Advertisement

नेपाल से खाली हाथ लौटा चीन, ओली ने नेपाल की राजनीति में हस्तक्षेप न करने की दी हिदायत

चीन ने जिस ओली के ऊपर सबसे अधिक भरोसा किया था, आज उसी ओली ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दूत को नेपाल के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करने की हिदायत दे दी. जो चीन के लिए किसी झटके से कम नहीं है.

नेपाल की राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए गए चीनी दल को वापस लौटना पड़ा है नेपाल की राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए गए चीनी दल को वापस लौटना पड़ा है
सुजीत झा
  • काठमांडू,
  • 31 दिसंबर 2020,
  • अपडेटेड 6:25 PM IST
  • कम्युनिस्ट पार्टी में विघटन को रोकने के लिए चीन ने अपना प्रतिनिधिमंडल भेजा था
  • चीन चाहता था कि विघटन रुके और प्रचंड प्रधानमंत्री बन जाएं
  • चीनी दूतों को बिना कुछ हासिल हुए ही लौटना पड़ा है

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन को रोकने के लिए काठमांडू आए चीनी राष्ट्रपति के दूत, चार दिनों की मशक्कत के बाद बैरंग वापस लौट गए हैं. सत्ता की बंदरबांट में विभाजित हो चुकी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को फिर से एक करने का, चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग का संदेश लेकर नेपाल आए चीनी प्रतिनिधिमंडल को निराश होकर लौटना पड़ा है. इस प्रतिनिधि मंडल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अन्तरराष्ट्रीय विभाग के उपप्रमुख सहित, दिग्गज चीनी नेता थे जिन्हें नेपाल इसलिए भेजा गया था ताकि नेपाल की राजनीति में चीनी पकड़ कमजोर न हो पाए.

Advertisement

देखें- आजतक LIVE

नेपाल में कम्युनिस्ट सत्ता के जरिए चीन ना सिर्फ अपना एजेंडा पूरा करता रहा है बल्कि नेपाल को भारत से दूर रखने की हरसंभव कोशिश भी करता है. लेकिन चीन ने जिस ओली के ऊपर सबसे अधिक भरोसा किया था, आज उसी ओली ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दूत को नेपाल के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करने की हिदायत दे दी. जो चीन के लिए किसी झटके से कम नहीं है.

चीन के लिए हमेशा ही कम्युनिस्ट पार्टी का एक होना प्राथमिकता में रहा है. जब तक पार्टी के जरिए चीन का षड्यंत्र पूरा होता रहा तब तक ओली कुर्सी पर टिके रहे. लेकिन जैसे ही पार्टी के भीतर के विवाद और कुर्सी पर प्रचण्ड की नजर पड़ी, उसी समय से नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और चीन के बीच में खटपट शुरू हो गई.

Advertisement

चीन के लिए अब ओली का महत्व नहीं रहा. चीन ने ओली को स्टेप डाउन करने के लिए कहा तो ओली भी चीन को लेकर सतर्क हो गए. इस बार भी शी जिनपिंग के दूत का एजेंडा ओली को अलग-थलग करने और प्रचण्ड को कुर्सी पर बिठाने का था, लेकिन चीन उसमें भी सफल नहीं हो पाया. और उसके प्रतिनिधिमंडल को खाली हाथ लौटना पड़ा है.

चीन के भरोसे भारत से दुश्मनी मोल लेने वाले प्रचण्ड को सत्ता में बैठने के लिए एक बार फिर भारत की याद आई है. प्रचण्ड विभिन्न माध्यमों से दिल्ली के समर्थन की गुहार लगा रहे हैं ताकि ओली को हटाकर वे खुद प्रधानमंत्री बन सकें.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement