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80 साल बाद सही पते पर पहुंचा लेटर, अंदर था घर के पहले बच्चे की मौत का सच

1943 में इलिनोइस के एक कपल को भेजा गया लेटर 80 साल बाद एक डाकघर में मिला और परिवार के एक सदस्य को सौंप दिया गया. इसे जब कपल की बेटी को सौंपा गया तो वह इसे पढ़कर फूटकर रोने लगी.

सांकेतिक तस्वीर (फोटो-Pexels) सांकेतिक तस्वीर (फोटो-Pexels)
aajtak.in
  • नई दिल्ली ,
  • 06 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 7:00 PM IST

आज के दौर में किसी को लेटर या पोस्टकार्ड भेजना शायद कोई आम बात नहीं होगी. लेकिन सालों पहले, यह कम्युनिकेश के सबसे प्रमुख तरीकों में से एक था. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग एक-दूसरे को चिट्ठियां भेजते थे. कभी-कभी, उन्हें समय पर डिलीवरी मिल जाती थी तो कभी देरी भी हो जाती थी. लेकिन कितनी देर? क्या किसी खत को सही पते पर पहुंचने में 80 साल लग सकते हैं? दरअसल, हाल में अमेरिका के डिकाल्ब में ऐसा ही मामला सामने आया है.

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80 साल बाद मिला खत

1943 में इलिनोइस के एक कपल को भेजा गया लेटर 80 साल बाद एक डाकघर में मिला और परिवार के एक सदस्य को सौंप दिया गया. ये लेटर लुईस और लावेना जॉर्ज के लिए था. जब ये अचानक पोस्ट ऑफिस में पड़ा मिला तो वहां के एक कर्मचारी ने जॉर्ज परिवार को ढूंढने का फैसला किया. आखिरकार उसने ये लेटर पोर्टलैंड, ओरेगॉन में रहने वाली जॉर्ज परिवार की एक रिश्तेदार ग्रेस सालाज़ार को दिया.

उसने इसे लुईस और लावेना जॉर्ज की बेटी जेनेट जॉर्ज तक पहुंचा दिया. खत मिलने के बाद जेनेट जॉर्ज ने डब्ल्यूआईएफआर-टीवी को बताया, अचानक से एक बहुत पुराना लेटर हमारे सामने आ जाता है, ये यकीन से परे है. इसे देखकर हर कोई हैरान था. हम बस सोच रहे थे कि ये अचानक कहां से आया.  

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लेटर खोला को मालूम हुआ बड़ा सच

इसे खोलने पर मालूम हुआ कि 1943 में मेल किया गया पत्र, जेनेट के माता पिता को उनके एक चचेरे भाई ने लिखा था. इसमें परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए लिखा गया था, हमें दुख है कि आपकी पहली बेटी एवलिन की सिस्टिक फाइब्रोसिस से मौत हो गई. जेनेट जॉर्ज ने कहा, 'मैं इतने दशकों से नहीं जानती थी कि मेरे माता पिता ने मुझसे पहले एक बच्चे को खो दिया था.  मैं इसे लेकर भावुक हो गई. मेरा मतलब है कि एक बच्चे को खोना हमेशा भयावह होता है. इसने मुझे एक तरह से मेरे माता-पिता के दुःख और मेरे जन्म से पहले ही मेरे परिवार को होने वाले नुकसान का अहसास दिलाया."

जॉर्ज परिवार का पता लगाने वाले डाकघर कर्मचारी ने कहा कि पत्र संभवतः इतने लंबे समय तक डाकघर में यूं हीं पड़ी हुआ था क्योंकि डाक पते पर सड़क का नाम था, लेकिन घर का नंबर नहीं था.
 


 

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