टर्की के साथ अब पाकिस्तान भी इस्लामिक दुनिया का नेता बनने की कोशिश कर रहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की इस्लाम पर की गई टिप्पणी को लेकर पाकिस्तान में भी जमकर हंगामा हो रहा है. पाकिस्तान की संसद में सोमवार को मैक्रों के बयान को इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देने वाला करार दिया गया और फ्रांस से राजनयिक रिश्ते खत्म करने की मांग भी उठी.
मैक्रों ने बुधवार को कहा था कि पैगंबर मोहम्मद के कार्टून प्रकाशित किए जाने को लेकर वो कट्टरपंथियों के आगे हार नहीं मानेंगे. फ्रांस के एक स्कूल में सैमुअल पैटी नाम के टीचर ने पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाया था जिसकी हाल ही में सिर कलम कर हत्या कर दी गई. मैक्रों ने अपने बयान में कहा कि टीचर की हत्या इसलिए की गई क्योंकि इस्लामिस्ट हमारा भविष्य छीनना चाहते हैं.
संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे पर निर्विरोध प्रस्ताव पारित किया गया. नेशनल एसेंबली का प्रस्ताव कहीं ज्यादा सख्त था. ये प्रस्ताव पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने पेश किया. विपक्षी दलों ने भी सदन में फ्रांस को लेकर एक प्रस्ताव पास किया और फ्रांस से पाकिस्तान के राजदूत को वापस बुलाने की मांग की.
पाकिस्तान की संसद में पारित हुए प्रस्ताव में इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) से 15 मार्च को इस्लामोफोबिया से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करने की अपील की गई. ओआईसी के सदस्य देशों से फ्रांस की बनी वस्तुओं का बहिष्कार करने के लिए भी कहा गया है.
इस प्रस्ताव में गैर-ओआईसी देशों से वहां रह रहे मुसलमानों को क़ानूनी मदद देने की भी अपील की है. इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र से इस्लामोफोबिया से लड़ने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया है. संसद ने फ्रांस के राष्ट्रपति की टिप्पणी को इस्लामोफोबिया से ग्रस्त बताया है. प्रस्ताव पास होने के बाद पाकिस्तानी संसद के उपाध्यक्ष कासिम सुरी ने फ्रांस से पाकिस्तान के राजदूत को तत्काल वापस बुलाने की मांग की है.
प्रस्ताव में फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत, इस्लामोफोबिया और इस्लाम पर कथित हमले का संज्ञान लेते हुए पैगंबर मोहम्मद के कार्टून फिर से प्रकाशित करने के कदम की आलोचना की गई. सदन के नेता डॉ. शहजाद वसीम ने कहा कि जब सरकारें ऐसे निंदनीय कदमों का समर्थन करने लगती हैं तो अलग-अलग धर्मों के बीच विवाद, अलगाव और मतभेद बढ़ जाते हैं.
संसद में कहा गया कि पैगंबर मोहम्मद के प्रति अपार आस्था निश्चित तौर पर इस्लाम का हिस्सा है और कोई भी मुस्लिम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे घृणित अपराधों को बर्दाश्त नहीं करेगा.
संसद में मुस्लिमों और उनकी भावनाओं को आहत करने वाली घटनाओं को लेकर गंभीर चिंता चाहिर की गई. सीनेट के चेयरमैन सादिक संजरानी ने स्टाफ को निर्देश दिए कि इस प्रस्ताव की प्रति पाकिस्तान में फ्रांस के राजदूत को भी भेजी जाए.
सत्ता और विपक्ष के नेताओं ने फ्रांस से राजनयिक संबंध पूरी तरह खत्म करने की मांग की और कहा कि फ्रांस के सामान का बहिष्कार किया जाना चाहिए. जमात-ए-इस्लामी के सांसद सिराज उल-हक ने कहा कि फ्रांस ने 1.52 अरब मुसलमानों की भावनाएं आहत की हैं. सिराज ने इस मुद्दे पर ओआईसी की बैठक बुलाने की जरूरत बताई और कहा कि सभी मुस्लिम देशों को एकजुट होना चाहिए. वहीं, सीनेटर हक ने कहा कि ओआईसी में पाकिस्तान को इस मुद्दे पर अगुवाई करनी चाहिए.
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भी मैक्रों पर निशाना साधा था. उन्होंने कहा था कि मैक्रों का बयान गैर-जिम्मेदाराना है और आग में घी डालने का काम कर सकता है. कुरैशी ने कहा, किसी को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में लाखों मुसलमानों की आबादी की भावनाओं को आहत करने का अधिकार नहीं है.
इससे पहले, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी फ्रांस के राष्ट्रपति के बयान की आलोचना की थी. इमरान खान ने कहा था कि मैक्रों की टिप्पणी इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देती है. इसके साथ ही, उन्होंने फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग को एक चिठ्ठी लिखी थी जिसमें सोशल मीडिया साइट पर इस्लामोफोबिया से जुड़े कंटेंट को बैन करने की मांग की थी. इमरान खान ने अफसोस जताते हुए कहा था कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने हिंसा करने वाले आतंकवादियों को निशाना बनाने के बजाय इस्लाम पर हमला किया जिससे इस्लामोफोबिया को प्रोत्साहन मिलेगा.