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लाठी-डंडों से पीटा, फिर मारी गोली... जानिए DSP जिया-उल-हक हत्याकांड की पूरी कहानी, जिसमें फंसे कुंडा विधायक राजा भैया

DSP Jiya-Ul-Haq Murder Case: सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने DSP जिया-उल-हक हत्याकांड में कुंडा विधायक राजा भैया की भूमिका की जांच का आदेश CBI को दिया है. कोर्ट ने CBI को इस मामले की तहकीकात कर 3 महीने में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है.

राजा भैया और डीएसपी जिया-उल-हक (फ़ाइल फ़ोटो) राजा भैया और डीएसपी जिया-उल-हक (फ़ाइल फ़ोटो)
aajtak.in
  • लखनऊ ,
  • 27 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 2:56 PM IST

तारीख थी- 2 मार्च 2013 और समय था- रात के करीब सवा 8 बजे. प्रतापगढ़ के बलीपुर गांव में ऐसा कांड होता है जिससे पूरे उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच जाता है. क्योंकि, यहां डबल मर्डर के बाद बवाल की सूचना पाकर गांव पहुंचे  कुंडा के तत्कालीन क्षेत्राधिकारी (डीएसपी) जिया-उल-हक की निर्मम हत्या कर दी जाती है. इस हत्याकांड की आंच सपा सरकार में मंत्री रहे रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया तक पहुंचती है. जो 10 साल बाद भी उनके गले की फांस बना हुआ है. 

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बीते दिन सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने DSP हत्याकांड में कुंडा विधायक राजा भैया की भूमिका की जांच का आदेश CBI को दिया है. कोर्ट ने ये आदेश जिया-उल-हक की पत्नी परवीन आजाद की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने CBI को इस मामले की तहकीकात कर 3 महीने में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इस केस के क्लोजर रिपोर्ट को मान्यता देने वाले आदेश को रद्द कर दिया था. 

जानिए जिया-उल-हक के बारे में? 

जिया-उल-हक देवरिया जिले के गांव नूनखार टोला जुआफर के रहने वाले थे. उनके साथी बताते हैं कि वो बेहद मिलनसार पुलिस अफसरों में शुमार थे. इस बीच जिया-उल-हक की 2012 में बतौर CO (क्षेत्राधिकारी) कुंडा में तैनाती हुई. यहां तैनाती के बाद से ही उनपर कई तरह के दबाव आते रहते थे. दबाव बनाने वालों में कुंडा के विधायक राजा भैया का नाम भी लिया गया. और ये आरोप किसी और ने नहीं बल्कि जिया-उल-हक के परिजनों ने लगाए. 

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गांव में बवाल की सूचना पर पहुंचे थे जिया-उल-हक

दरअसल, हथिगवां थाना क्षेत्र के बलीपुर गांव में 2 मार्च 2013 की शाम प्रधान नन्हे यादव एक विवादित जमीन का मसला सुलझाने के लिए कामता पाल नाम के शख्स के घर पहुंचे थे. तभी बाइक से आए बदमाश प्रधान नन्हे यादव को गोली मारकर फरार हो गए. प्रधान की हत्या की खबर उनके समर्थकों को मिली तो बवाल मच गया. गुस्साए लोगों ने कामता पाल के घर में आग लगा दी. गांव में बवाल शुरू हुआ तो पुलिस को सूचना दी गई. लेकिन कुंडा के कोतवाल सर्वेश मिश्र अपनी टीम के साथ नन्हें यादव के घर की तरफ नहीं जा सके. 

तोड़फोड़, आगजनी और लोगों में बढ़ते आक्रोश के बीच प्रधान का शव बिना पोस्टमॉर्टम के ही गांव में पहुंच गया. हत्या के मामले में बिना पोस्टमॉर्टम के शव गांव में पहुंचने की खबर CO जिया-उल-हक को मिली तो वे अपने लाव-लश्कर के साथ गांववालों से बात करने पहुंचे. लेकिन वहां हिंसा शुरू हो गई और पुलिस पर ही पथराव होने लगा.

घेरकर की गई निर्मम हत्या 

कुंडा के कोतवाल सर्वेश मिश्रा के साथ सीओ जिया-उल-हक जैसे ही गांव में पहुंचे तो लोगों ने पुलिस पर हमला बोल दिया. इसी अफरा-तफरी में फायरिंग होने लगी. तभी नन्हे यादव के भाई सुरेश यादव की भी गोली लगने से मौत हो गई. जिसके बाद लोग और भी आक्रामक हो गए और उन्होंने CO को घेरकर उनकी निर्मम हत्या कर दी.

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गांव में दो मौतों से आगबबूला लोगों ने CO को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया. बाद में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. ये बातें जिया-उल-हक के पोस्टमार्टम से सामने आई थीं. उनके शरीर पर चोट के निशान थे. वारदात के वक्त CO की सुरक्षा में लगे गनर इमरान और विनय कुमार सिंह भाग खड़े हुए थे.

रात 11 बजे भारी पुलिस बल जब बलीपुर गांव पहुंचा और CO जिया-उल-हक की तलाश शुरू हुई तो उनका शव प्रधान के घर के पीछे खड़ंजे पर पड़ा मिला. इस हत्याकांड का आरोप तत्कालीन सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे राजा भैया, उनके करीबी गुलशन यादव समेत कई लोगों पर लगा था. 
 
एक वारदात, 4 FIR, राजा भैया का भी नाम 

इस हत्याकांड में कुल 4 FIR दर्ज करवाई गई. जिसमें एक FIR नन्हे यादव हत्याकांड की थी. दूसरी FIR पुलिस पर हमले की थी. तीसरी FIR सुरेश यादव के मर्डर की थी और चौथी FIR में सीओ जिया-उल-हक के मर्डर की थी. जिसमें तत्कालीन एसओ मनोज शुक्ला की तरफ से प्रधान नन्हें यादव के भाइयों और बेटे समेत 10 लोगों को नामजद किया गया.

सबसे आखिर में सीओ जिया-उल-हक की पत्नी परवीन की ओर से FIR दर्ज कराई गई थी. परवीन की ओर से दर्ज कराई गई FIR में राजा भैया का नाम था. इसके अलावा- गुलशन यादव, हरिओम श्रीवास्‍तव, रोहित सिंह, संजय सिंह का भी नाम था. इन पर आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 302, 504, 506, 120 बी और सीएलए एक्‍ट की धारा 7 के तहत केस दर्ज कराया गया था.

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CBI को सौंप दी गई थी जांच 

इस हत्याकांड ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया था. तत्कालीन अखिलेश सरकार विपक्ष के निशाने पर थी. मामला इतना चर्चित हो गया कि खुद अखिलेश यादव को CO के घर जाकर परिजन को सांत्वना देनी पड़ी. बाद में सरकार ने जिया-उल-हक मर्डर केस की जांच CBI को सौंप दी थी.

लेकिन जिया-उल-हक की पत्नी परवीन की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर पर सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट 2013 में ही दाखिल कर दी थी. सीबीआई ने राजा भैया, गुलशन यादव, हरिओम, रोहित, संजय को क्लीन चिट दे. हालांकि, इस क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ परवीन फिर से कोर्ट चली गई थी. जिसके बाद कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया था. 

अब सुप्रीम कोर्ट ने फिर से CBI को इस केस की फाइल ओपन करने का आदेश दिया है. साथ ही राजा भैया की भूमिका की भी जांच करने को कहा है. ऐसे में राजा भैया की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

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