
चीन में फिलहाल कोरोना के चलते तबाही मची हुई है. कहा जा रहा है कि वहां की 80 फीसदी से ज्यादा आबादी कोविड संक्रमित हो चुकी है. बड़ी संख्या में मौतें भी हो रही हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन समेत बहुत से देश भी चीन पर हालात की गंभीरता को छिपाने का आरोप लगा रहे हैं. इसपर कोई आधिकारिक आंकड़ा या पुख्ता खबर नहीं आ रही, लेकिन अलग-अलग स्त्रोत वहां लगातार अंतिम संस्कार चलने और कॉफिन के लिए भी वेटिंग की बात बोल रहे हैं. यहां तक अमेरिका और जापान जैसे देशों को सबसे ज्यादा कॉफिन सप्लाई करने वाले इस देश में अपने लिए ताबूत कम पड़ रहे हैं.
चीन ने ऐसे ही पूरी दुनिया के बाजार पर कब्जा नहीं कर लिया, इसके पीछे उसकी गहरी सोच रही. जैसे चीन के हर हिस्से में अलग-अलग आइटम बनते हैं, जो दुनिया के किसी खास हिस्से को टारगेट करते हैं. कॉफिन की बात करें तो पूर्वी चीन में इसका काम होता है. यहां से जापान और अमेरिका के लिए कॉफिन शिपमेंट जाता है. ग्लोबल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते कुछ सालों में जापान में 90 प्रतिशत ताबूत यहीं से बनकर गए.
ग्लोबल इंपोर्ट-एक्सपोर्ट पर नजर रखने वाली संस्था वोल्जा ग्रो ग्लोबल के डेटा के अनुसार चीन में 137 सप्लायर हैं, जो अमेरिका, जापान समेत लगभग 143 देशों में कॉफिन शिपमेंट भेजते हैं. डेटा अप्रैल 2022 का है. वियतनाम का नाम चीन के बाद आता है, जो दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रलिया और ताइवान को ज्यादा से ज्यादा खेप भेजता है. वीक इन चाइना की रिपोर्ट की मानें तो चीन का अलग-अलग हिस्सा, अलग देशों को टारगेट करता है ताकि कंपीटिशन में सबसे आगे रहें और लोकल स्तर पर प्रतियोगिता न बढ़े.
ताबूत के लिए हर देश काफी पर्टिकुलर होता है. किसी भी तरह का नहीं, बल्कि वही ताबूत चाहिए, जो उनके कल्चर से मेल खाता हो. यहां तक कि ये किस लकड़ी से बनेगा, इसे भी देखना होता है. मिसाल के तौर पर जापान के लोग पुलॉवनिआ पेड़ की लकड़ी के ताबूत को पवित्र मानते हैं. जापानी संस्कृति में ऐसी लकड़ी के भीतर सोने वाले जल्दी आराम पाते हैं. चीन के एक हिस्से काओक्सिन में यही पेड़ उगाए जाते हैं. हर साल ताबूत के लिए 3 मिलियन क्यूबिक मीटर टिंबर की प्रोसेसिंग इसी काम के लिए होती है.
चीनी संस्कृति में भारी ताबूत बनाने का चलन है, जिसपर नक्काशी होती है. लेकिन ये डिजाइन अमेरिका या जापान में नहीं चलता. जापान में हल्के ताबूतों का चलन है, जिसका तला भारी हो ताकि मिट्टी में शरीर जल्दी न मिले. ऊपर की तरफ लकड़ी पर नक्काशी की जगह कशीदाकारी किया हुआ कपड़ा लिपटा होता है. चीन का हेज शहर इसपर काम करता है. यहां तक कि अलग मौसम में उस देश में जो फूल खिलते हैं, कार्विंग में उसे भी उकेरा जाता है ताकि मृतात्मा को अच्छा लगे.
बता दें कि अंतिम संस्कार के मामले में जापान को दुनिया में सबसे ज्यादा खर्च करने वाला देश माना जाता है. जापानी ऑनलाइन इंफॉर्मेशन सर्विस कामाकुरा शिंशो के मुताबिक हर मृत्यु पर औसतन 1 से डेढ़ मिलियन येन खर्च होता है. इसमें ताबूत से लेकर खिलाने-पिलाने का खर्च भी शामिल है. इस पूरे खर्च में लगभग 20 प्रतिशत खर्च कॉफिन पर होता है. ऐसे में चीन से मंगवाने पर कीमत और बढ़ जाती है.
ज्यादा महंगे ताबूत काफी पहले ऑर्डर कर दिए जाते हैं. जैसे दिवंगत ब्रिटिश महारानी को जिस कैस्केट में रखा गया, वो लगभग दो दशक पहले ही बनाकर रख दिया गया. ये खास ब्रिटिश शाही घराने के हिसाब से था, जो वहीं बनकर तैयार हुआ.
चीन अपने सप्लायर्स की जरूरत समझने के लिए पहले वहां जाकर मार्केट देखता है. अलग-अलग कल्चर में कैसा ताबूत चाहिए, इसकी पड़ताल करता है. यहां तक कि ताबूत पर नक्काशी का पैटर्न भी समझता है और इंपोर्टर देश की भाषा भी समझने की कोशिश करता है. ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक चीन के लोग अपने बच्चों को उन देशों में भेजते हैं, जहां बिजनेस की गुंजाइश हो. वहां ये लोकल लोगों से घुलते-मिलते हैं ताकि भविष्य में ऑर्डर लेने में आसानी हो.
सामाजिक बहिष्कार का खतरा बना रहता है
ताबूत निर्माण का काम हालांकि चीनियों की सोशल लाइफ में घुसपैठ कर रहा है. ताबूत बनाने वाले परिवारों में लोग अपनी बेटियों की शादी नहीं करना चाहते हैं. उन्हें डर होता है कि ऐसे परिवारों में मौत जल्दी होती है या शादीशुदा जोड़े के साथ कोई दुर्घटना हो सकती है. इसी कारण कॉफिन मैन्युफैक्चरिंग करने वाले अपने काम को सार्वजनिक तौर पर नहीं बताते, बल्कि उसे क्राफ्ट बिजनेस कहते हैं.
चीनी मीडिया ग्लोबल टाइम्स के अनुसार कॉफिन बिजनेस से जुड़े हुए लोग या तो पहचान छिपाते हैं, या राज खुल जाए तो शादी के लिए कोई बड़ा ऑफर देते हैं, जैसे अगली पार्टी को पैसों की मदद या कोई दूसरा फेवर.