भारत और अमेरिका की बढ़ती नजदीकी से चीन की बेचैनी साफ नजर आने लगी है. अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने मंगलवार को भारत का दौरा किया और चीन के खिलाफ भारत को खुलकर समर्थन दिया. अमेरिकी विदेश मंत्री के दौरे में भारत और अमेरिका के बीच एक अहम समझौता भी हुआ जिससे दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी और मजबूत होगी.
मंगलवार को पोम्पियो और मार्क एस्पर के 2+2 मंत्रीस्तरीय संवाद में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शामिल हुए थे. पोम्पियो ने इस बैठक के बाद कहा था कि संप्रभुता और स्वतंत्रता पर हमले की स्थिति में अमेरिका भारत के लोगों के साथ खड़ा रहेगा. पोम्पियो ने कहा था कि चीन को लोकतंत्र, कानून, पारदर्शिता, स्वतंत्रता और क्षेत्र की स्थिरता से कोई लेना-देना नहीं है. चीन की कड़ी आलोचना करने के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री ने गलवान घाटी में चीन के साथ हिंसक झड़प में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देने भी पहुंचे थे. इसे लेकर, चीनी मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है.
चीन की सरकार के मुखपत्र कहे जाने वाले ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक संपादकीय में लिखा है, जब अमेरिकी विदेश मंत्री पोम्पियो और रक्षा मंत्री एस्पर ने गलवान घाटी के शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि दी तो तमाम भारतीय अभिभूत हो उठे लेकिन क्या भारतीयों ने सोचा कि ऐसा क्यों किया गया? अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों ने कोविड-19 से मरने वाले 2 लाख से ज्यादा अमेरिकियों को श्रद्धांजलि नहीं दी और अब वे आकर भारतीय सैनिकों के शहीद होने पर शोक संवेदना जाहिर कर रहे हैं. ये छलावे से भरा तोहफा है और कुछ नहीं. चीन शांतिपूर्वक विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है और अपने हितों की सुरक्षा कर रहा है. चीन ना तो भारत को और ना ही अमेरिका को दुश्मन की तरह देखता है. अगर कुछ लोग साजिश कर रहे हैं तो करें. उसके नतीजे उन्हें भुगतने ही पड़ेंगे.
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन से जब अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के भारत दौरे को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, हमारा मानना है कि सभी देशों के साथ रिश्ते क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और विकास पर केंद्रित होना चाहिए. अमेरिका की इंडो-पैसेफिक रणनीति शीतयुद्ध मानसिकता का प्रतीक है और कई देशों के बीच गुटबाजी और दुश्मनी को बढ़ावा देती है. ये इस बात को दिखाता है कि अमेरिका दुनिया में अपना दबदबा कायम रखना चाहता है. हम अमेरिकी राजनेताओं से इस मानसिकता को छोड़ने की अपील करते हैं. वो चीन के कथित खतरे को लेकर डराना बंद करें और क्षेत्र में देशों के बीच विवाद के बीज बोने की आदत छोड़ें.
वेनबिन ने कहा, भारत-चीन सीमा विवाद का मुद्दा भारत और चीन के बीच का मुद्दा है. फिलहाल, सीमा पर हालात स्थिर हैं और दोनों पक्ष संवाद के जरिए विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. भारत स्थित चीनी दूतावास ने कहा है कि अमेरिका अलग-अलग समूहों को आपस में भिड़ाना चाहता है. दूतावास ने कहा कि चीन और भारत के पास किसी भी आपसी समस्या को सुलझाने के लिए विवेक है और इस मामले में किसी भी तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं है.
भारत ने अमेरिका के साथ मंगलवार को 'बेसिक एक्सचेंज ऐंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट' पर भी हस्ताक्षर किए. इस समझौते से दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग और मजबूत होगा. इस समझौते के बाद, अमेरिकी सेटेलाइट के जरिए भारत अपनी सीमाओं पर कड़ी नजर रख सकेगा. अमेरिका और भारत के बीच हुई इस डील को लेकर भी चीनी मीडिया में रिएक्शन देखने को मिल रहा है. ग्लोबल टाइम्स ने BECA डील को लेकर अलग से एक संपादकीय लेख छापा है. इस लेख में कहा गया है कि 2+2 वार्ता के बाद भारत और अमेरिका ने BECA डील की है. कुछ मीडिया संस्थानों और विश्लेषकों को लगने लगा है कि अमेरिका और भारत के बीच सैन्य साझेदारी अब एक नया आकार लेगी लेकिन ये एक भ्रम है.
संपादकीय में लिखा गया है, चीन को रोकने के लिए अमेरिका की हिंद-प्रशांत की रणनीति थोड़ा आगे जरूर बढ़ी है लेकिन ये प्रगति क्षणिक और मनोवैज्ञानिक स्तर की है. भारत-अमेरिका की इस साझेदारी में साझा हित के ऑपरेशन बहुत ज्यादा नहीं होने वाले हैं. चीन अमेरिका-भारत के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग का विरोध करे लेकिन उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है. चीन को इस तरह के गठबंधनों से ब्लैकमेल होने की भी जरूरत नहीं है.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, अमेरिका और भारत को जो कथित खतरा महसूस हो रहा है, उसका समाधान उनके हाथों में ही है. चीन के खिलाफ गुटबाजी से वे केवल खुद को ही धोखा दे रहे हैं. अमेरिका की समस्या ये है कि वो अपनी प्रतिस्पर्धा खोता जा रहा है और चीन के तेजी से विकास की वजह से उसे एक तरह का संकट महसूस हो रहा है. हालांकि, चीन का विकास देश की क्षमता और चीन के लोगों की मेहनत का नतीजा है. अमेरिका अपनी भू-रणनीतिक चालों से इसका मुकाबला नहीं कर सकता है. भारत भी इस मामले में उसके लिए बहुत मददगार साबित नहीं होने वाला है.
अखबार ने लिखा, चीन को लेकर भारत को हमेशा से संदेह रहे हैं और हाल में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के बाद अविश्वास की खाई और गहरी हुई है. हालांकि, अमेरिका के करीब जाकर वो सीमा पर चीन से टकरा पाने की स्थिति में नहीं आ पाएगा. भारत अमेरिका के करीब जाकर चीन पर मनोवैज्ञानिक दबाव लेने की कोशिश कर रहा है लेकिन गलवान घाटी से पैंगोंग झील तक उसका ये दबाव काम नहीं आने वाला है.
ग्लोबल टाइम्स ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि अमेरिका और भारत के बीच ये बैठक ऐसे वक्त में हुई जब दोनों देश महामारी से बुरी तरह प्रभावित हैं. अगर कुछ दशक पहले ऐसी सक्रियता दिखाई जाती और उनका टारगेट ऐसा देश होता जो ताकत के दम पर विस्तार करने की इच्छा रखता हो तो शायद इसके कुछ व्यावहारिक नतीजे देखने को मिल सकते थे लेकिन हकीकत ये है कि उन्होंने गलत वक्त पर गलत टारगेट चुन लिया है. वे गलत रास्ते पर निकल पड़े हैं.
इस संपादकीय लेख में कहा गया है, चीन की भू-राजनीतिक विस्तार की कोई मंशा नहीं है और चीन का दुनिया के बाकी देशों के साथ सहयोग को इस तरह की भू-रणनीतिक चालों से रोका नहीं जा सकता है. अगर अमेरिका चीन के साथ असली लड़ाई लड़ना चाहता है तो वो चीन को अपने कृषि उत्पाद का निर्यात करना बंद कर दे और चीन के बाजार से मैकडी, कोकाकोला और आईफोन को हटा ले. अमेरिका अपने करीबी सहयोगी ऑस्ट्रेलिया को भी चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंध खत्म करने के लिए मना ले जिसका आधे से ज्यादा व्यापार चीन के साथ होता है. अगर ये सारी चीजें होती हैं, तभी दुनिया चीन के साथ अपने संबंधों पर एक बार फिर से विचार कर सकती है.
अखबार ने लिखा, चीन दुनिया के तमाम देशों को सहयोग कर रहा है और कभी-कभी सामने आने वाली प्रतिस्पर्धा व हितों के टकराव को संभाल सकता है. चीन दूसरे देशों की जलन औऱ संदेह से निपटने में सक्षम है और फायदे के लिए उनकी चालबाजियों को रोकने में भी. अगर अमेरिका चीन के खिलाफ शीतयुद्ध छेड़ना चाहता है तो ये उसके लिए खतरनाक साबित होगा.
भारत को लेकर ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, भारत की स्वार्थपरक मौकापरस्ती चीन से सीमा विवाद की वजह से बढ़ती जा रही है. लोगों की राष्ट्रवादी सोच की वजह से भारत में चीन के खिलाफ आक्रोश है. लेकिन भारत आखिर क्या चाहता है? कौन से लक्ष्य वास्तविक है और कौन नहीं? भारत अमेरिका के साथ मिलकर चीन पर दबाव बनाकर क्या हासिल कर पाएगा? भारत अपना रास्ता भटक चुका है.