तुर्की के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर हैं और पाकिस्तान से भारत की शत्रुता उसके बनने के बाद से ही रही है. लेकिन सऊदी अरब पाकिस्तान का ऐसा दोस्त रहा है जिसने हर मुश्किल वक्त में उसका साथ दिया. हाल के दिनों में पाकिस्तान को तुर्की की दोस्ती इस कदर रास आई है कि वो सऊदी को भी किनारे कर दे रहा है. सऊदी से पाकिस्तान की इस दूरी के पीछे भी कश्मीर मुद्दा ही है. जहां कश्मीर मुद्दे पर सऊदी भारत को समर्थन दे रहा है, वहीं, तुर्की खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा है. यही वजह है कि कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद से जितनी तेजी से भारत और पाकिस्तान के बीच कड़वाहट बढ़ी है, उतनी ही तुर्की से भी.
भारत से रिश्ते खराब करने में तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दवान की अहम भूमिका है. एर्दवान तुर्की जैसे आधुनिक और सेक्युलर मूल्यों वाले देश के कट्टर इस्लामिक राष्ट्रपति हैं जो उसी आईने में विदेश संबंधों को भी देखते हैं. कश्मीर भी उनके इसी इस्लामिक प्रोजेक्ट का हिस्सा है.
भारत के साथ तुर्की की हालिया दुश्मनी की कड़ी कश्मीर ही है. तुर्की के राष्ट्रपति रचप तैयप एर्दवान ने कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का भरपूर समर्थन किया. यहां तक कि तुर्की ने संयुक्त राष्ट्र में भी कश्मीर मुद्दा उठाया जिसे लेकर भारत की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया आई. जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किए इसी 5 अगस्त को एक साल पूरा हुआ तो भी तुर्की ने खामोशी नहीं बरती और पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाया.
तुर्की के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हामी एकसोय ने कहा कि भारत ने अपने इस कदम से जम्मू-कश्मीर के हालात और जटिल बना दिए हैं और इससे क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने में कोई मदद नहीं मिली है. तुर्की ने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और प्रस्तावों के तहत वार्ता के जरिए सुलझाने की बात कही.
ऐसे माहौल में, जब बॉलीवुड ऐक्टर आमिर खान अपनी फिल्म के सिलसिले में तुर्की पहुंचे और ट्विटर पर तुर्की की फर्स्ट लेडी अमीने एर्दवान से मुलाकात की तस्वीरें शेयर कीं तो सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हो गए. लोगों ने कहा कि तुर्की भारत का दुश्मन देश है और आमिर खान वहां की फर्स्ट लेडी से मुलाकात कर रहे हैं. भारतीयों में तुर्की विरोधी भावनाएं साफ तौर पर देखने को मिलीं. हालांकि, हमेशा से तुर्की और भारत के बीच ऐसी कड़वाहट नहीं रही है.
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आधुनिक तुर्की के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क की राजनीतिक विचारधारा की बहुत सराहना करते थे. पाशा ने तुर्की को एक सेक्युलर और लोकतांत्रिक देश बनाया जोकि किसी भी इस्लामिक देश के लिए मुश्किल काम है. हालांकि, शीतयुद्ध के दौरान भारत और तुर्की के संबंधों के समीकरण तेजी से बदलने लगे. तुर्की अमेरिकी खेमे में शामिल हो गया जबकि भारत गुट-निरपेक्ष आंदोलन का हिस्सा था और रूस के ज्यादा करीब था. 1965 और 1971 के युद्ध में जब तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन किया तो दोनों देशों के रिश्तों में दरार और बढ़ गई.
हालांकि, 80 के दशक में भारत और तुर्की के संबंध सुधरने लगे थे. साल 2000 में तुर्की के तत्कालीन प्रधानमंत्री बुलेंट एसविट ने भारत का दौरा किया. करीब 15 सालों में किसी तुर्की नेता का ये पहला दौरा था. तुर्की राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के लोकतंत्र को कुचलकर सत्ता में आने की आलोचना की. साल 2003 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने भी तुर्की का दौरा किया था. तुर्की में उनका जमकर स्वागत हुआ.
जब दोनों देशों के रिश्ते सामान्य होने की तरफ आगे बढ़ रहे थे, तभी तुर्की की राजनीति में एर्दवान का उदय हुआ. साल 2002 में एर्दवान ने इस्लाम की वापसी का नारा देते हुए चुनाव जीता. एर्दवान सत्ता में आते ही तुर्की के सेक्युलर ताने-बाने को ढहाते हुए उसे इस्लामिक राष्ट्र की तरफ आगे बढ़ाने लगे. दूसरी तरफ, मध्य-पूर्व में अमेरिका का प्रभाव बढ़ रहा था, ऐसे में भारत की गुटनिरपेक्ष की नीति भी तुर्की को खलने लगी. मोदी सरकार के आने के बाद से भारत के सऊदी अरब और इजरायल के साथ भी संबंध मजबूत हुए हैं.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की ने अपनी इंटेलिजेंस एजेंसी को भारतीय मुसलमानों को कट्टरपंथी बनाने के लिए भारी-भरकम फंड दिए हैं. तुर्की ने इसके लिए सरेंडर कर चुके आईएसआईएस कैडर के धार्मिक गुरुओं को भर्ती किया है. मामले से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, एर्दवान धार्मिक संस्थाओं और आतंकवाद का इस्तेमाल मुस्लिम दुनिया की लीडरशिप पर अपना दावा पेश करने के लिए कर रहे हैं. तुर्की की धार्मिक संस्था दियानत की भारत में पहले से ही मौजूदगी है और अब एर्दवान आईएसआईएस आतंकियों को भारत को परेशान करने के लिए इस्तेमाल करना चाह रहे हैं. भारत इसके खिलाफ हर सुरक्षात्मक कदम उठाने के लिए तैयार है.
एर्दवान भारत और तुर्की के बीच परमाणु शक्ति को लेकर भी सहयोग चाहते हैं लेकिन भारत ने इनकार कर दिया. दूसरी तरफ, पाकिस्तान अपने राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक हितों के लिए अपनी परमाणु शक्ति के राज साझा करने के लिए बदनाम है. परमाणु हथियारों के दम पर ही मुस्लिम दुनिया में उसकी प्रासंगिकता बनी हुई है. इस वजह से भी तुर्की कश्मीर पर पाकिस्तान को खुलकर समर्थन देता है. हालांकि, भारत से संबंधों की कीमत पर ही वह पाकिस्तान से अपनी दोस्ती आगे बढ़ा रहा है.