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यूपी उपचुनाव: गाजियाबाद सदर सीट पर निर्णायक स्थिति में हैं दलित और मुस्लिम वोटर

गाजियाबाद सदर सीट पर दलित और मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में हैं यानी अगर इन दोनों समुदाय के वोटर एक ही पार्टी को वोट करें तो इससे जीत-हार का फैसला हो सकता है. बीजेपी ने इस सीट पर ब्राह्मण, बीएसपी ने वैश्य को टिकट दिया है, वहीं सपा ने नया प्रयोग करते हुए सामान्य सीट पर एससी कैंडिडेट को उतारा है.

गाजियाबाद सदर पर दलित और मुस्लिम निर्णायक स्थिति में गाजियाबाद सदर पर दलित और मुस्लिम निर्णायक स्थिति में
मयंक गौड़
  • गाजियाबाद,
  • 28 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 1:11 PM IST

गाजियाबाद में उपचुनाव को लेकर अब सभी पार्टियां और उम्मीदवार अपने प्रचार के साथ ही जीत का समीकरण बनाने में जुट गए हैं. इस बार उपचुनाव के प्रचार के दौरान दीपावली के त्योहार का सीजन भी पड़ रहा है. ऐसे में जहां बाजारों में त्योहारी रौनक नजर आ रही है. वहीं उपचुनाव को लेकर रौनक और उत्साह अभी नजर नहीं आ रहा है. चुनाव मैदान में उतरे सभी प्रत्याशी और राजनीतिक पार्टियां भी इस स्थिति को बखूबी समझ रही हैं. यही वजह है कि फिलहाल चुनाव को लेकर छोटी-छोटी मीटिंग और कार्यकर्ताओं और वोटरों के बीच उम्मीदवार और उनके समर्थक पहुंच रहे हैं, लेकिन बड़ी रैली या बड़े राजनीतिक कार्यक्रम नजर नहीं आ रहे हैं. 

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गाजियाबाद की सदर सीट पर वोटों के जातिगत और धार्मिक समीकरण की गुत्थी को सुलझाने में भी राजनीतिक पार्टियों के रणनीतिकार जुटे हुए हैं. दरअसल इस सीट पर दलित और मुस्लिम वोटर अधिक संख्या में हैं. गाजियाबाद की इस विधानसभा सीट पर जहां कुल वोटरों की संख्या 4 लाख 61 हजार 360 है. इनमें दलित वोटर करीब 80 हजार और मुस्लिम वोटर 35 हजार से ज्यादा हैं और अगर दलित-मुस्लिम वोटर एक साथ किसी भी राजनैतिक पार्टी के पक्ष में मतदान करते हैं तो यह संख्या हार जीत की निर्णायक स्थिति में होगी और ऐसी स्थिति में यहां भाजपा के लिए मुश्किल बढ़ सकती हैं. 

सपा ने किया है नया प्रयोग

जहां मुस्लिम वोटर का झुकाव उस कैंडिडेट की तरफ होता है जो मजबूती से चुनाव लड़ रहा होता है और भाजपा के उम्मीदवार को हराने की भूमिका में नजर आता है. वहीं सपा ने यहां की सामान्य सीट पर दलित उम्मीदवार सिंह राज जाटव को उतारकर नया प्रयोग किया है. सिंह राज जाटव ने 2022 में सपा ज्वॉइन की थी और उसके पहले वो बीते कई सालों तक बसपा पार्टी से जुड़े से जुड़े रहे थे और पुराने बसपाई हैं, जिसकी वजह से दलित वोटरों को वो लुभा सकते हैं. साथ ही दलित वोटरों का रुझान बसपा के बाद पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ भी नजर आया और बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की डोली शर्मा ने दलित वोटरों में बड़ी सेंध लगाई थी. 

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बीजेपी के लिए बढ़ सकती हैं मुश्किलें

फिलहाल कांग्रेस पार्टी भी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में शामिल हैं. ऐसे में इस सीट पर दलित और मुस्लिम वोटरों का गठजोड़ अगर बना तो वो, भाजपा प्रत्याशी की मुश्किलें बढ़ा सकता है. हालांकि दलित मुस्लिम वोटर पर जहां बसपा अपना दावा करती है, वहीं AIMIM और आजाद समाज पार्टी जैसे राजनैतिक दलों के साथ ही कई निर्दलीय प्रत्याशी भी इन मुस्लिम, दलित वोटरों के अपने पक्ष में होने के दावे करते हैं. ऐसे में अगर यहां दलित-मुस्लिम वोटर अलग-अलग दलों और उम्मीदवारों के बीच बंट जाता है तो यह समीकरण भाजपा को राहत देने का काम करेगा, जबकि इन दोनों का एक साथ आना भाजपा की मुश्किल बढ़ा सकता है. 

BJP ने ब्राह्मण, BSP ने वैश्य और SP ने जाटव को बनाया उम्मीदवार

आपको बता दें कि यहां से भाजपा ने ब्राह्मण चेहरा संजीव शर्मा को, बसपा ने वैश्य समाज से पीएन गर्ग को और सपा कांग्रेस गठबंधन से सपा ने दलित उम्मीदवार सिंह राज जाटव को चुनाव मैदान में उतारा है, जिनके बीच मुख्य चुनावी मुकाबला यहां देखने को मिलेगा. 

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