पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार एक सियासी तूफान का सामना कर रही है. इमरान खान के कार्यकाल को अभी सिर्फ ढाई साल ही हुए हैं लेकिन उनकी कुर्सी पर बड़ा खतरा मंडराता दिख रहा है. पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है कि सेना और सरकार के खिलाफ विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं. इमरान खान को सत्ता से बाहर करने और सियासत में सेना के दखल का विरोध करने के लिए विपक्षी दलों ने पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) नाम से एक गठबंधन भी बना लिया है.
इस गठबंधन में नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) पीएमएल-एन, पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी), जमायत-उलेमा-ए-इस्लाम फजल (जेयूआई-एफ) और पख्तूनख्वां मिली अवामी पार्टी शामिल हैं. इसके अलावा, बलूचिस्तान नेशनल पार्टी और पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट जैसे कुछ छोटे दल भी शामिल हैं. इस गठबंधन की तरफ से सरकार के विरोध में दो रैलियां आयोजित हो चुकी हैं जिसमें कोरोना के बावजूद हजारों की संख्या में लोग जुटे. रैली के पहले कई नेताओं-कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया गया.
इमरान खान जब सत्ता में आए थे तो उन्होंने नए पाकिस्तान का सपना दिखाया था लेकिन अभी तक के कार्यकाल में जनता को महंगाई, बिजली कटौती, कारोबार में मुश्किलें, बेरोजगारी और तमाम आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. हाल ही में, पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारी और इमरान खान के स्पेशल असिस्टेंट रहे असीम बाजवा भ्रष्टाचार को लेकर घिरे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. हालांकि, वो अब भी सीपीईसी के चेयरमैन बने हुए हैं. सीपीईसी में भी कई तरह के घोटाले सामने आ चुके हैं.
इमरान खान ने न्यायप्रिय, समृद्ध और कल्याणकारी पाकिस्तान बनाने का वादा किया था लेकिन ये बस वादा ही रह गया है. पाकिस्तान में कोरोना महामारी अनियंत्रित नहीं हुई है, इसके बावजूद हालात बहुत बुरे हैं. इमरान खान के 27 महीने के कार्यकाल में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था गर्त में ही गई है. पाकिस्तान की आर्थिक वृद्धि दर साल 2019 के 1.9 फीसदी से माइनस 1.5 फीसदी पर पहुंच गई है. खपत में कमी के बावजूद महंगाई दर साल 2020 में 10.7 फीसदी है जो साल 2019 के मुकाबले चार अंक ज्यादा है. खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी, बिजली की दरों में वृद्धि और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपये का अवमूल्यन इस महंगाई की मुख्य वजहें हैं. दूसरे देशों से कर्ज ले लेकर पाकिस्तान की सरकार किसी तरह काम चला रही है. जनता में इमरान सरकार के खिलाफ असंतोष पनपा है और विपक्ष इसी असंतोष को भुनाने में लग गया है.
दूसरी तरफ, ये नया गठबंधन पाकिस्तान की सियासत की नई पीढ़ी के लिए भी एक मौका है. पीएमएल-एन के नवाज शरीफ और पीपीपी के आसिफ अली जरदारी दोनों ही नेता भ्रष्टाचार के मामले में घिरे हुए हैं. शरीफ लंदन में हैं और पाकिस्तानी एजेंसियां उनके प्रत्यर्पण की कोशिश में लगी हुई हैं. दोनों ही पार्टियों की कमान इन नेताओं के बच्चों मरयम नवाज और बिलावल भुट्टों के हाथ में है.
विपक्षी दलों के निशाने पर सिर्फ इमरान खान ही नहीं हैं. इस गठबंधन में शामिल नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) का निशाना साफ तौर पर पाकिस्तान की सेना है. लंदन से नवाज शरीफ ने पाकिस्तान की राजनीति में सेना के दखल को लेकर दो बार हमला बोल चुके हैं. यहां तक कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पाकिस्तानी आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा का नाम भी लिया.
नवाज शरीफ ने शुक्रवार को हुई रैली में एक बार फिर सीधे तौर पर सेना को निशाने पर लिया. नवाज शरीफ ने अपने वर्चुअल संबोधन में कहा, बेरोजगारी, महंगाई और इस संकट के लिए मैं इमरान खान को दोषी ठहराऊं या फिर उन्हें जो उन्हें सत्ता में लाए हैं. आपका वोट किसने चुराया और चुनाव में धांधली किसने की? किसने इस सरकार को चुना है? नवाज शरीफ ने "वन पाकिस्तान फॉर ऑल" का नारा दिया और सैन्य अधिकारियों के लिए सजा की मांग की. नवाज शरीफ ने कहा कि सेना ने ही इमरान खान को सत्ता में बिठाया और संविधान का उल्लंघन किया. जबकि मैं संविधान और लोकतंत्र की बात कर रहा हूं तो मुझे देशद्रोही करार दिया जा रहा है.
नवाज शरीफ खुद के सत्ता से बाहर होने के लिए सेना को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं. नवाज शरीफ का कहना है कि पाकिस्तानी सेना 'स्टेट के ऊपर एक स्टेट' है. वहीं, नवाज शरीफ को पिछले साल ब्रिटेन में इलाज के लिए आठ हफ्ते की बेल मिली थी लेकिन अब वो कोर्ट की नजर में भगोड़े बन गए हैं. कोर्ट ने उन्हें किसी भी चुनाव के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है लेकिन इसके बावजूद उनकी राजनीतिक गतिविधियां जारी हैं.
नवाज शरीफ का इस तरह से पाकिस्तान की सेना पर सीधे तौर पर हमला करना ऐतिहासिक माना जा रहा है. पाकिस्तान का कोई शीर्ष नेता शायद ही सेना को खुले आम चुनौती देता नजर आता हो, खासकर पंजाब का कोई नेता. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से ही आर्मी में ज्यादातर जनरल और सैनिक आते हैं. ये पहली बार है जब विपक्ष की तरफ से सेना पर ऐसे वार किए जा रहे हैं जब एक चुनी हुई सरकार के हाथों में देश की बागडोर है. अक्सर होता ये रहा है कि सरकार और सेना के बीच ही खींचतान होती थी. साल 2008 से 2013 के बीच पीपीपी-जरदारी सरकार में और नवाज शरीफ की पीएमएल (एन) सरकार के दौरान ऐसा ही कुछ देखने को मिला था लेकिन इमरान खान कई बार इस बात का बखान कर चुके हैं कि उनकी सरकार और सेना के बीच बेहतरीन सांमजस्य है. सेना के सामने भी ऐसी चुनौती पहली बार आई है और वो इसकी आदी नहीं है. इस सिविलियन-मिलिट्री साझेदारी में चूंकि सेना ज्यादा ताकतवर है, हो सकता है कि वो खुद को सुरक्षित करने के लिए इस डूबती कश्ती से किनारा कर ले.
विपक्षी दलों का गठबंधन आने वाले हफ्तों में कई ऐसी रैलियां आयोजित करने वाला है. जनवरी 2021 में इमरान खान से इस्तीफा देने की मांग करते हुए राजधानी इस्लामाबाद से संसद तक एक महारैली का आयोजन किए जाने की भी योजना है. विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि वे बड़े पैमाने पर इस्तीफा देंगे और संसद में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएंगे.
अतीत में, कई बार ऐसे बड़े मार्च निकाले जा चुके हैं. इमरान खान खुद इस्लामाबाद में धरना दे चुके हैं जो सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही खत्म हुआ था. इमरान खान की रैली के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई शुरू हुई थी. हालांकि, अगर आर्मी ने इमरान खान को प्रधानमंत्री बनाया है तो वो उसे हटाने की क्षमता भी रखती है. इमरान खान की पार्टी में भी कई लोग ऐसे होंगे जो उनकी जगह लेने के लिए तैयार होंगे. कुछ भी हो, अगर विरोध-प्रदर्शन इसी तरह जारी रहते हैं तो इमरान खान की चुनौतियां बढ़नी तय हैं. ऐसे में, सबकी नजरें सेना पर जाकर टिक गई हैं कि वो आगे क्या कदम उठाती है.