
बसपा सुप्रीमो और यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने कुछ दिन पहले अपने 26 साल के भतीजे को मंच पर लेकर आईं थीं. उन्होंने परिचय देते हुए कहा था कि ये ईशान आनंद हैं और पढ़ाई करते हैं. इसके बाद से ये कयास लगाए जा रहे हैं कि ईशान आनंद को मायावती राजनीति के मैदान में उतार सकते हैं.
16 जनवरी को मायावती का जन्मदिन था. मायावती ने इस दिन लंदन के वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले अपने दूसरे भतीजे ईशान आनंद को पार्टी की एक बैठक में कार्यकर्ताओं से मिलवाया है. जिसके बाद ये अटकलें तेज हो गईं कि मायावती पार्टी में युवा जोश भरना चाहती हैं.
ईशान के बड़े भाई राजनीति में पहले से हैं
ईशान के बड़े भाई आकाश आनंद पहले से ही पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक हैं और वो पार्टी में कई दायित्व निभा चुके हैं. आकाश आनंद हरियाणा विधानसभा चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे थे और अब वो दिल्ली चुनाव में पार्टी के अभियान की कमान संभाल रहे हैं. आनंद और ईशान मायावती के भाई आनंद कुमार के बेटे हैं.
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एक शख्स ने पीटीआई को बताया ' मंच पर आकाश भाई बहनजी के बाईं ओर खड़े थे, जबकि ईशान भैया सतीश चंद्र मिश्रा जी के साथ उनके दाईं ओर खड़े थे,' शख्स ने दावा किया कि यह पहली बार था जब उनके छोटे भतीजे को साथ देखा गया.
उत्तर प्रदेश बसपा प्रमुख विश्वनाथ पाल ने कहा कि अगर ईशान को पार्टी में शामिल किया जाता है, तो ये सही निर्णय होगा. उन्होंने कहा अगर ईशान भैया को पार्टी में शामिल होना होगा तो उनके नाम की घोषणा बड़े धूमधाम के साथ की जाएगी और बहनजी उन्हें पार्टी में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देंगी.
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राज्य के युवा केवल अखिलेश यादव को अपना नेता मानते हैं
बसपा सुप्रीमों के द्वारा ईशान आनंद को सामने लाने के बाद प्रदेश में सियासत भी तेज हो गई है. सपा के प्रवक्ता दीपक रंजन ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मायावती ने सबसे पहले अपने भतीजे आकाश को राजनीति में उतारा लेकिन वह कुछ खास नहीं कर सके. अब वह अपने एक और भतीजे को राजनीति में लाने की तैयारी कर रही हैं, लेकिन राज्य के युवा केवल हमारे प्रमुख अखिलेश यादव को अपना नेता मानते हैं.
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उन्होंने 2027 में राज्य होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कहा कि जहां तक विधानसभा चुनावों का सवाल है, तो यूपी में बसपा की सत्ता में वापसी का कोई सवाल ही नहीं है. यहां तक कि दलित मतदाता, जो बसपा के वोट बैंक थे, अब वो सपा की तरफ देख रहे हैं.