
मुस्लिम दुनिया के दो बड़े देशों ईरान और सऊदी अरब के बीच सालों की दुश्मनी खत्म कराने के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब एक नए मिशन पर हैं. शी जिनपिंग अब यूक्रेन युद्ध को खत्म कराने के लिए अहम कूटनीतिक पहल करने जा रहे हैं. चीन के राष्टपति आगामी सोमवार को दो दिनों की रूस की यात्रा पर रवाना हो रहे हैं,
एक साल से ज्यादा समय से जंग की विभीषिका झेल रहे यूक्रेन समेत पूरी दुनिया के लिए यह एक बड़ी खबर है. यूक्रेन जंग भले ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन की महात्वाकांक्षाओं की जंग हो लेकिन इससे प्रभावित भारत समेत पूरी दुनिया हुई है. लिहाजा यूक्रेन वार में पूरी दुनिया को ब्रेकथ्रू का इंतजार है. इसलिए शी जिनपिंग के इस दौरे का बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक महत्व है.
20 से 22 मार्च तक रूस की यात्रा पर जिनपिंग
शी जिनपिंग के दौरे की घोषणा चीन के विदेश मंत्रालय ने की. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुया चुनिआंग ने एक बयान जारी कर कहा कि, "रूसी संघ के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निमंत्रण पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग 20 से 22 मार्च तक रूस की राजकीय यात्रा करेंगे."
विदेश मंत्रालय ने इस यात्रा की कोई और जानकारी नहीं दी. हालांकि कूटनीतिक हलकों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि बीजिंग यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए शांति वार्ता की शुरुआत कर सकता है. यहां यह बताना जरूरी है कि पुतिन और जिनपिंग के बीच काफी अच्छे संबंध है. इसलिए ये माना जा रहा है जिनपिंग अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकते हैं.
इस दौरे का क्या रणनीतिक महत्व है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि तीसरी बार चीन के राष्ट्रपति बनने के बाद शी जिनपिंग ने अपने पहले विदेशी दौरे के लिए रूस को चुना है. चीन के राष्ट्रपति बनने के अलावा चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने उन्हें सेना का चीफ भी चुना है.
सऊदी अरब-ईरान की दोस्ती कराने के बाद नये डिप्लोमैटिक मिशन पर चीन
बता दें कि पिछले सप्ताह ही बीजिंग ने अतंर्राष्ट्रीय कूटनीति में एक ऐसे डील को मुकम्मल करवाया जिससे अमेरिका समेत पूरी दुनिया हैरान रह गई. बीजिंग में 4 दिनों तक चले कई राउंड की गुप्त बैठक के बाद पश्चिमी एशिया के दो बड़े देशों सऊदी अरब और ईरान ने घोषणा की कि वे कई सालों से कायम अपनी अदावत को खत्म कर संवाद का रास्ता अपना रहे हैं. इन दोनों देशों के बीच 2011 में आए अरब स्प्रिंग के दौर से ही रिश्तों में खटास रही है.
गौरतलब है कि शिया बहुल ईरान और सुन्नी बहुल सऊदी अरब में सालों से दुश्मनी थी. इन दोनों देशों के बीच हालत ऐसे थे कि आज भी इनका एक दूसरे के देशों में दूतावास नहीं है.
लेकिन चीन ने अपने कूटनीतिक धमक का इस्तेमाल करते हुए इन दो देशों को न सिर्फ बातचीत की टेबल पर ले आया बल्कि शांति समझौते को करवाने में सफल रहा. कहा जा सकता है कि चीन इस शांति समझौते को अमली जामा पहनाने के लिए दोनों देशों के लिए गारंटर बन गया.
अब पुतिन-जेलेंस्की के बीच जमी बर्फ पिघलाने की जिनपिंग की कोशिश
कूटनीति की दुनिया में तख्तापलट समझे जाने वाले इस शांति समझौते के बाद चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग अपनी आर्थिक और कूटनीति ताकत का इस्तेमाल यूक्रेन जंग को खत्म करवाने में करना चाहते हैं. इस बात की पूरी संभावना है कि जिनपिंग अपने मित्र पुतिन से इस जंग के कई पहलुओं पर चर्चा करेंगे. अटकलें लगाई जा रही हैं कि पिछले 10 वर्षों से पुतिन के घनिष्ठ मित्र शी यूक्रेन में चल रहे संघर्ष को समाप्त करने के लिए रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता शुरू करने का प्रयास कर सकते हैं.
माना जा रहा है कि शी जिनपिंग यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से भी फोन पर बात कर सकते हैं और इस शांति वार्ता की जल्द से जल्द घोषणा कर सकते हैं.
रूस की सत्ता के केंद्र केमलिन की ओर से इस दौरे के लेकर जारी बयान में कहा गया है कि दोनों नेता "रूस और चीन के बीच व्यापक साझेदारी और रणनीतिक बातचीत के संबंधों के भविष्य से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा करेंगे." क्रेमलिन के अनुसार इस दौरे में कई द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर किये जाएंगे.
अमेरिकी धौंस को दरकिनार कर कूटनीतिक फैसले करवा रहे हैं जिनपिंग
गौरतलब है कि जिनपिंग का ये दौरा उस समय हो रहा है जब यूक्रेन युद्ध की समाप्ति की कोई संभावना नहीं दिख रही है. यूक्रेन पश्चिमी देशों की मदद की बदौलत मोर्चा संभाले हुए है तो पुतिन तमाम नुकसान झेलने के बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.
जिनपिंग की इस कोशिश को अमेरिकी धौंस का जवाब भी माना जा रहा है. बता दें कि अमेरिका भी ईरान और सऊदी अरब के बीच के तनाव को खत्म कराने की कोशिश करता रहा लेकिन 'ट्रस्ट डेफिसिट' (भरोसे की कमी) की वजह से वो इस मिशन में सफल नहीं हो पाया. जबकि चीन इसी काम को कर पाने में कामयाब रहा.
इसलिए भी यूक्रेन युद्ध को लेकर चीन की भूमिका से लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं. सऊदी-ईरान डील पर 'द न्यूयार्क टाइम्स' ने कहा था कि यह समझौता पश्चिम एशिया क्षेत्र में चीन के बढ़ते राजनीतिक और आर्थिक दबदबे की ओर इशारा करता है. पूर्व अमेरिकी राजनयिक डेनियल रुसेल मानते हैं कि चीन का यह कदम विश्व मंच पर बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभाने की इच्छा को दर्शाता है.
राजनीतिक समझौते के पक्ष में है चीन
यूक्रेन जंग के एक साल पूरे होने पर चीन ने अपने रुख को दोहराते हुए कहा था कि वो इस विवाद का संवाद के जरिये राजनीतिक समाधान चाहता है. हाल ही में जारी किए गए एक दस्तावेज में चीन के विदेश मंत्रालय ने इस मामले में शांति वार्ता को फिर से शुरू करने, एकतरफा प्रतिबंधों को समाप्त करने और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के विरोध में अपना बयान दिया था. चीन के इस रुख से जिनपिंग ने पिछले साल भी पश्चिमी नेताओं को अवगत कराया था.
चीन ने कहा है कि संघर्ष और युद्ध से किसी का भला नहीं होता. सभी पक्षों को तर्कसंगत व्यवहार करना चाहिए और संयम बरतना चाहिए. भावनाओं को भड़काने और तनाव बढ़ाने से बचना चाहिए ताकि संकट नियंत्रण से बाहर न हो जाए.