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उत्तर प्रदेश के शहरी निकाय चुनाव को लेकर सभी की निगाहें हाईकोर्ट पर लगी हुई है. हाईकोर्ट मंगलवार को निकाय चुनाव आरक्षण को लेकर सुनवाई करेगा. सरकार ने आरक्षण को लेकर अपना जवाब सोमवार को दायर कर दिया है और 2017 में हुए ओबीसी के सर्वे को आरक्षण का आधार माना है. ऐसे में सियासी दलों से लेकर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार और वोटर्स तक को अदालत के फैसले का इंतजार है. ऐसे में देखना है कि निकाय आरक्षण के कारण चुनाव टलता है या फिर समय पर होगा.
सूबे के नगरीय निकायों का कार्यकाल 12 दिसंबर से 19 जनवरी के बीच समाप्त हो रहा है. इस बार 760 नगरीय निकायों में चुनाव होना है. इसके लिए राज्य सरकार ने सीटों का आरक्षण भी जारी कर दिया है. प्रदेश की नगर निगमों के मेयर, नगर पालिका परिषद एवं नगर पंचायतों के अध्यक्ष और पार्षदों के आरक्षण को इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई, जिसे लेकर पेंच फंस गया है. ओबीसी को उचित आरक्षण का लाभ दिए जाने और सीटों के रोटेशन के मुद्दों को लेकर कोर्ट में याचिका दायर की.
हाईकोर्ट में एक याचिका में कहा गया है कि सरकार ने निकाय आरक्षण में पिछड़ों के आरक्षण में ट्रिपल टेस्ट का फार्मूला लागू नहीं किया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पहले स्थानीय निकाय चुनाव की अंतिम अधिसूचना जारी करने पर 20 दिसंबर तक रोक लगा दी थी. साथ ही राज्य सरकार को आदेश दिया था कि 20 दिसंबर तक बीते 5 दिसंबर को जारी अनंतिम आरक्षण की अधिसूचना के तहत आदेश जारी न करे.
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की खंडपीठ ने निकाय चुनाव के आरक्षण पर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा था. इस पर प्रदेश सरकार ने कहा है कि 2017 में हुए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सर्वे को आरक्षण का आधार माना जाए और इसी सर्वे को ट्रिपल टेस्ट माना जाए. निकाय चुनाव से जुड़ी याचिकाओं पर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में मंगलवार को सुनवाई होगी. सभी पक्ष सरकार के जवाब पर प्रतिउत्तर दाखिल करेंगे.
हाईकोर्ट में योगी सरकार की ओर से प्रस्तुत जवाब पर बहस के बाद मंगलवार देर शाम तक फैसला आने की उम्मीद है. ऐसे में सभी राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं के साथ निकाय चुनाव के लाखों दावेदारों और उनके समर्थकों की निगाहें न्यायालय के फैसले पर टिकी है.
उच्च न्यायालय का फैसला सरकार के पक्ष में आता है तो जनवरी महीने में चुनाव हो सकते हैं, लेकिन अगर याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आया तो निकाय चुनाव अप्रैल-मई 2023 तक टल सकते है. माना जा रहा है कि हाईकोर्ट से यदि फैसला सरकार के पक्ष में आया तो याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का रुख कर सकते हैं.
बता दें कि उत्तर प्रदेश में 545 नगर पंचायत, 200 नगर पालिका परिषद और 17 नगर निगम के अध्यक्ष, महापौर और पार्षद सीटों के लिए चुनाव होने है. निकाय चुनाव के लिए बीजेपी, सपा, कांग्रेस, बसपा, आरएलडी, अपना दल, और निषाद पार्टी सहित सभी राजनीतिक दलों के लाखों दावेदार मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. यही वजह है कि उच्च न्यायालय के फैसले का सभी राजनीतिक दलों के साथ-साथ चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की निगाहें लगी हुई हैं.