भारत में कोरोना महामारी के जारी कहर के बीच चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भारत और अमेरिका के रिश्तों पर कटाक्ष किया है. अमेरिका ने पहले भारत के उस अनुरोध को मानने से इनकार कर दिया था जिसमें वैक्सीन बनाने के लिए जरूरी चीजों के निर्यात पर पाबंदी हटाने की मांग की गई थी. अमेरिकी प्रशासन ने कहा था कि अमेरिका के नागरिक उसकी प्राथमिकता है और जब तक अमेरिका इस संकट से पूरी तरह उबर नहीं जाता है, पूरी दुनिया पर खतरा बना रहेगा. जब इस लेकर आलोचना होने लगी तो बाइडेन प्रशासन ने भारत की मदद करने का ऐलान किया. हालांकि, भारत की मदद के लिए काफी देर बाद सामने आने को लेकर चीनी मीडिया ने अमेरिका पर जमकर निशाना साधा है.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, भारत में कोविड महामारी सबसे भयावह चरण में पहुंच गई है. वहीं अमेरिका 20 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगवाने की उपलब्धि का जश्न मनाने में व्यस्त है. ये कितना बड़ा विरोधाभास है! अमेरिका ने भारत को वैक्सीन के लिए जरूरी कच्चे माल के निर्यात पर लगी पाबंदी को हटाने से भी इनकार कर दिया था.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, अमेरिकी सरकार ने कोविड महामारी से लड़ाई में भारत को कई बार मौखिक रूप से समर्थन दिया है. अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने रविवार को ट्वीट कर भारतीयों के प्रति सहानुभूति जताई. हालांकि, अमेरिका कोविड-19 से चुनौतियों का अभी भी सामना कर रहा है और वह पहले अपने देश की जरूरतों पर ही ध्यान देगा. भविष्य में भी अमेरिका के लिए भारत समेत वायरस से लड़ रहे देशों की मदद करना मुश्किल होगा.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, "भारत जैसे देशों को पता होना चाहिए कि अमेरिका के लिए वे एक मोहरे से ज्यादा कुछ नहीं हैं. जब अमेरिका को जरूरत होगी, तब उनका इस्तेमाल किया जाएगा. जब अमेरिका को उसकी जरूरत नहीं रह जाएगी तो वह उसे इस्तेमाल किए हुए टिश्यू की तरह फेंक देगा."
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, अमेरिका भारत को अपने चीन विरोधी रथ पर सवार करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन जब जरूरत पड़ती है तो वह अमेरिकी फर्स्ट की पॉलिसी का हवाला देकर कदम पीछे खींच लेता है. अमेरिका और पश्चिमी देशों का पाखंड इस मामले में पूरी तरह से खुलकर सामने आ गया है. कई भारतीयों को भी इस दोगलेपन का एहसास होने लगा है. भारतीय लेखक के भट्टाचार्य ने लिखा है, अगर कोविड ने हमें कुछ सिखाया है तो वह ये मानवाधिकारों को लेकर पश्चिमी देशों का रवैया सिर्फ एक स्वांग है और कुछ नहीं."
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, हालांकि, अमेरिका ने चीन को रोकने के लिए भारत की रणनीतिक अहमियत को खूब तवज्जो दी है. अगर भारत कोविड से कमजोर पड़ता है तो अमेरिका के चीन विरोधी कैंपेन पर भी इसका असर पड़ना तय है. अमेरिका नहीं चाहेगा कि ऐसा हो. इसलिए ऐसा संभव है कि अमेरिका डोनेशन समेत भारत की प्रतीकात्मक मदद करे. अमेरिकी अगुवाई वाले क्वॉड समूह ने भी भारत को निराश किया है. क्वॉड की ऐतिहासिक समिट में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के नेताओं ने भारत में वैक्सीन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया था. दुनिया भर में चीन की वैक्सीन वितरण की मुहिम को काउंटर करने के लिए ऐसा किया गया था.
अखबार ने लिखा है, भारत जब महामारी से बुरी तरह जूझ रहा है तो अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने सिर्फ मौखिक रूप से ही समर्थन दिया है. जापान भी अभी तक खामोश ही है. क्वॉड देशों ने कहा था कि साल 2022 के अंत तक वैक्सीन की 1 अरब डोज बनाई जाएंगी ताकि वैक्सीन की आपूर्ति प्रभावित ना हो. हालांकि, इस प्लान पर प्रभावी रूप से अमल नहीं किया गया. नतीजा ये होगा कि भारत भी भविष्य में क्वॉड देशों के साथ सहयोग बढ़ाने को लेकर संभवत: अनिच्छुक नजर आए.
चीन ने भारत को कोरोना संकट में निपटने के लिए मदद की पेशकश की थी. ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, भारत ने चीन के प्रस्ताव को लेकर कोई जवाब नहीं दिया है. जाहिर है कि मोदी सरकार को झिझक महसूस हो रही होगी. ऑक्सीजन, पीपीई की किल्लत के चलते भारत को अंतरराष्ट्रीय मदद की जरूरत है. लेकिन हाल के वर्षों में चीन के साथ संबंध खराब हुए हैं और भारत में चीन विरोधी माहौल बना हुआ है. यही वजह है कि भारत सरकार चीन की मदद लेने में हिचकिचा रही है.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, एक विकासशील देश होने के नाते भारत को महामारी नियंत्रण और अपने लोगों की सुरक्षा पर पूरा जोर देना चाहिए. भारत को यथार्थ से दूर कूटनीतिक योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल देना चाहिए. कोविड वैक्सीन के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की भारत की कोशिश ना केवल उसके लोगों के हितों के खिलाफ है बल्कि देश के विकास के लिए भी उपयुक्त नहीं है.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, भारत को किसी देश की तरफ झुकने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बचाकर रखनी चाहिए. भारत ने हमेशा से गुटनिरपेक्षता पर कायम रहते हुए देश का विकास किया है लेकिन पिछले कुछ सालों में अपनी भू-रणनीतिक जरूरतों के चलते वह अमेरिका की तरफ झुका है. भारत चीन के साथ एक तरह से खेल में शामिल हो गया है. लेकिन अब भारत जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है, उससे साबित हो गया है कि अमेरिका और क्वॉड भरोसे के काबिल नहीं हैं.
ग्लोबल टाइम्स में छपे लेख में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उठ रहीं तमाम आवाजें कह रही हैं कि असल में अमेरिका को भारत में कोरोना संकट की परवाह नहीं है. हालांकि, भारत अब अमेरिका के असली चेहरे को पहचान सकता है.