
उत्तर प्रदेश नगर निकाय चुनाव को 2024 लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था. ऐसे में निकाय चुनाव के बाद नफा-नुकसान का आकलन शुरू हो गया है. सूबे की सभी 17 नगर निगमों में मेयर जीतकर बीजेपी भले ही जश्न मना रही हो, लेकिन नगर पालिका और नगर पंचायत के नतीजे बता रहे हैं कि अगर वोटिंग पैटर्न यही रहा तो 2024 में क्लीन स्वीप करना बीजेपी के लिए आसान नहीं है. ऐसे में बीजेपी सभी क्षेत्रों की बैठक कर चुनाव नतीजों पर मंथन करने जा रही है.
वहीं, निकाय चुनाव में सपा के वोट प्रतिशत में जरूर इजाफा हुआ है, लेकिन कोर वोटबैंक में जबरदस्त तरीके से बिखराव होने का खामियाजा उसे भुगतना पड़ा. मुस्लिम बहुल इलाकों में तो सपा को तगड़ा झटका लगा. निकाय चुनाव में बसपा का दलित-मुस्लिम प्रयोग पूरी तरह से फेल होने के बाद मायावती के लिए 2024 लोकसभा चुनाव के लिए चिंता बढ़ गई है. ऐसे में मायावती ने गुरुवार को पार्टी नेताओं की इमरजेंसी बैठक बुलाई है.
कांग्रेस को अमेठी-रायबरेली और कुछ मुस्लिम इलाकों में जरूर संजीवनी मिली है, लेकिन प्रदेश के बाकी जगहों पर फेल रही. असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और आम आदमी पार्टी जैसी छोटी पार्टियों के लिए निकाय चुनाव ने एक उम्मीद जरूर जगा दी है, लेकिन सूबे से सांसद पहुंचना आसान नहीं है. इस तरह बीजेपी से लेकर सपा, बसपा और कांग्रेस तक ने निकाय चुनाव नतीजों को लेकर मंथन करना शुरू कर दिए हैं. आइए जानते हैं कि निकाय चुनाव के नतीजे किस पार्टी के लिए क्या संदेश दे रहे हैं?
बीजेपी के क्लीन स्वीप टारगेट को झटका
बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटें जीतने का टारेगट रखा है. इसीलिए बीजेपी ने निकाय चुनाव को लोकसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास मानते हुए पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ा. चुनाव जिताने की जिम्मेदारी सांसदों को सौंपी गई थी. यूपी में बीजेपी ने 17 मेयर, 91 नगर पालिका और 191 नगर पंचायतों पर कब्जा जमाया है, लेकिन 108 नगर पालिका और 353 नगर पंचायतों में उसे हार का सामना भी करना पड़ा है. सूबे में दो दर्जन से अधिक बीजेपी सांसदों के क्षेत्र में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है. अगर वोटिंग पैटर्न ऐसा ही रहता है तो बीजेपी का क्लीन स्वीप का लक्ष्य मुश्किल लग रहा है.
दो दर्जन सांसदों के गढ़ नहीं खिलाफ 'कमल'
केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी के संसदीय क्षेत्र से महराजगंज की आठ में तीन नगर पंचायतें बीजेपी ने जीती हैं जबकि दोनों नगर पालिका परिषद में पार्टी हार गई. केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के मुजफ्फरनगर जिले की आठ नगर पंचायतों में से बीजेपी एक भी नहीं जीत सकी. दो नगर पालिका में से केवल एक मुजफ्फरनगर नगर पालिका जीती है. स्मृति ईरानी के अमेठी में बीजेपी जायस नगर पालिका और नसीराबाद, सलोन नगर पंचायत हार गई है. गौरीगंज नगर पालिका और अमेठी, मुसाफिरखाना, परसदेपुर नगर पंचायत ही जीत सकी है.
दिनेश लाल निरहुआ के आजमगढ़ जिले की सभी तीनों नगर पालिका सीट पर बीजेपी हारी है. पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह के संसदीय क्षेत्र एटा जिले की छह में से मात्र एक अवागढ़ नगर पंचायत बीजेपी जीत सकी है और चार नगर पालिका में से सिर्फ दो जीती है. सत्यपाल सिंह के बागपत क्षेत्र की सभी छह नगर पंचायत सीट बीजेपी हारी है. साक्षी महाराज के उन्नाव की 16 में से 3 नगर पंचायत, 3 पालिका में से एक सीट ही बीजेपी को मिली है. रामशंकर कठेरिया के इटावा में बीजेपी का खाता नहीं खुल सका. मुकेश राजपूत के क्षेत्र फर्रुखाबाद की 7 नगर पंचायत और दो नगर पालिका सीट में से सिर्फ दो नगर पंचायत सीटें ही बीजेपी जीती हैं. इस तरह दो दर्जन बीजेपी सांसदों के गढ़ में बीजेपी का कमल नहीं खिल सका.
बीजेपी निकाय चुनाव के नतीजों से सबक लेते हुए लोकसभा चुनाव से पहले कील कांटे दुरुस्त करना चाहती है. बीजेपी ने 17, 18 और 19 मई को अपने संगठन की क्षेत्रीय बैठक करने जा रही है. बैठकों में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सिंह, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी, प्रदेश महामंत्री (संगठन) धर्मपाल सिंह के साथ ही पार्टी के बड़े नेता भी शामिल होंगे. इस बैठक में निकाय चुनाव नतीजे का आकलन करेगी और मिशन-2024 के लिए रणनीति को लेकर मंथन करेगी.
सपा के कोर वोटबैंक में बिखराव
समाजवादी पार्टी को नगर निकाय चुनाव में करारी मात खानी पड़ी है. सपा एक भी मेयर सीट नहीं जीत सकी है और नगर पंचायत व पालिका सीटें भी पहले से कम हो गई हैं. सपा को सबसे बड़ा झटका मुस्लिम कोर वोटबैंक में लगा है. मुस्लिम मतदाताओं ने बीजेपी के खिलाफ एक पार्टी के पीछे एकजुट होने के पिछले रुझानों से हटकर निकाय चुनाव में अपनी पसंद के उम्मीदवारों के लिए वोट डाले हैं. मुसलमानों ने बसपा-सपा से अपने समुदाय के प्रत्याशी को नजरअंदाज कर अन्य दलों को चुना है.
नगर चुनाव में ओवैसी की पार्टी को 1.28 लाख वोट मिले और AIMIM उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहा. मुरादाबाद मेयर चुनाव में कांग्रेस महज चार हजार वोटों से हार गई और दूसरे नंबर पर रही. शाहजहांपुर, वाराणसी में मुस्लिमों ने कांग्रेस को वोट किया तो सहारनपुर, आगरा, गाजियाबाद में बसपा के पक्ष में वोटिंग की. इसके अलावा नगर पंचायत और पालिका सीट पर भी मुस्लिम वोटिंग पैटर्न ऐसे ही रहे, जहां उन्होंने बीजेपी के खिलाफ एकतरफा मतदान नहीं किया. मुस्लिम वोटों के बिखराव का बीजेपी को जबरदस्त तरीके से फायदा हुआ. मुस्लिमों का रुख ने सपा की चिंता बढ़ा दी है. इसके अलावा सवर्ण वोटों को जोड़ने की रणनीति भी अखिलेश यादव की फेल रही है तो दलित नेता चंद्रशेखर आजाद और जयंत चौधरी के साथ हाथ मिलाना भी काम नहीं आया.
बसपा का सियासी प्रयोग फिर फेल
बसपा का सियासी आधार यूपी में लगातार कमजोर होता जा रहा है. निकाय चुनाव में मायावती ने दलित-मुस्लिम का प्रयोग किया था. मेयर की 17 में से 11 सीट पर बसपा का मुस्लिम कैंडिडेट उतारने का दांव पूरी तरह फ्लॉप रहा. पिछले चुनावों में दो सीट मेयर की बसपा के पास थीं, इस बार वह भी उनके हाथों से निकल गईं. मायावती ने दलित-मुस्लिम समीकरण से काफी उम्मीदें लगा रखी थी, लेकिन नतीजों में तब्दील नहीं हो सका है. पार्टी सियासी रूप से कमजोर हो रही है, उससे उनका वोट बैंक और जनाधार न सिर्फ खिसक रहा है बल्कि संगठनात्मक स्तर पर कमजोर भी हो रहा है.
निकाय चुनाव के नतीजे 2024 में बसपा की वापसी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. बसपा के 10 सांसद है और मायावती अकेले चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर रखी है. ऐसे में निकाय चुनाव के नतीजे बसपा और मायावती की सियासत के लिए खतरे की घंटी है. ऐसे में मायावती ने 18 मई को पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं के साथ समीक्षा बैठक बुलाई है, जिसमें पार्टी के कोर ग्रुप के साथ मंथन कर भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ना है, उसे लेकर रणनीति बनेगी.
कांग्रेस के लिए भी छिपा सियासी संदेश
निकाय चुनाव में कांग्रेस ने अपने गढ़ अमेठी-रायबरेली की नगर पालिका सीट पर जीत दर्ज जरूर की है, लेकिन बाकी इलाके में उसे हार का मुंह देखना पड़ा है. मुस्लिम बहुल नगर निगम मुरादाबाद में जरूर नंबर दो पर रही है और महज कुछ वोटों से पीछे रह गई थी, जिसमें कांग्रेस पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार का रोल है. कांग्रेस को इससे संजीवनी जरूर मिली है, लेकिन राज्य के बाकी हिस्सों में उसका जनाधार खिसका है और पार्टी के वापसी की उम्मीदों पर संशय बना हुआ है. राहुल-प्रियंका भी यूपी से दूरी बनाए हुए हैं. कांग्रेस के पुराने नेता पार्टी छोड़कर जा चुके हैं या फिर घर बैठे हैं. ऐसे में निकाय चुनाव नतीजे कांग्रेस के लिए चिंता बढ़ा रही है.
AIMIM और AAP की जागी उम्मीदें
निकाय चुनाव के नतीजे सपा, बसपा और कांग्रेस के लिए टेंशन बढ़ाने वाले रहे तो एआईएमआईएम और आम आदमी पार्टी जैसे छोटे दलों के लिए भविष्य के लिए उम्मीदें जगाने का काम किया है. मुस्लिम बहुल सीटों पर AIMIM प्रत्याशी को जीत मिली. खासकर पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड की सीटों मुस्लिम ने ओवैसी को वोट देने का काम किया. इसी तरह से आम आदमी पार्टी के लिए भी निकाय चुनाव एक आस जगाने का काम किया है. ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम बहुल सीटों से अपने प्रत्याशी उतार सकते हैं और मुस्लिमों को वोटिंग पैटर्न यही रहा तो सपा-बसपा के समीकरण को फेल कर देगा.