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सबसे ज्यादा वोट मिलने के बावजूद पिछले चुनाव में क्यों हारीं हिलेरी क्लिंटन

aajtak.in
  • 02 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 4:13 PM IST
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अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे हैं. इस बार डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बिडेन और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच कड़ी टक्कर है. अब तक आए कई सर्वेक्षणों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुकाबले पूर्व उपराष्ट्रपति जो बिडेन से आगे दिख रहे हैं. लेकिन चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार ही अमेरिका का राष्ट्रपति बनेगा यह जरूरी नहीं है. पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में इसी तरह हुआ था. डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार रहीं हिलेरी क्लिंटन को सबसे ज्यादा वोट मिले थे लेकिन उन्हें ट्रंप से हार मिली. अमेरिकी चुनाव में ऐसा क्यों हुआ आइए समझते हैं...

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2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन को 29 लाख से ज़्यादा वोट मिले थे. लेकिन इसके बावजूद वो डोनाल्ड ट्रंप से हार गईं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ट्रंप के पक्ष में इलेक्टोरल कॉलेज रहा.

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दरअसल, अमेरिका में हर राज्य की जनसंख्या के आधार पर एक निश्चित संख्या में इलेक्टोरल कॉलेज वोट होते हैं. इसके तहत कुल 538 वोट होते हैं जिनमें से 270 या फिर उससे ज्यादा वोट जो भी हासिल करता है वो अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव जीतता है. पिछले चुनाव में इलेक्टोरल कॉलेज का वोट ट्रंप के नाम पर रहा और वो राष्ट्रपति बने.

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अमेरिकी संविधान में 1787 से चली आ रही इलेक्टोरल कॉलेज प्रक्रिया में ट्रंप से पहले जॉर्ज डब्ल्यू बुश की भी जीत हो चुकी है. 2000 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अलगोर के मुकाबले पॉपुलर वोट में पिछड़ गए थे, लेकिन इलेक्टोरल वोट उन्हें सबसे ज्यादा मिले थे और वो फिर राष्ट्रपति चुने गए थे.

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इसके पहले 19वीं शताब्दी में जॉन क्विंसी एडम्स, रदरफोर्ड बी हायेस और बेंजामिन हैरिसन भी इलेक्टोरल वोट के जरिए जीते थे. जानकारों का कहना है कि इस बार डोनाल्ड ट्रंप को इलेक्टोरल वोट हासिल करना मुश्किल दिखाई दे रहा है. कहा जा रहा है कि फ्लोरिडा के इलेक्टोरल वोट ट्रंप के पक्ष में नहीं गए तो उन्हें हार का सामना करना पड़ सकता है.

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