे चक्कर को लगाने की. कई लोगों ने ऐसा करने की कोशिश की मगर सफलता हाथ नहीं लगी. 

जोशुआ स्लोखम के बाद इस जाबाजी शौक में ब्रिटेन के फ्रांसिस चेस्टर का नाम जुड़ गया. वो इस रिकॉर्ड को बनाने के काफी करीब पहुंच चुके थे, मगर थोड़ा पीछे रह गए. हुआ ये कि 1967 में वो चक्कर तो पूरा लगा चुके थे, लेकिन रास्ते में एक जगह पर रुक गए. बस यही नहीं करना था. वो ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में रुके थे. जब उन्होंने ये चक्कर पूरा किया, तब उनकी उम्र 65 साल थी.

वो बेशक बिना रुके इस चक्कर को पूरा नहीं कर सके, लेकिन उनका काफी सम्मान हुआ. उन्हें हीरो कहा गया. चेस्टर को तत्कालीन महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की तरफ से नाइटहुड की उपाधि दी गई. वो रातोरात खबरों में छा गए. ये सब देखकर बाकी लोगों का भी मन किया, कि क्यों न हम भी एक चक्कर लगा लें. लेकिन जितना सोचा था, ये उतना आसान नहीं था. चेस्टर के रिकॉर्ड को तभी तोड़ा जा सकता था, जब बिना रुके समंदर के रास्ते दुनिया का चक्कर लगाया जाता. वो भी बिलकुल अकेले. बिना कहीं रुके. बिना आधुनिक डिवाइस की मदद के.

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अब एक बार फिर क्यों हो रही रेस?

दुनिया में चाहे बात जिस चीज की हो, सबसे पहले नजर उससे जुड़े इतिहास पर जाती है. तो इस रेस का भी कुछ यही हुआ. इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण ही नहीं था. यानी बिना रुके समंदर के रास्ते दुनिया का चक्कर लगाने का. क्योंकि फ्रांसिस चेस्टर को भी एक जगह पर रुकना पड़ा था. और उनसे पहले जोशुआ स्लोखम तो कई जगह रुके थे.

तो बस इसी पर अब सबका ध्यान गया. ब्रिटिश अखबार संडे टाइम्स ने एक मौके को भुनाने की कोशिश की. उसने ही चेस्टर के कैंपेन को स्पॉन्सर किया था. मगर अब तलाश थी बिना रुके दुनिया का चक्कर लगाने वाले की. अब अखबार किसी ऐसे इंसान पर पैसा बर्बाद नहीं करना चाहता था, जो आखिर में हार जाए. इन सबके बीच एक प्रतियोगिता कराने का फैसला लिया गया. फ्रांसिस चेस्टर ने अपना रिकॉर्ड तोड़ने की खुली चुनौती दे दी. आखिर में 09 लोग इसके लिए तैयार हो गए.

इस रेस के नियम थे-

  • नाव शुरू होते ही न कहीं रुकना है, न मदद मांगनी है.
  • प्रतियोगिता में बने रहने के लिए तीन ग्रेट केप्स से होकर गुजरना है. 
  • तारीख 1 जून से 31 अक्टूबर, 1968 तय की गई.
  • फिनिश लाइन ब्रिटेन का बंदरगाह था. 
  • दो ईनाम रखे गए. सबसे पहले फिनिश लाइन तक पहुंचने वाले के लिए विशेष प्राइज. और दूसरा, सबसे कम समय में रेस पूरी करने वाले के लिए 5 हजार ब्रिटिश पाउंड.  

अब रेस शुरू हो गई. नवंबर आते आते 9 में से 7 लोग वापस लौट गए. आखिर में दो बचे- रॉबिन नॉक्स जॉन्सटन और डोनाल्ड क्रोहर्स्ट. दोनों ब्रिटेन के ही थे. ऐसा कहा जाता है कि इनमें से डोनाल्ड ने समंदर में कूदकर आत्महत्या कर ली. उन्हें बिजनेस में घाटा हो रहा था और वह रेस के पैसों से इसे कम करने की उम्मीद कर रहे थे.

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वो दो डायरी रखते थे, इनमें से एक में सही लोकेशन और दूसरी में फेक लोकेशन दर्ज कर रहे थे. वो रेस के दौरान अपनी गलत लोकेशन बताते थे. कई जगह मदद के लिए भी रुके. सोच रहे थे कि जब सब लोग थक हारकर बीच में रेस छोड़े देंगे, तो ही हार मानूंगा. गलत लोकेशन के चलते किसी को नहीं पता था कि डोनाल्ड आखिर कहां हैं. तो खूब वाहवाही भी हो रही थी.

मगर अंत में वो नाउम्मीदी में घिर गए. समझ गए थे कि रेस नहीं जीतने वाले. उनकी निशानी के तौर पर नाव, डायरी और लॉगबुक्स मिलीं. मगर लाश कभी नहीं मिली. डायरी के आखिरी पन्नों पर लिखा था, कि वह इस खेल को अब लंबा नहीं खींचना चाहते. सब खत्म हो गया है. सब भगवान की मर्जी है. इसी से अंदाजा लगाया गया कि उन्होंने अपनी जान दे दी है.  

दूसरी तरफ रॉबिन नॉक्स जॉन्सटन अप्रैल 1969 में पृथ्वी का चक्कर पूरा कर चुके थे. वो भी बिना रुके. उनका नाम इतिहास में दर्ज हो गया. उन्हें ऐसा करने में 312 दिन लगे. उनकी नाव जब ब्रिटेन के किनारे पर पहुंची, तो खूब स्वागत हुआ. वो अकेले ही फिनिश लाइन तक पहुंचे थे. 

अब 50 साल बाद एक बार फिर...

साल 2018 में एक बार फिर 50 साल बाद रेस का आयोजन हुआ. नियम पहले जैसे ही थे. तकनीक भी वही 1968 वाली. वेबसाइट पर नियम बताए गए हैं-

  • केवल उन्हें ही रेस में आना है, जिन्हें आमंत्रित किया जाए.
  • उम्र 18 साल से अधिक होनी चाहिए. 
  • सेलिंग का पुराना अनुभव होना जरूरी है. 
  • अगर प्रतिभागी कहीं रुकता है, या जीपीएस को बंद करने की कोशिश करता है, तो वो रेस से बाहर हो जाएगा.
  • एक बार रुकने पर चेस्टर कैटेगरी में रखा जाएगा. आपको याद होगा चेस्टर एक जगह पर रुके थे. दो बार रुकने पर रेस से बाहर माना जाएगा.
  • ट्रैकिंग डिवाइस के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हो सकती.
  • बाहरी दुनिया से जुड़े रहने के लिए सैटेलाइट फोन है. जिसमें मैसेज एक लिमिट तक किए जा सकते हैं. 
  • एक प्रतिभागी को दूसरे की कोई जानकारी नहीं होती. उसे नहीं पता कि वो किसी के आगे चल रहा है या पीछे. 

इस रेस में इंसान को करीब 8 महीने तक अकेले रहना होता है. ऐसे में खाने पीने से लेकर नाव के साइज तक के नियम निर्धारित हैं. 2018 में शुरू होने वाली रेस में 13 देशों के 18 लोगों को आमंत्रित किया गया. इनमें अभिलाष टॉमी भी शामिल थे. वो नौसेना में कमांडर रह चुके हैं. रेस में शामिल वो अकेले भारतीय थे. वो 82 दिनों बाद ही टॉप तीन लोगों में शामिल हो चुके थे. सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था, मगर 21 सितंबर के दिन सब धराशायी हो गया. एक तूफान आया और सब खत्म. 

पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त 

क्या सोच रहे हैं आप? हीरो ने हार मान ली? अजी इतनी जल्दी कहां. वक्त बीता और सितंबर 2022 आ गया. तब इस रेस का तीसरा एडिशन शुरू किया गया. इस बार भी अभिलाष को बुलाया गया. वो तुरंत गए और 4 सितंबर से अपनी नाव पर सवार होकर फ्रांस से सफर शुरू कर दिया. 2022 की गोल्डन ग्लोब रेस की शुरुआत में 16 लोग थे, मगर अब चार ही बचे हैं. इनमें साउथ अफ्रीका की महिला कर्स्टन नेउशफर हैं. दूसरे ऑस्ट्रेलिया के माइकल गुगेनबर्जर हैं.

तीसरे ब्रिटेन के साइमन कर्वेन हैं, जो चेस्टर कैटेगरी में आ गए हैं. जबकि चौथे भारत के अभिलाष टॉमी हैं. ऐसा माना जा रहा है कि रेस में अभी करीब 700 किलोमीटर का सफर बाकी है. अब सबकी नजर उन तारीखों पर है, जब रेस खत्म होगी. देखना ये होगा कि कौन इतिहास में अपना नाम दर्ज करता है. अगर अभिलाष ये रेस जीतते हैं, तो वह ऐसा करने वाले दुनिया के दूसरे और भारत के पहले शख्स होंगे. 

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