
उत्तर भारत में इन दिनों रामलीलाओं के मंचन का दौर चल रहा है. इनमें से कुछ जगहों की रामलीला बेहद खास होती है. जैसे- नवाबों के शहर लखनऊ के चौक इलाके में 1937 से हो रही रामलीला. यहां लोग रामलीला के अलावा राम, लक्ष्मण, हनुमान और रावण के अस्त्र-शस्त्र भी देखने आते हैं. क्योंकि, ये अस्त्र-शस्त्र चांदी के बने हैं और दशकों पुराने हैं. वहीं, रामलीला मंचन करने वाले किरदार जो गहने पहनते हैं वो भी करीब 90 साल पुराने हैं.
बता दें कि चौक की रामलीला में गदा उठाए हनुमान जी को दर्शक खूब पसंद करते हैं तो प्रभु श्रीराम के धनुष को भी श्रद्धा भाव से देखते हैं. वहीं, बुराई और अहंकार के प्रतीक रावण के सिर पर रखा भारी भरकम मुकुट 'दशानन' के किरदार को मंच पर सजीव कर देता है. रामलीला में प्रभु राम का संदेश तो मिलता ही है साथ ही इसका मंचन लोगों में उत्साह भी भर देता है.
इस रामलीला में चांदी की 5 किलो की गदा को उठाकर हनुमान जी खूब तालियां बटोरते हैं. लखनऊ में 1937 से चल रही चौक की रामलीला में पिछले कई दशकों से इस गदा का प्रयोग हो रहा है. राम-लक्ष्मण के धनुष, मुकुट सब कुछ चांदी के बने हैं जो साल दर साल रामलीला के पात्र मंच पर धारण करते रहे हैं. शायद ये इकलौती ऐसी रामलीला है जिसमें सभी पात्र चांदी के गहने पहनते हैं और चांदी के ही शस्त्र धारण करते हैं.
चौक रामलीला कमेटी के महामंत्री राजकुमार वर्मा (60) बताते हैं कि ये रामलीला दशहरे के दिन से शुरू होती है. इस समय अस्त्र-शस्त्र और गहनों की साफ-सफाई की जा रही है. चौक की रामलीला की शुरूआत सोने-चांदी का व्यापार करने वाले एक व्यवसायी ने की थी. उन्होंने ही दशकों पहले सभी पात्रों के लिए चांदी के मुकुट, कुंडल, राम जी के खड़ाऊं, गहने आदि बनवाए थे. उसके बाद ये सिलसिला चल पड़ा. अब ये गहने और अस्त्र-शस्त्र इस रामलीला का मंचन करने वालों के लिए धरोहर हैं.
60 के दशक में जो स्मारिका इस रामलीला के दौरान छपीं वो भी अब रामलीला का मंचन करने वाले नए लोगों को प्रेरणा देती हैं. पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें बताती हैं कि ये गदा और धनुष लेकर उस दौर में भी लोगों ने शान से रामलीला का मंचन किया. लोग बताते हैं कि चांदी के इन गहनों और शस्त्रों को सुरक्षा के लिए इसको लॉकर में रखा जाता है. हालांकि, इनकी कीमत से ज़्यादा इनके साथ जुड़ा इतिहास ज्यादा महत्वपूर्ण है.
बकौल राजकुमार वर्मा- मेरी उम्र 60 साल है और हनुमान जी की इस गदा की उम्र मुझसे भी कहीं ज़्यादा है. सिर्फ चांदी के होने की वजह से ये विशेष नहीं हैं बल्कि इनकी वैल्यू इसलिए ज़्यादा है क्योंकि ये अस्त्र-शस्त्र और गहने धरोहर हैं. हम लॉकर में भी इनको रखते हैं तो पूजा अर्चना करके.
वहीं, चौक सर्राफ़ा एसोसिएशन के उपाध्यक्ष विनोद माहेश्वरी कहते हैं कि इस रामलीला में हमारे पिताजी ने भी रोल किया था, मैंने भी किया है. इन शस्त्रों को हाथ में लेना भी अलग अनुभव देता है. लोग उनको देखने दूर-दूर से आते हैं.