
22 जुलाई से शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा से पहले मुजफ्फरनगर में खाने-पीने और फल की दुकान लगाने वाले दुकानदारों ने अपने-अपने नाम लिखकर टांग लिए हैं. दरअसल, पुलिस ने कांवड़ रूट पर पड़ने वाले सभी दुकानदारों को निर्देश दिए थे कि वे अपनी-अपनी दुकानों पर प्रोपराइटर या फिर काम करने वालों का नाम जरूर लिखें, ताकि कांवड़ियों में किसी प्रकार का कोई कंफ्यूजन न हो. लिहाजा किसी ने अपने ठेले पर आरिफ आम वाला तो किसी ने निसार फल वाला की पर्ची लिखकर टांग ली. मुजफ्फरनगर में कांवड़ यात्रा का करीब 240 किलोमीटर का रूट पड़ता है, इसलिए ये जिला बेहद महत्वपूर्ण है. वहीं, योगी सरकार के इस फैसले के बाद आजतक की टीम मुजफ्फरनगर पहुंची. यहां ढाबों के नाम बदल दिए गए हैं. बाबू दा ढाबा का नाम बदलकर बाबू खां ढाबा कर दिया गया है. इसके साथ ही बोर्ड पर संचालक का नाम बाबू खान भी लिख दिया गया है.
बता दें कि बाबू दा ढाबा का मालिक मुस्लिम है और प्रबंधक हिंदू कर्मचारी हैं. लेकिन सरकार के इस फैसले के बाद वह अपनी सुरक्षा को लेकर ढाबा कर्मचारी चिंतित हैं, उनका कहना है कि जब कांवड़ यात्रा और कांवड़ियों का आना शुरू होगा तो खाने के बाद अगर उन्हें कहीं 'खान' दिखाई देता है, तो वे हमें पीट भी सकते हैं.
'खान' नाम की वजह से ढाबे पर गाड़ियां नहीं रुक रहीं
मुजफ्फरनगर के खतौली में स्थित बाबू दा ढाबा का मैनेजमेंट आकाश शर्मा संभालते हैं. उन्होंने कहा कि हम सभी हिंदू कर्मचारी हैं. ढाबा बाबू खान का है. आधार कार्ड पर उसका नाम सिर्फ़ बाबू है और पुलिस ने उसे एंट्री पॉइंट पर अपने नाम (बाबू) के साथ 'खान' लिखने के लिए मजबूर कर दिया है. आकाश ने बताया कि पहले यूपी पुलिस ने हमें ढाबे के नाम से “जी” हटाने के लिए मजबूर किया, फिर बोर्ड पर बाबू ढाबा लिखने के लिए मजबूर किया. यह एक शुद्ध शाकाहारी ढाबा है. लेकिन अब 'खान' नाम की वजह से ढाबे पर गाड़ियां नहीं रुक रही हैं. हम हिंदू हैं, लेकिन जब हंगामा शुरू होगा तो हम हिंदू भी सुरक्षित नहीं रहेंगे.
योगी सरकार के फैसले का BJP के सहयोगी दल कर रहे विरोध
कांवड़ रूट पर यूपी की योगी सरकार कहती है कि हर दुकान को धार्मिक शुचिता बनाए रखने के लिए दुकानदार का नाम-पहचान बताना होगा, दलील ये दी गई कि कानून व्यवस्था के लिए भी ये जरूरी है, लेकिन योगी सरकार के फैसले का मोदी सरकार के साथी ही विरोध कर रहे हैं.जेडीयू, एलजेपी औऱ आरएलडी तीनों ने विरोध किया है. जेडीयू के महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि यूपी से बड़ी कांवड़ यात्रा बिहार में निकलती है, लेकिन वहां ऐसे कोई आदेश नहीं है. वहीं, RLD महासचिव त्रिलोक त्यागी ने कहा कि राजनीति में धर्म जाति नहीं होनी चाहिए. ये उचित बात नहीं है, दुकानों के बाहर नाम लिखवाना परंपरा गलत है. उधर, केंद्रीय मंत्री और भाजपा के सहयोगी चिराग पासवान ने कहा कि वह मुजफ्फरनगर पुलिस द्वारा दुकानों और दुकानदार का नाम बताने वाले फैसले का समर्थन नहीं करते हैं. इतना ही नहीं, आरोप ये भी लग रहा है कि धर्म के नाम पर सिर्फ नाम ही नहीं बदलवाया जा रहा, बल्कि मुस्लिम कर्मचारियों को हटवाया भी जा रहा है.
इन दुकानों के बदले गए नाम
अब तक जो लवर्स चाय प्वाइंट था, वो अब वकील अहमद टी स्टॉल हो गया. फर्क ये आया कि जहां पहले किस धर्म के दुकानदार की दुकान थी, ये साफ नहीं था, वहां अब साफ है कि ये मुस्लिम दुकानदार की चाय की दुकान है. वहीं, चीतल ग्रैंड का नाम तो नहीं बदला, लेकिन अब यहां पर बाहर ही लिखा दिया गया है कि इसके मालिक शारिक राणा हैं. मुजफ्फरनगर में आम बेचने वाले लिखे बैठे हैं कि ये निसार का ठेला है, बाहर पोस्टर पर लिखा गया है कि ये शाह आलम की चाय पान की दुकान है. प्रोपराइटर मोहम्मद दानिश का बैठक कैफे अब चौधरी इरफान का चौधरी होटल हो गया है. नाम बदलकर यूनुस टी स्टॉल और मोहम्मद दानिश का जूस कॉर्नर कर दिया गया है. मुजफ्फरनगर में संगम शुद्ध भोजनालय को अपना नाम सलीम शुद्ध भोजनालय रखना पड़ रहा है, क्योंकि संगम शुद्ध भोजनालय के मालिक मोहम्मद सलीम हैं.
यूपी का नियम उत्तराखंड में भी लागू
नाम और पहचान उजागर करने वाली दुकानों के लिए आए फरमान को लेकर सियासत ने उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में दस्तक दे दी है. ऐसा क्यों हो रहा है, इसकी वजह है 22 जुलाई से शुरू हो रहा सावन का महीना. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड में हरिद्वार तक कांवड़ लेकर लाखों श्रद्धालु चलते हैं, उत्तर प्रदेश में जो नियम बना है, वही उत्तराखंड में भी लागू हो चुका है. पश्चिमी यूपी की तरह हरिद्वार में भी अब दुकानों के बाहर बताना होगा कि दुकान सलीम की है या सौरभ की. दुकान रहीम की है या राजीव की.
क्या है कांवड़ियों का कहना?
शिव भक्ति में तल्लीन श्रद्धालु जो गंगाजल लाकर अपने ईष्ट शिव को चढ़ाते हैं, उनमें ज्यादातर इस बात से खुशी जताते हैं कि योगी सरकार का फैसला सही है, नाम औऱ पहचान दुकानों की उजागर रहे. वहीं, पुलिस का दावा यही रहा कि कोई संगम शुद्ध भोजनालय सोचकर आता है और बाद में पता चलता है कि ये सलीम का है, तो इसे लेकर पहले विवाद होते आए हैं. इस बार कोई विवाद ना हो, कानून व्यवस्था ना बिगड़े. इसलिए ये फैसला लिया गया है.
क्या ढाबे-होटल से मुस्लिम कर्मचारियों को निकाला जा रहा?
सवाल ये उठता है कि नियम तो सिर्फ खाने-पीने की दुकानों के बाहर नाम-पहचान का बना है, फिर क्या ढाबे-होटल से मुस्लिम कर्मचारियों को निकाला भी जा रहा है? आजतक ने मुजफ्फरनगर में इसकी पड़ताल की. यहां एक ढाबे के बोर्ड पर लिखा है शिवा पंजाबी टूरिस्ट ढाबा. नीचे लिखा है मालिक- विश्वजीत चौधरी. यानी नाम भी हिंदू, मालिक भी हिंदू, लेकिन यहां मैनेजर और एक कर्मचारी मुस्लिम थे, तो फिलहाल उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया है. शिवा पंजाबी टूरिस्ट ढाबे में सारे हिंदू कर्मचारी काम कर रहे हैं, इसका सबूत देने के लिए ढाबे पर हर कर्मचारी का आधार कार्ड की क़ॉपी चिपका दी गई है. मुजफ्फरनगर में ही साक्षी टूरिस्ट ढाबा है, दिल्ली से देहरादून हाईवे के इस ढाबे पर दावा है कि चार मुस्लिम कर्मचारियों को हटा दिया गया, साक्षी टूरिस्ट ढाबा के मालिक लोकेश भारती कहते हैं कि नियम कानून-व्यवस्था संभालने के लिए बनाया गया था, उसकी आड़ में अब कुछ लोग अति भी करने लगे हैं.