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किस बात पर भारत के साथ खड़े हुए चीन-पाकिस्तान? जिद पर अड़ गए अमीर देशों के सामने

COP 29 Baku: अजरबैजान की राजधानी बाकू में जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक बैठक चल रही है. इस बैठक में एक रिपोर्ट जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि विकासशील देश विकसित देशों से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए खरबों डॉलर की मांग कर रहे हैं. इस मांग को लेकर विकसित और विकासशील देशों में ठनी हुई है.

COP 29 में भारत, चीन और पाकिस्तान एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं (Photo- Reuters) COP 29 में भारत, चीन और पाकिस्तान एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं (Photo- Reuters)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 14 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 2:43 PM IST

भारत और पाकिस्तान के बीच भले ही दुश्मनी देखने को मिलती रही है लेकिन जब बात जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और उससे होने वाले नुकसान की भरपाई की लागत की बात आती है तो दोनों देश एक पाले में खड़े हो जाते हैं. अजरबैजान की राजधानी बाकू में आयोजित जलवायु परिवर्तन कॉन्फ्रेंस  (COP 29) में भारत के नेतृत्व में विकासशील देशों ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए विकसित देशों से खरबों डॉलर की मांग की जिसमें पाकिस्तान भी शामिल था.

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बुधवार को COP29 में वित्त पर संयुक्त राष्ट्र की स्थायी समिति की रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें कहा गया है कि भारत के नेतृत्व में एशिया के कुछ देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए 4 खरब डॉलर की जरूरत है.

34 पन्नों की इस रिपोर्ट को लेकर विकसित और विकासशील देशों में मतभेद की स्थिति बनी हुई है. हालांकि, 22 नवंबर को खत्म हो रहे COP29 तक इस पर विचार-विमर्श होने और किसी निष्कर्ष के निकलने की उम्मीद है.

2009 में आयोजित COP15 में, विकसित देशों ने 2020 तक विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करने के लिए हर साल 100 अरब डॉलर देने का वादा किया था. हालांकि, यह लक्ष्य 2022 में ही पूरा हो पाया और उसमें भी विकसित देशों ने विकासशील देशों को जो पैसा दिया, उसका 70% हिस्सा कर्ज था. इससे विकासशील देशों पर दबाव बढ़ा.

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विकसित देशों से क्या मांग रहे भारत-पाकिस्तान और चीन

एशियाई देश भारत, पाकिस्तान हाल के सालों में जलवायु परिवर्तन से काफी प्रभावित हुए हैं. ये देश विकसित देशों पर एक महत्वाकांक्षी जलवायु फाइनेंस पैकेज (New Climate Finance Package, NCFG) के लिए दबाव डाल रहे हैं जिसे चीन का समर्थन भी हासिल है. विकासशील देश चाहते हैं कि ये पैकेज रियायती हो और उनकी जरूरतों और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखता हो. विकासशील देशों की मांग है कि पैकेज जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान और क्षति को कवर करता हो.

अनुमान बताते हैं कि विकासशील और गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आने वाले सालों में खरबों डॉलर की जरूरत होगी और इसका जिक्र यूएन की रिपोर्ट में भी किया गया है.

ग्लोबल साउथ के देश कितना पैसा मांग रहे?

ग्लोबल साउथ के समान विचारधारा वाले विकासशील देशों (Like Minded developing Countries, LMDC) का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उन्हें हर साल खरबों डॉलर की जरूरत होगी. भारत, चीन, पाकिस्तान, अरब देशों, श्रीलंका जैसे देशों को LMDC देशों में गिना जाता है. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अरब समूह ने 1.1 खरब डॉलर, अफ्रीकी समूह ने 1.3 खरब डॉलर, भारत ने 1 खरब डॉलर और पाकिस्तान ने 2 खरब डॉलर की मांग की है.

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लेकिन विकसित देश विकासशील देशों की इस मांग का विरोध कर रहे हैं. ये देश चाहते हैं जलवायु फाइनेंस पैकेज एक वैश्विक निवेश लक्ष्य हो, जिसमें सभी देशों की सरकारों, निजी कंपनियों और निवेशकों सहित कई स्रोतों से पैसा जमा किया जाए.

उनका तर्क है कि 1992 में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन को अपनाने के बाद से वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है. तब कुछ देश जो थोड़े गरीब थे, अब अमीर हुए हैं जैसे चीन और कुछ खाड़ी देश. विकसित देशों की मांग है कि चीन और उन खाड़ी देशों को भी नए जलवायु फाइनेंस पैकेज में योगदान देना चाहिए.

विकसित देशों की मांग का विरोध कर रहे विकासशील देश

विकसित देशों की इस मांग को विकासशील देश नहीं मान रहे. उनका कहना है कि ऐसा कर वो विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें ऐतिहासिक रूप से औद्योगिकरण से फायदा हुआ है और जिन्होंने सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है.

विकासशील देशों का कहना है कि विकसित देशों का उनसे वित्तीय मदद की उम्मीद करना समानता के सिद्धांत को कमजोर करता है. खासकर तब जब इन देशों में अभी भी बहुत से लोग गरीबी और जलवायु परिवर्तन के बिगड़ते प्रभावों से जूझ रहे हैं और उनके पास पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर भी नहीं है.

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