
हाल ही में लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के चेयरमैन एसएन सुब्रह्मण्यन के बयान ने देश में वर्किंग कल्चर पर बहस खड़ी कर दी. उन्होंने कर्मचारियों को हफ्ते में 90 घंटे, यानी रविवार समेत काम करने की सलाह दी, जो कई लोगों को बेतुकी और अव्यावहारिक लगी. यह बयान ऐसे वक्त आया है जब भारत में पहले से ही लोग अत्यधिक काम के बोझ से जूझ रहे हैं.
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मुताबिक, औसतन भारतीय कर्मचारी हर सप्ताह 46.7 घंटे काम करता है. वहीं, देश के 51% कर्मचारी हर सप्ताह 49 घंटे या उससे ज्यादा काम करते हैं. इस मामले में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है. ये आंकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि भारत में वर्क-लाइफ बैलेंस अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है.
जहां भारत में काम के घंटे बढ़ाने की बात हो रही है, वहीं जापान, जो कभी लंबी वर्किंग आवर्स के लिए बदनाम था, अब एक नई राह में बढ़ रहा है.
'काम जिंदगी का हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं'
जापान एक ऐसा देश है जो लंबे समय से कठोर कामकाजी संस्कृति और दबाव के लिए जाना जाता था. इसका सबसे भयानक पहलू था करोशी, यानी अत्यधिक काम के कारण होने वाली मौतें. लेकिन अब जापान में कामकाज की संस्कृति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. जापान में 2022 में ही करीब 3,000 लोग अत्यधिक काम की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं, जबकि कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. लंबे कामकाजी घंटे और टारगेट पूरे करने का प्रेशर लोगों की सेहत पर भारी पड़ रहा है.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, जापान में वार्षिक कामकाजी घंटों में भारी गिरावट आई है. 2000 में जहां औसत कामकाजी घंटे 1,839 घंटे थे. वहीं 2022 तक यह घटकर 1,626 घंटे रह गए. यानी 11.6% की कमी. यह बदलाव जापान को उन यूरोपीय देशों के करीब ला रहा है, जहां काम और जीवन के बीच संतुलन को प्राथमिकता दी जाती है.
इस बदलाव के पीछे जापान की युवा पीढ़ी का बड़ा हाथ है. उनकी प्राथमिकता अब लंबी वर्किंग आवर्स की बजाय वर्क-लाइफ बैलेंस बनाना है.
उदाहरण के लिए, 2000 में 20-29 साल के पुरुष औसतन 46.4 घंटे प्रति सप्ताह काम करते थे, जो अब घटकर 38.1 घंटे रह गया है. जापान के कम्यूनिकेशन एक्सपर्ट माकोटो वतनबे के मुताबिक, यह ट्रेंड आज के युवाओं की समझदारी को दिखाता है. अब युवा बिना व्यक्तिगत लाभ के अत्यधिक मेहनत को शोषण मानते हैं और इसे नकार रहे हैं
'काम के प्रेशर में जिंदगी की अहमियत'
जापान में श्रम की कमी ने भी इस बदलाव को तेज किया है. कंपनियां अब कर्मचारियों को आकर्षित करने के लिए बेहतर कार्य शर्तें और सुविधाएं दे रही हैं. पहले जहां बिना वेतन के ओवरटाइम काम आम था, अब युवा कर्मचारी बेहतर वेतन और जीवन की गुणवत्ता का आनंद ले रहे हैं.
रिक्रूट वर्क्स इंस्टीट्यूट के विश्लेषक ताकाशी सकामोटो के अनुसार, 20-29 साल के कर्मचारियों के वेतन में 2000 से 25% की वृद्धि हुई है, जबकि उनके काम के घंटे घट गए हैं.
पुरानी पीढ़ी की असहजता
हालांकि यह बदलाव सकारात्मक है, लेकिन इसे पूरी तरह स्वीकार करना आसान नहीं रहा. पुरानी पीढ़ी, जिन्होंने अपने करियर को लंबे घंटों की मेहनत पर बनाया है, नई पीढ़ी की इस सोच से खुद को जुड़ा महसूस नहीं करती.