
चीन तेजी से मध्य-पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि चीन, सऊदी अरब और मिस्र के साथ हथियारों की एक बड़ी डील को लेकर बातचीत कर रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि यह डील चीनी मुद्रा युआन में होगी. अगर ऐसा हुआ तो मध्य-पूर्व में अमेरिका और उसकी मुद्रा डॉलर के लिए एक बड़ा झटका होगा.
मध्य-पूर्व में नजर रखने वाली बेरूत स्थित खुफिया कंपनी Tactical Report ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि सऊदी अरेबियन मिलिट्री इंडस्ट्रीज (SAMI) चीन की सरकारी रक्षा कंपनी चाइना नॉर्थ इंडस्ट्रीज ग्रुप कॉपरेशन (Norinco) के साथ हथियारों की खरीद के लिए बातचीत कर रही है. सऊदी अरब चीनी सरकारी कंपनी से टोही ड्रोन से लेकर एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद करना चाहता है.
पिछले हफ्ते की अपनी रिपोर्ट में खुफिया कंपनी ने कहा था कि संभावित डील में शामिल हथियारों में स्काई सेकर FX80 मानवरहित हवाई जहाज (UAV), CR500 वर्टिकल टेक-ऑफ और लैंडिंग विमान (VTOL) UAV, क्रूज ड्रैगन 5 और 10 शामिल हैं. इसमें दो तरह के आत्मघाती ड्रोन, HQ-17AE कम दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम (SHORAD) भी शामिल है.
डील के बारे में जानकारी रखने वाले सूत्रों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में लिखा गया कि इस डील को लेकर बातचीत पिछले एक साल से चल रही है और SHORAD को हाल ही में इस डील का हिस्सा बनाया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया, 'सऊदी और चीन के बीच इस डील को लेकर इस साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत तक बातचीत जारी रह सकती है. ऐसी अफवाहें भी हैं कि पूरी डील के लिए चीनी मुद्रा युआन में भुगतान किया जाएगा.'
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के पूर्व प्रशिक्षक सोंग झोंगपिंग ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से बातचीत में कहा, 'अगर हथियारों की डील युआन में होती है तो अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने में मदद मिलेगी. तब अमेरिका अपनी मुद्रा को देशों पर दबाव बनाने और उन पर प्रतिबंध लगाने के टूल के रूप में नहीं कर पाएगा.'
मिस्र के साथ भी हथियारों की डील को लेकर बातचीत कर रहा चीन
सोमवार को प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में Tactical Report ने कहा, मिस्र Chengdu J-10C, बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान की खरीद के लिए चीन से बातचीत कर रहा है.
इस खरीद को लेकर पिछले साल के अंत में बातचीत शुरू हुई थी. आगे की बातचीत के लिए मिस्र की वायु सेना के एक प्रतिनिधिमंडल के इस सप्ताह मलेशिया में लैंगकॉवी अंतरराष्ट्रीय समुद्री और एयरोस्पेस प्रदर्शनी के मौके पर Chengdu Aircraft Industry Group के प्रतिनिधियों से मिलने की उम्मीद है.
इस मुलाकात के दौरान चीनी कंपनी मिस्र के प्रतिनिधिमंडल को J-10C में हुए नए तकनीकी बदलावों के बारे में जानकारी देगी. इस लड़ाकू विमान में एडवांस इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और AESA (active electronically scanned array) रडार शामिल हैं. रिपोर्ट ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि मिस्र चीन से 12 J-10C लड़ाकू विमान खरीदना चाहता है.
हथियारों के लिए चीन कैसे बना मध्य-पूर्व की पसंद?
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता है लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि चीन अमेरिका के एक विकल्प के रूप में तेजी से उभर रहा है. चीन देशों को बिना राजनीतिक शर्तों के सस्ते में उन्नत हथियारों की आपूर्ति कर रहा है.
झोंगपिंग कहते हैं, 'चीन मित्र देशों को बिना किसी राजनीतिक शर्त के उन्नत किस्म के हथियार देने का इच्छुक है. मुझे लगता है कि मध्य-पूर्व के देश चीन के इसी नीति से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं.'
हथियारों पर दुनिया में सबसे अधिक खर्च करने वाले सऊदी अरब ने यूं तो दुनिया के कई देशों से हथियार खरीदे हैं लेकिन सबसे अधिक हथियार उसने अमेरिका से ही खरीदे हैं. लेकिन अब सऊदी अपने हथियारों की खरीद में विविधता लाना चाहता है.
हाल के वर्षों में अमेरिका के साथ सऊदी के संबंध खराब हुए हैं. साल 2018 में सऊदी पत्रकार जमाल खाशोज्जी की तुर्की दूतावास में हत्या और ओपेक प्लस द्वारा तेल उत्पादन न बढ़ाने को लेकर अमेरिका सऊदी अरब से नाराज चल रहा है. सऊदी अरब भी अपनी विदेश नीति को अमेरिका के प्रभाव से मुक्त करना चाहता है.
चीनी मीडिया ने पिछले साल अपनी खबरों में कहा था कि नवंबर में झुहाई एयर शो (चीन में हर दो साल पर होने वाली विमानन प्रदर्शनी) के बाद सऊदी अरब ने चीन से 4 अरब अमेरिकी डॉलर के हथियार खरीदे हैं. यह खरीद सऊदी के पिछले हथियार डील से कही ज्यादा थी.
दुनिया में हथियारों की खरीद-बिक्री को लेकर क्या कहते हैं आंकड़ें?
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के अनुसार, 2018-22 में पांच सबसे बड़े हथियार निर्यातक संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और जर्मनी थे. इन देशों ने मिलकर दुनिया के 76 फीसदी हथियारों के निर्यात की आपूर्ति की.
पांच साल की इस अवधि के दौरान, अमेरिका ने वैश्विक हथियारों के निर्यात का 40 प्रतिशत आपूर्ति की. उसने मुख्य रूप से सऊदी अरब, जापान और ऑस्ट्रेलिया को ये हथियार बेचे.
वैश्विक हथियारों के निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 5.2 प्रतिशत है और वो पाकिस्तान, बांग्लादेश और सर्बिया को मुख्य रूप से हथियार बेचता है.
भारत दुनिया में सबसे अधिक हथियारों की खरीद करने वाले देशों में पहले स्थान पर है. उसके बाद सऊदी अरब, कतर, ऑस्ट्रेलिया और चीन आते हैं. मिस्र इस लिस्ट में छठे स्थान पर है.
मिस्र अपने हथियारों की खरीद के लिए मुख्य रूप से रूस, फ्रांस और जर्मनी पर निर्भर है. लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद मिस्र को रूस से हथियारों का आपूर्ति नहीं हो पा रही है. रूस पर लगे प्रतिबंधों के कारण वो निर्यात के लिए रक्षा हथियार बेहद सीमित मात्रा में बना पा रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि इसी कारण मिस्र हथियारों की आपूर्ति के लिए अब चीन की तरफ मुड़ रहा है.